संघर्षों की विजयादशमी (Kavita)
संघर्षों की विजयादशमी चढ़ आई है,
तज कर तन्द्रा, आ पंचशील के राम, उठो!
तुम भटक चुके हो नाथ, बहुत दण्डक वन में,
तुम बिलख चुके हो हृदय-विदारक क्रन्दन में,
नीरव आँसू से शैल-शिलाएं पिघलाते-
तुम मौन रहे अत्याचारों के बन्धन में,
मिल गए तुम्हें सह-सत्ता के भालू-बन्दर-
करते जयकारे सद्भावों के नर-किन्नर-
पापों से दबी धरा की उठी दुहाई है-
नर के चोले में नारायण निष्काम, उठो! 1
सर उठा रही डायन-सी विज्ञानी लंका,
डम-डमा रहा संहार-नाश का फिर डंका,
सज रहा टैंक, पनडुब्बी, राकिट के संग-संग-
ऐटम का मेघनाद, असुरों का रणबंका,
है नाथ ‘मिजिल’ का बड़ा भयानक कुम्भकर्ण-
कर देंगे गैसों के शर सब के पीत वर्ण-
मानव के जग पर दानवता घहराई है,
बन एक बार संरक्षण के उपनाम, उठो! 2
ऋषि-मुनियों-से हैं उपनिवेश पीड़ित दिन-दिन,
हैं काट रहे आजाद देश घड़ियाँ गिन-गिन,
है कैद शान्ति की सीता उद्जन के घर में-
हो रही भग्न यह नींव जिन्दगी की छिन-छिन,
बाँधो तटस्थता सेतु, बाढ़ को रोको तुम!
अंगद को आगे भेज युद्ध को टोको तुम!
दुनिया के उपवन पर पतझर मँडराई है,
फूँकते गंध, बन कर वसन्त अभिराम, उठो! 3
अन्यथा धँसेगी धरा, राख होगा अम्बर,
सागर सूखेंगे, जल जाएँगे नद-निर्झर,
टूटेंगे तारे, पवन खड़ा हो जाएगा-
कूकते खेत-खलिहान पड़े होंगे निःस्वर,
मिट जाएँगे पद-चिन्हों से साहित्य-कला,
सभ्यता-संस्कृति का घोटेगा काल गला।
मानव पर हिंसा की नागिन लहराई है,
जीवन के मंत्र, अहिंसा के संग्राम, उठो! 4
*समाप्त*
(श्री कैलाश भारद्वाज)
अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1957
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