धर्म और विज्ञान जुड़वाँ भाई
पिछले दिनों धर्म और विज्ञान को विरोधी माना जाता रहा है। दोनों के तर्क, प्रतिपादन और आधार एकदूसरे से भिन्न समझे जाते रहे हैं। एक को प्रत्यक्षवादी और दूसरे को परोक्षवादी कहकर उन्हें असंबद्ध कहा जाता रहा है। इसलिए दोनों की दिशा विपरीत मान ली गई और माना गया कि किसी धार्मिक के लिए विज्ञान को समझना एवं किसी वैज्ञानिक को धर्म के बारे में जानना आवश्यक नहीं।
इतने पर भी यह शाश्वत सत्य यथास्थान है, धर्म और विज्ञान जुड़वाँ भाई हैं। एक ही पर्वत से निकलने वाले दो महानिर्झर हैं। क्षेत्र-भिन्नता की दृष्टि से उनका स्वरूप भिन्न है, तो भी वे एक ही महाप्रयोजन की पूर्ति करते हैं। उनकी उपयोगिता मनुष्य के कंधों में जुड़ी हुई दो भुजाओं जैसी हैं। वे एकदूसरे के विरोधी नहीं, वरन् पूरक हैं। धर्म और विज्ञान दोनों एक ही महासत्य को दो दिशाओं से खोजना आरंभ करते हैं और जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं, वैसे-वैसे एकदूसरे के अधिकाधिक निकट पहुँचते हैं। विज्ञान जड़ जगत की संरचना और क्रियापद्धति का स्वरूप निर्धारण करता है और यह बताता है कि उसका अधिकाधिक उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है। धर्म चेतन जगत के रहस्यों का उद्घाटन करता है और सिखाता है कि विश्व की इस महती शक्ति का व्यक्ति और समाज के लिए श्रेष्ठतम उपयोग क्या हो सकता है। जड़ और चेतन के उभयपक्षीय रहस्यों का उद्घाटन एवं उपयोग सीखने के लिए हमें धर्म और विज्ञान का समानांतर उपयोग करते हुए आगे बढ़ना होगा।
आदिमकाल में जड़ पदार्थों के संबंध में अनेक भ्रांत मान्यताएँ गढ़ ली गई थीं। प्रकृति की साधारण हलचलें देवताओं या भूत-प्रेतों की करतूतें समझी जाती थीं। वर्षा, आँधी, तूफान, सरदी, गरमी, बाढ़, दुर्भिक्ष, रोग, हानि, दुर्घटना आदि के साथ किन्हीं अदृश्य आत्माओं का अभिशाप समझा जाता था और सफलताओं में उनका वरदान माना जाता था। देवताओं की अप्रसन्नता को प्रसन्नता में बदलने के लिए तरह-तरह के विनय, अनुरोध, भेंट, उपहार प्रस्तुत किए जाते थे। विज्ञान ने उन सब मान्यताओं को झुठला दिया और बताया कि प्रकृति की शक्तियों को यंत्र-बंधनों में बाँधकर वह सब किया जा सकता है, जो मंत्र-तंत्र से संभव नहीं था। जिन कारणों से संसार में अभाव-दारिद्र्य का बाहुल्य था, उनके निवारण कर सकने योग्य अनेकानेक साधन उपस्थित करके समृद्धि-प्रगति की ओर मनुष्य को बढ़ाया। इस दृष्टि से विज्ञान की मनुष्य जाति ऋणी है। उसे पाकर निश्चित रूप से सुख-सुविधाओं में वृद्धि हुई है। उसकी उपयोगिता के कारण विज्ञान के प्रति हर किसी का सम्मान है। वह सत्य के लिए ही नहीं, सुख-शांति के लिए भी हमारा पथ-प्रदर्शन करता है। दुरुपयोग की तो बात ही अलग है। गलत प्रयोग करके तो अमृत भी विष बन सकता है। दुष्ट प्रयोजन के लिए यदि विज्ञान का प्रयोग किया जाए तो इसमें प्रयोक्ताओं की मूर्खता ही निंदनीय ठहराई जाएगी, उससे विज्ञान की गरिमा नहीं घटेगी।
ठीक यही बात धर्म के संबंध में लागू होती है। आदिमकाल का मनुष्य एक दुर्बलकाय पशु मात्र था। उसके पास कोई आचार, व्यवहार, दर्शन, आदर्श, नियम, विधान नहीं था। मत्स्य-न्याय ही चलता था— जंगल का कानून ही मनुष्य भी पालते थे। अपनी सुविधा के साथ दूसरों का हनन करने में निकृष्ट स्तर के प्राणी संकोच नहीं करते, वैसा ही बरताव मनुष्यों का था। समझ की दृष्टि से थोड़ा विकसित होने के कारण वह अन्य पशुओं की तुलना में अधिक छली और अधिक दुष्ट था।
