महिमा गुणों की ही है
असुरों को जिताने का श्रेय उनकी दुष्टता या पाप-वृति को नहीं मिल सकता। उसने तो अन्तत: उन्हें विनाश के गर्त में ही गिराया और निन्दा के नरक में जलाया। विजय चाहे आरम्भिक या क्षणिक ही क्यों न रही हो पर वह उन्हें इसलिए मिली कि उन्होंने संगठन, साहस और पराक्रम को अपना सहचर बनाया और अवसर चूकने का आलस्य, प्रमाद नहीं किया। इतने अंशों में जो सजग समर्थता उनमें थी उसी को देवत्व की एक नन्हीं किरण कहा जा सकता है, उतने ही अंशों में वे विजेता भी होते रहे हैं।
देवों की पराजय का दोष उनके देवत्व अथवा सद्गुणों को नहीं दिया जाना चाहिए। उन विशेषताओं के कारण तो वे स्वर्ग लोक के अधिपति, लोकपूजित, यशस्वी और अजर-अमर बन सके हैं। पराजय का दोष तो उन थोड़े अंशों में पाई जाने वाली उस असावधानी और अदूरदर्शिता को ही दिया जायेगा, जिसके कारण उन्होंने पारम्परिक संगठन, सहयोग को सुदृढ़ बनाने और अवांछनीयता से आरम्भ में ही निपटने की आवश्यकता ही भूला दी, जब तक उन्होंने अपनी यह भूल सुधारी नहीं, तब तक उन्हें पराजय, उत्पीडऩ, और अपयश ही मिलता रहा।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (४.६३)
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