भावना किसे कहते हैं?
भावना उमंग को कहते हैं। भावना किसे कहते हैं? उमंग को कहते हैं। कौन सी उमंग? जो किए बिना चैन नहीं लेते। जो किए बिना चैन नहीं लेते, वो कल्पना जो दिमाग में आती रहे: हम संत बनेंगे, हम महात्मा बनेंगे, हम ज्ञानी बनेंगे, हम ब्रह्मचारी बनेंगे।
"जपो हे प्रभु, आनंद दाता, ज्ञान हमको दीजिए, इसी के सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए।" वो भाई, एक या दो दुर्गुण छोड़ना तो नहीं है। अरे महाराज जी, मैं तो वैसी ही गीत गाया करता हूँ। एक-दो दुर्गुण छोड़ेगा नहीं, महाराज जी। छोड़ने-छोड़ने के चक्कर में नहीं, मैं तो गीत गाता रहता हूँ। पर गीत से क्या बनेगा? अभागे मित्रों, क्या करना चाहिए?
विचारों के साथ-साथ में हमारे अंदर भावना का समावेश हो। भावना का अर्थ ये है: इसके अंदर तड़पन पैदा हो, ऐसी उमंग पैदा हो कि हम इसके बिना रह नहीं सकते। जो चिंतन आप करें, दीपक की तरह जिएंगे। आत्म-संशोधन हम करेंगे। जल हम देंगे। नैवेद्य हम देंगे। इस तरह के जो भी विचार हों, यह पहले क्रिया है। क्रिया के साथ-साथ में विचारों का समन्वय करें।
दो विचारों के समन्वय के पश्चात जब विचार आपके जमने लगें, क्रिया और विचारों का समन्वय करने लगें, तो आप यह कोशिश कीजिए: उसके साथ में यह भाव। भाव माने उमंग। उमंग। उमंग। यह भी करेंगे, बस यही करेंगे। यही करेंगे।
श्रेष्ठता से असीम प्यार, श्रद्धा जिसे हम कहते हैं। श्रेष्ठता से असीम प्यार, श्रेष्ठता को असीम अर्थात् इससे ज्यादा कोई प्यारी चीज नहीं। श्रेष्ठता से असीम, और उससे ज्यादा कोई प्यारा नहीं है। हमें भगवान से ज्यादा और कोई प्यारा नहीं है। श्रेष्ठता से ज्यादा कोई प्यारा नहीं है।
सबसे ज्यादा प्यारा है सबको। हम नाराज कर सकते हैं, पर इसको नाराज नहीं करेंगे। यह उमंग जब बीमारी भीतर से पैदा हो, तो हमारे जीवन में क्रिया किस अस्तर की आ जाए? कर्मकांड, कर्मकांड के साथ-साथ में जुड़े हुए विचार। विचारों के साथ भावनाएं, भावनाओं से हमारा ओतप्रोत रस, विभोर प्राण से सराबोर जीवन।
और जीवन के परिणाम फिर देखिए। फिर आप देखिए: आप संत बनते हैं कि नहीं? फिर देखिए: आप ऋषि बनते हैं कि नहीं? फिर देखिए: आप भगवान का अनुग्रह पाते हैं कि नहीं? फिर देखिए: भगवान की कृपा प्राप्त होती है कि नहीं?
सब चीजें आपको प्राप्त होती चली जाती हैं। शर्त यह है: अपने आपको, अपने जीवन को, अपने विचारों को, अपने चिंतन को, अपने लक्ष्य को, अपने आदर्श को इस लायक बनाने की कोशिश करें जैसे कि संत को होने चाहिए।
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