बेकार की बातों से ऊपर उठिए, सार्थक जीवन अपनाइए
हमारी बातों का ध्यान करना। आप हमारे व्याख्यान सुनने पर ध्यान मत करना। "गुरु जी का व्याख्यान सुनने को नहीं मिला, अब की बार आते तो गुरु जी तो बहुत अच्छा व्याख्यान दिया करते हैं" — खबरदार, बेकार की बातें करते हो। गुरु जी का व्याख्यान सुना था? गुरु जी कौन हैं? नाचने वाले हैं? गाने वाले हैं? कोई जो आपको व्याख्यान सुनाएंगे और कथा सुनाएंगे, भागवत सुनाएंगे?
जो हम कहते हैं, वह आप सुनिए। और आप कहते हैं, वह हम सुनेंगे। हमने अपने गुरु को जो कहना था, सो हमने कहा। और हमारे गुरु को जो कहना था, वह उन्होंने कहा। सेकेंडों में बातचीत खत्म हो गई। और सेकेंडों में बातचीत खत्म हो जाने के बाद, उन्होंने फिर अपना-अपना फर्ज, अपनी-अपनी जिम्मेदारियां और अपने-अपने काम निभाना शुरू कर दिया। हमने अपना फर्ज और जिम्मेदारियां निभाना शुरू कर दिया। और अंतिम समय तक, जब तक हम जिंदा हैं, तब तक निभाते रहेंगे।
आप भी कीजिए ना ऐसा। आप ऐसा नहीं करना चाहते? आपका मन नहीं है ऐसा करने का? आप तो गुरु जी का नाच देखना चाहते हैं। आप तो गुरु जी का व्याख्यान सुनना चाहते हैं। आप तो गुरु जी की शक्ल देखना चाहते हैं। आप तो गुरु जी के साथ में गपबाज़ी करना चाहते हैं। आप तो गुरु जी के साथ में ताश खेलना चाहते हैं?
यह बेकार की बातें मत कीजिए। हमारी कीमत समझिए। अपनी कीमत समझिए। जिन लोगों को हमने ज़िंदगी भर में ढूंढा और तलाश किया है, बहुत शानदार आदमी हैं। और आप भी उन्हीं में से एक शानदार आदमी हैं।
आपको हम जो काम बताने वाले हैं, शानदार काम बताने वाले हैं, जिससे कि आप भी इस संसार की नाव में से पार हो सकें, और अपने कंधों पर बैठा कर के लाखों आदमियों को पार लगा सकें। हमने अपनी ज़िंदगी में हजारों आदमियों को कंधे पर बिठा कर के पार लगाया है, और स्वयं भी हम पार हुए हैं। डूबे नहीं हैं हम।
आप भी डूबिए मत। लोगों की ये जंजीरों में डूबिए मत। लोगों की जंजीरों में डूबिए मत। वासना, तृष्णा और अहंता के भवसागर में डूबिए मत। उठिए ज़रा। हम क्या कहते हैं, उसको सुनिए।
हमारी सफाई आप क्या करेंगे? आप कहां जा रहे हैं? आप कहां जा रहे हैं? आप क्यों नहीं बोलते? आप कहां जा रहे हैं? आप क्यों नहीं बोलते?
अब इन बेकार की बातों से कुछ लेना-देना नहीं है। काम की बातें कीजिए। काम की बातें हमने की हैं।
काम की बातें रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानंद से की थीं। काम की बातें शिवाजी से समर्थ गुरु रामदास ने की थीं। काम की बातें चाणक्य ने चंद्रगुप्त से की थीं। काम की बातें गांधी जी ने विनोबा से की थीं।
और हम कुछ काम की बात कह रहे हैं। काम की बात सुन नहीं रहे। दिखाई क्यों नहीं पड़ते? यह बात क्यों नहीं करते? गप्पें क्यों नहीं हांकते?
आप कहां जाएंगे? आप कब बजे सो के उठेंगे? आप खाते क्या हैं? आप सोते कब हैं? आप पहनते क्या हैं?
फिर बेकार की बात से मुझे चिढ़ है, चिढ़ है। हम इतना महत्वपूर्ण काम करने जा रहे हैं, और आप कोई महत्वपूर्ण काम नहीं करेंगे?
आप महत्वपूर्ण काम कीजिए, बस।
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