शक्ति और मर्यादा की समन्वित सिद्धि
रामकथा के प्रतिनिधि ग्रंथों में शक्ति पूजा का उल्लेख नहीं आता। देवी भागवत और दूसरे पुराणग्रंथों में ही कहा गया है कि लंका विजय से पहले नवरात्र अनुष्ठान किया था और शक्ति ने स्वयं प्रकट होकर राम को विजय के आशीष दिए थे। रामकथा के प्रतिनिधि ग्रंथों में सविता देवता कि आराधना के प्रसंग आते है। कहा सूर्य कि स्तुति के रूप में,तो कही संध्यावंदन और गायत्री जप के रूप में। रामायण आदि ग्रंथों में शक्ति पूजा के प्रसंग नहीं है। मनीषीगण प्रसंग को यह कहकर शक्ति पूजा से जोड़ते है कि राम का विजय अभियान सीता कि वापसी के लिए था।
कथानक जिस रूप में भी प्रचलित हो, उनका आशय यह है कि कि आसुरी तत्त्वों ने शक्ति का हरण कर लिया था। वह हरण किये जाने पर भी उन्हें हस्तगत नहीं हुई थी। आसुरी तत्वों का आधिपत्य हो जाता तो नारायणी शक्ति का उपयोग और ज्यादा आतंक, अन्याय और उपद्रव के लिए ही होता व आसुरी तत्वों कि वह जीत धर्म मार्ग कि पराजय के रूप में लिखी जाती। शक्ति अथवा सीता लंका में रहकर भी मर्यादा पुरुषोत्तम में ही लीं रही। सीता कि लौ और लगन राम के प्रति अविचल रही। सीता को मुक्त करने के लिए राम का लंका अभियान भी शक्ति कि आराधना- उपासना के रूप में में परिभाषित किया जाता है। राम की विजय और शक्तिसाधना पूरी होने की तिथि एक ही है। विजयादशमी पर आसुरी आतंक के प्रतिनिधि रावण का पराभव हुआ। नवरात्र की अंतकथा के अनुसार इस दिन भगवती दुर्गा ने महिषासुर और शुँभ-निशुँभ आदि दैत्यों का संहार कर देवसत्ताओं को निष्कंटक राज्य दिया। विजयादशमी उस शक्ति की आराधना के समापन और विसर्जन का दिन है। शक्ति उपासना में नौ दिनों तक दुर्गा पूजा के बाद विसर्जन के लिए विजयादशमी या उससे पहले नवमी का दिन निर्धारित है। किन्हीं क्षेत्रों में आश्विन नवरात्र के समय रामलीला का चलन रहा है। और किन्हीं क्षेत्रों में दुर्गा पूजा का। अब साधना सम्प्रदायों की कोई सीमा रेखा नहीं खींची जाती। इसलिए राम लीला के साथ दुर्गा पूजा भी सम्मिलित-समन्वित हो गयी है। दोनों आयोजन साथ-साथ चलते रहते है। समन्वित रूप में विजयदशमी शक्ति और मर्यादा का प्रेरक पर्व है। नवरात्र साधना शक्ति की आराधना के रूप में ही की जाती है। शास्त्रों में ढेरों प्रसंग है, जिनमें शक्ति संपन्न होने के बाद मिलने वाले परिणामों का विवेचन मिलता है। महिषासुर और शुँभ-निशुँभ भी शक्ति के आराधक थे। देवसत्ताओं के संगठित बल को उन्होंने नवरात्र के ही दिनों में चुनौती दी। देवासुर संग्राम उन्हीं दिनों लड़ा गया था। बाहुबल, बुद्धिबल और कूटनीति में आसुरी शक्तियाँ दैवी शक्तियों पर भारी ही पड़ती थी,लेकिन जीत अंततः देव पक्ष की ही हुई। आसुरी शक्तियों को पराभूत ही होना पड़ा।
रामकथा प्रसंग में मेघनाद और रावण ने भी उन्हीं दिनों शक्ति पूजा की थी, जिन दिनों जिन दिनों राम ने शक्ति का आराधन किया था। असुर सम्राट और लंका के सेनापति के पास साधन सुविधाएं राम की तुलना में श्रेष्ठ ही थी। श्रद्धाभक्ति और विश्वास की दृष्टि से भी वे राम के सामने उन्नीस नहीं बैठते थे। पुराणों में उल्लेख आता है की पूजा-उपासना और यज्ञे-अग्निहोत्र के बाद राम के सामने भी शक्ति प्रकट हुई और रावण को भी साक्षात् दर्शन हुए अर्थात् दोनों ही पक्षों की पूजा-आराधना सफल हुई,लेकिन विजय श्री ने राम का ही वरण किया। साधन और श्रद्धा में कम नहीं होने पर भी रावण को पराजित होना पड़ा, क्योंकि उनके पास धर्म मर्यादा नहीं थी।