धर्म के उदय ने आचार, मर्यादा और कर्त्तव्य की जंजीरों में उन आदिमकालीन क्रूरताओं को जकड़ा और सभ्यता का सृजन करके मनुष्य को शालीनता एवं सामाजिकता का पाठ पढ़ाया। यह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है, जिसे धरती की समस्त संपदा से भी बढ़ी-चढ़ी माना जा सकता है। धर्म ने क्रमशः पशुता के— असुरता के— परतों को उखाड़ा है और मनुष्य को उस स्तर तक पहुँचाया है, जिसमें वह बढ़ी-चढ़ी संपत्ति के आधार ही नहीं, सुविकसित सभ्यता के आधार पर भी गर्व करने का— गौरवान्वित होने का अधिकारी है।
लोभ-लाभ की आकांक्षा से अथवा द्वेष-क्रोध भरी प्रतिहिंसा से प्रेरित होकर क्रूरकर्म कर बैठने पर बहुत कुछ बंधन धर्म ने लगाया है। उदार, दयालु, सहिष्णु, सरल एवं सहृदय बनने में भी धर्म का योगदान कम नहीं है। अपराध-निरोधक, सरकारी और गैरसरकारी, जितने भी प्रतिबंध-प्रतिरोध हैं, उन सबकी सम्मिलित शक्ति से भी कहीं बढ़ी-चढ़ी शक्ति धर्म की है, जो मनुष्यता की शालीनता को सजीव बनाए रहती है और जिसके आधार पर आनंद-उल्लास के— स्नेह-सौहार्द्र के— आदर्श-उत्कर्ष के— अभिनव उदाहरण प्रस्तुत होते हैं। वस्तुतः विकास का सर्वोत्तम आधार इन्हीं उपलब्धियों को माना जा सकता है।
विज्ञान क्रमशः आगे बढ़ रहा है। धर्म भी अपने उस रूप से कहीं आगे बढ़ चला, जिसे किसी समय बहुत आदर प्राप्त था, पर अब उसे अंधविश्वास का पोषक माना जाता है। विज्ञान के संबंध में भी यही बात है। पत्थरों को रगड़कर जब आग पैदा की गई थी, तब वह एक महती क्रांति थी। आग की उत्पत्ति ने उस समय मानव प्रगति में उतना ही बड़ा योगदान दिया था, जितना कि इन दिनों बिजली द्वारा किया जा रहा है। आज की दृष्टि से पत्थर रगड़कर चिनगारी निकालने की कला एक विनोद मात्र है। ठीक इसी तरह धर्म संबंधी वे मान्यताएँ, जो अब दकियानूसी कही जा सकती हैं, कभी अपने समय महती आवश्यकता पूरी कर रही थीं। उन दिनों का पिछड़ापन उन परंपराओं ने ही हलका किया था, जिन्हें आज हम उपहासास्पद मानते हैं।
विज्ञानी ‘पालटिनिश’ का कथन है— “विज्ञान और दर्शन तेजी से नजदीक दौड़ते चले आ रहे हैं और वह दिन दूर नहीं, जब वे अपने बाहुपाश में एकदूसरे को कस लेंगे।” विज्ञान प्रत्यक्ष है। वह यंत्रों द्वारा प्रयोगशालाओं में प्रामाणिक किया जा सकता है। धर्म अप्रत्यक्ष तो है, पर अप्रमाणित नहीं। अधर्मी व्यक्ति के उच्छृंखल जीवन और सुसंस्कृत व्यक्ति की— शालीनता की प्रतिक्रियाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए, तो स्पष्ट हो जाएगा कि धर्म की उपयोगिता प्रामाणिक है। वह व्यक्ति के अंतरंग और बहिरंग जीवन में सर्वतोमुखी प्रगति के आधार प्रस्तुत करती है।
विद्वान ‘एच. के. शिलेंग’ ने अपनी पुस्तक ‘साइंस एंड रिलीजन’ में यह भविष्यवाणी की है कि, “अगली शताब्दी में धर्म को विज्ञान का और विज्ञान को धर्म का अविच्छिन्न अंग मान लिया जाएगा। अस्तु, विज्ञान और धर्म के समन्वय से ही उसकी उभयपक्षीय प्रगति का सुसंतुलित आधार बन सकेगा।”
— पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं, पूरक हैं, धर्म और विज्ञान जुड़वाँ भाई, पेज नं. 80-83
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