विदाई वेला का मार्मिक प्रसंग
जून १९७१ का माह था मथुरा में पूज्यवर के विदाई समारोह का आयोजन था। यद्यपि उस वर्ष के अन्दर पूज्यवर ने प्रत्येक बच्चे को किसी न किसी शिविर के बहाने बुला कर भेंट मुलाकात की थी। फिर भी जिन्हें अपने सगे बच्चों से अधिक स्नेह दिया हो, ऐसे पिता को अपने बच्चों से जाते- जाते एक बार मिल लेने की व्याकुलता एवं छटपटाहट हुई और विदाई समारोह का आयोजन उसी की परिणति थी।
ऐसी ही लगन दूसरी ओर भी लगी थी, बालकों के मन में भी पिता से मिलने की व्याकुलता बढ़ी थी। किन्तु वे पिता के निर्देश के अनुशासन में बँधे थे। एक ओर निश्चल प्यार दूसरी ओर अपना सब कुछ न्यौछावर कर असीम सन्तोष पाने की व्याकुलता, यही था विदाई समारोह का सार।
विदाई समारोह का आमंत्रण पहुँचने पर बिलासपुर के सभी प्रमुख परिजन सर्व श्री रामाधार विश्वकर्मा, उमाशंकर चतुर्वेदी, बी. के. श्रीवास्तव, रामनाथ श्रीवत्स, हरिहर प्रसाद श्रीवास्तव आदि कार्यक्रम में शामिल हुए। अतिशय व्यस्तता के बावजूद गुरु देव कुशलक्षेम पूछ लेते थे। पहले दिन कलश यात्रा के बाद दूसरे दिन देव आह्वान में हल्की बूँदा- बाँदी हुई। लगा कि इन्द्रदेव ने भी पूज्यवर का विदाई निमंत्रण स्वीकार कर लिया हो। तीसरे दिन चालीस विवाहों का भव्य मण्डप लग रहा था।
विवाह समाप्त होते- होते इन्द्रदेव खुश होकर अपनी पूर्ण शक्ति से बरस जाना चाह रहे थे किन्तु स्वयं परमात्मा जिनके पुरोहित बने हों ऐसे उन चालीस जोड़ों के भाग्य से किसे ईर्ष्या न हो! पूरे समारोह भर पूज्यवर विभिन्न कर्मकाण्डों की व्याख्या कर सभी चालीस हजार से अधिक परिजनों को भी हँसाते- हँसाते लोट- पोट कर रहे थे। किसी को सुध भी नहीं रही कि कल के बाद हमारे पूज्यवर हमारे बीच से विदा होकर चले जाएँगे। जयमाल से लेकर पूर्णाहुति तक यज्ञ सम्पन्न कर अपने आवास पर लौटे। विवाह सम्पन्न होने के बाद रात ग्यारह बारह बजे मूसलाधार बारिश हुई। आँधी और पानी के बेग से सारे तम्बू की बल्लियाँ गिरने लगीं। कुछ साहसी कार्यकर्ता बल्लियों को पकड़े रहे ताकि तम्बू किसी तरह गिरने से बचें। पूरी रात सभी ने अँधेरे में गुजारी।
दूसरे दिन ब्रह्ममुहूर्त में अचानक गुरु देव आकर खड़े हो गए और हँसने लगे। मन में सोचा हमने रात भर कैसे गुजारी हम ही जानते हैं और गुरु देव हँस रहे हैं। एक क्षण में जाने क्या- क्या सोचने लगा। उसके बाद जब उन्होंने बड़े प्यार से पूछा बेटा ज्यादा परेशानी तो नहीं हुई? हम सभी ने एक स्वर में कहा- नहीं गुरू जी कोई परेशानी नहीं हुई। मन में यही सोचा कि अगर आँधी न आती तो गुरु देव प्रत्यक्ष एक- एक परिजन से मिलने न आते। हमें लगा कि शायद गुरुदेव ने इन्द्रदेव को न्योता देकर बुलाया हो कि तुम जाओ और बच्चों की परीक्षा लो, फिर सहलाने जाएँगे।
बरबस रामायण की चौपाइयाँ याद आ गईं। ‘‘छन महिं सबहिं मिले भगवाना। उमा मरम यह काहु न जाना।’’ गुरु देव सभी परिजनों से मिलने के बाद यज्ञशाला की ओर चल दिए। सभी परिजन यज्ञ हेतु तैयार होकर आए थे। गिरे हुए शामियाने चारों तरफ फैले हुए थे, किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे टेण्ट को व्यवस्थित किया जाए।
इसी बीच गुरु जी आए और बोले- सभी मिलकर प्रयास करो तो टेण्ट खड़ा हो सकता है। इतना कहने के बाद गुरुदेव ने स्वयं अपना हाथ आगे बढ़ाया। फिर क्या था हजारों हाथ उठ गए। गायत्री माता की जय, यज्ञ भगवान की जय के नारों से आसमान गूँज उठा और टेण्ट खड़ा हो गया। सभी आश्चर्यचकित थे कि इतना विशाल टेण्ट कैसे उठा। गुरु देव ने कहा, आप सबके सम्मिलित प्रयास से यह कार्य संभव हो सका। ऐसे थे हमारे गुरु देव।
माखन लाल ,बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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