दुर्गा,गौरी,गायत्री,लक्ष्मी और शक्ति रूपों का तत्वदर्शन विस्तृत है। उसे विवेचन में मनीषियों ने लाखों शब्द कहे है और हजारों पन्ने रंगे है, विवेचन का संक्षिप्त सार यही है उस शक्ति का मर्यादित उपयोग ही सफलता तक पहुंचता है। मर्यादा का उल्लंघन होते ही ध्वंस की प्रक्रिया भी शुरू हो जाती है।वह ध्वंस भी सूक्ष्म अर्थों में शक्ति का ही वरदान ही है। उसे निमंत्रित करने का अर्थ है- अपने आप को व्यर्थ उलझाना देवी पुराण में उल्लेख आता है की युद्ध से पहले आराधना करने पर राम और रावण दोनों के सामने शक्ति प्रकट हुई राम को उसने आशीर्वाद दिया ‘विजयी भवः’ - तुम्हारी जीत हो। रावण से कहा की तुम्हारा कल्याण हो- ‘कल्याणमस्तु।’ रावण का कल्याण उसके अभिमान और शूरता के साथ मिट जाने में ही था, वह आशीर्वाद फलीभूत हुआ। शक्ति की तुलना अग्नि से करे तो स्वर्ण के लिए उसका आशीर्वाद तपने और कुँदन सिद्ध होने के रूप में ही चरितार्थ होगा। वह कचरे के लिए भी प्रकट होगी और वरदान के रूप में उसे जलाकर भस्मीभूत ही करेगी। स्वर्ण और कूड़े में अग्नि के लिए कोई भी उदारता या बैर का कारण नहीं है। आशीर्वाद-वरदान भी दोनों के लिए उपलब्ध है, लेकिन परिणति दोनों के लिए अलग-अलग हो जाती है।
पौराणिक साहित्य में विजय और शक्ति का संदर्भ राम से ही जुदा है। अन्य अवतारी सत्ताओं से दूसरे संदर्भ जुड़े है, जैसे कृष्ण के साथ कर्म और ज्ञान का; बुद्ध के साथ करुणा का, परशुराम के साथ ब्रह्मतेज का, मत्स्य, कच्छप, वराह,वामन, नृसिंह आदि अवतारों के विकास, सामर्थ्य-अनुकूल, दान नीति आदि संदर्भ है, परन्तु शक्ति, विजय, मर्यादा और कीर्ति का उल्लेख राम के लिए ही आता है, क्योंकि राम का जीवन अपने चिंतन और चरित्र से मनुष्य की सम्पूर्ण गरिमा को चरितार्थ कर्ट है, मनुष्य किस स्तर तक विकसित हो सके, इस प्रश्न का उत्तर रामचरित में मिलता है। जिन्हें मानव धर्म की पूरी पराकाष्ठा में देखना हो वे मर्यादा पुरुषोत्तम का अवगाहन करे।
वाल्मीकि रामायण का आरंभ नारद की जिस जिज्ञासा से होता वह सम्पूर्ण मानव की खोज है। देवऋषि नारद वाल्मीकि से पूछते है की संसार में गुणवान, तेजस्वी, धर्मज्ञ, उपकार मानने वाला, सत्यव्रती, दृढ़प्रतिज्ञ, सदाचार से युक्त, सबका हितैषी, प्रियदर्शी जितेंद्रिय, क्रोध और समस्त आवेगों पर नियंत्रण रख ने वाला, कान्तिमान और अनिंद्य कौन है? ऐसा कौन-सा पुरुष है, जो दूसरों को जीतने की कामना नहीं रखता और स्वयं अजेय है? महर्षि वाल्मीकि इस प्रश्न के उत्तर में राम चरित्र सुनाते है।
मानवीय गुणों की पराकाष्ठा होने के कारण ही राम मर्यादा पुरुषोत्तम है। वे मानवीय मर्यादाओं से कही भी विचलित होते नहीं दिखाई देते। शस्त्र और शास्त्र दोनों ही उनके हाथ में आकर अपने आप को धन्य अनुभव करते हैं। क्षात्र धर्म और ब्रह्मणत्व दोनों का निर्वाह करते हुए परशुराम भी अपनी सत्ता राम में लीन कर देते है। धर्म को शस्त्र और शास्त्र दोनों के प्रयोग से चरितार्थ होने की मर्यादा स्थापित करने के लिए परशुराम अवतरित हुए। राम के अवतरित होने पर उन्हें अपना होना आवश्यक नहीं लगता उनकी ज्योति मर्यादा पुरुषोत्तम की ज्योति में मिल जाती है।
धर्म मर्यादा से ऊर्जा ग्रहण करने वाले राम को अपनी विजय के लिए विशेष कुछ नहीं करना पड़ता। समर भूमि में उनके सामने रावण का सभी शस्त्र-साधनों से संपन्न रथ है। उस रथ पर बैठ कर रावण ने बड़े-बड़े युद्ध लड़े और जीते है। राम उनके सामने पैदल है, लेकिन विजय रथ राम के पास है। वह किन्हीं वहाँ-उपकरणों से नहीं बना। विजय रथ के निर्माण में धर्म मर्यादा ही काम आई है। मानसकार ने स्वयं राम से ही कहलाया-ष्जेहि जय होई सो स्यंदन आना, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है। उस रथ के पहिये, ध्वजा,पताका, छात्र, आसन, अश्व आदि धर्म की विभिन्न अभी व्यक्तियों से निर्मित है। यह अभिव्यक्ति धर्ममर्यादा है। मर्यादाओं में रहने पर शक्ति निजी, कीर्ति और विभूति प्रदान करती है। उनसे विचलित होने पर अनिष्ट-अनय ही लाती है। विजय दशमी पर शक्तिपूजा और राम के विजयोत्सव को अलग-अलग नहीं देखना चाहिए। उसे शक्ति मर्यादा के संयुक्त उत्सव के रूप में समझना चाहिए दोनों की ही कामना और साधना समग्र सिद्धि बनती है।
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