हंस के प्रतीक का क्या अर्थ है?
अर्जुन एक बार देवलोक में गए। देवलोक में अर्जुन को क्या उपहार मिलने चाहिए, इसकी परीक्षा लेने से पहले उन्होंने क्या किया? उन्होंने ये कहा, पहले उपहार पीछे देंगे, देखें ये इस लायक भी है कि नहीं। उन्होंने पवित्रलोक की सबसे खूबसूरत महिला को उसके पास भेजा, उर्वशी को उसके पास भेजा। और उर्वशी के पास जाकर के जब उर्वशी गई, ये कहने लगी, अर्जुन हाँ देवताओं ने हमको भेजा है और हम तुम्हारी बहुत प्रार्थना करने आए हैं और ये कहने आए हैं कि आपके जैसा बच्चा हमको चाहिए। वो समझ गया क्या मतलब है, क्या मतलब है इसका? उसने कहा, आपको मेरे जैसा बच्चा चाहिए? आप जिस तरीके से चाहती हैं, उस तरीके से तो बच्चा न हुआ, कन्या हो जाए तब और फिर मेरे जैसा न हो, पंगा हो जाए, लंगड़ा हो जाए, काना हो जाए तब मेरे जैसा चाहती हैं न? मेरे जैसा, मेरे जैसा तो मैं एक हूँ। भगवान ने जितने भी जानवर बनाए, एक ही बनाया, दूसरा उसके जैसा नहीं बनाया। एक पेड़ जैसे बनाया, दूसरा पेड़ ही नहीं बना। एक पत्ता किसी पेड़ का जैसे है, दूसरा पत्ता दुनिया में बनाया नहीं गया। हर चीज अलग बनाता है भगवान। मैं जैसा बनाया गया हूँ, मैं तो एक ही बनाया गया हूँ। दूसरा तो भगवान बनाने वाला नहीं है, इसलिये मेरे जैसा तो मैं ही हूँ और आपकी प्रार्थना मैं स्वीकार करता हूँ, आपके आदेश को मानता हूँ। आपका मैं आज से बेटा होता हूँ, चरणों की रज अपने मस्तक पर लगाई और कहा, आज से मैं आपका बेटा और आप हमारी माँ। क्या हुआ? बुद्धि है, ये विचारणा है, संकल्प है, एक सिद्धांत है। सिद्धांत अगर हमारे मन में आयें तो आप गायत्री के उपासक हैं, निश्चित। यदि विवेक आपके भीतर है, तो आप गायत्री के उपासक हैं। गायत्री के उपासक हैं और हमने उसके शिक्षण के लिए कलेवर बना करके रखा है। हंस उस पर गायत्री सवार रहती है। गायत्री हर एक पर सवार नहीं होती है। क्यों महाराज जी? गायत्री हमारे पास तो वो है, भैंसा उस पे बिठा लावें तो बोले नहीं बेटा, उस पे नहीं आएगी। तो महाराज जी, घोड़ा हमारे यहाँ है, घोड़े पे ले आवें, नहीं महाराज जी, घोड़े पर भी नहीं आएगी। तो आप, हम गायत्री माता को बुलाने रिक्शा ले के चले जाएँ, रिक्शे पर बिठाकर ले आवें तो आ जाएगी? रिक्शे पर भी नहीं आएगी। तो महाराज जी, कौन सी सवारी लाएं? गायत्री माता को तो लिवा के ले आना चाहता हो, सवारी की जरूरत हो, तो सिवाय हंस के बिना और कोई सवारी पर नहीं बैठ सकती। अरे हंस तो महाराज जी बेकार होता है, कोई और मैं सवारी ला देता हूँ, उसके लिए घोड़े कहें तो घोड़ा ला दूँ, हाथी कहें तो हाथी ला दूँ, हाथी को वह कहीं नहीं बैठती है। केवल हंस पर बैठती है। हंस से क्या मतलब है? हंस से मतलब है, वो व्यक्ति जो धुला हुआ है, उसने अपने कपड़ों को साफ सुथरा रखा है। हंस से मतलब वो व्यक्ति जिसको कि मोती खाने की आदत है, जो कीड़े मकोड़े नहीं खाता। हंस से मतलब वो व्यक्ति जो कि दूध और पानी को अलग करना जानता है। महाराज जी, ऐसा हंस कौन सा होता है? कोई नहीं होता, हमको बनाना पड़ेगा। हम और आप हो सकते हैं। हंस एक अलंकार है, जैसा हंस हमने कल्पना कर रखा है, वैसा हंस नहीं होते। हंस तो कीड़े खाते हैं और हंस तो दूध पानी कहाँ से बेचारों को दूध मिलेगा? दूध पानी कैसे फाड़ सकते हैं? ये तो अलंकार है, अलंकार है ये जो हंस है, जिसके पीछे गायत्री माता का वाहन है। वैसा हमको भक्त बनना चाहिए, अर्थात हमारा जीवन ऐसा बनना चाहिए, ऐसा बनना चाहिए जैसे हंस का होता है। तो गायत्री माता सवारी करेंगी हमारे ऊपर, हमारे कंधे पर सवार होंगी, हमारे सिर पर सवार होंगी, हमारी पीठ पर सवार होंगी, हमारे ऊपर उनकी छाया अपने आप बन जाएगी।
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