हमारी वसीयत और विरासत (भाग 74): उपासना का सही स्वरूप
समझा जाना चाहिए कि जो वस्तु जितनी महत्त्वपूर्ण है, उसका मूल्य भी उतना ही अधिक होना चाहिए। प्रधानमंत्री के दरबार का सदस्य बनने के लिए पार्लियामेंट का चुनाव जीतना चाहिए। उपासना का अर्थ है— पास बैठना। यह वैसा नहीं है, जैसा कि रेलगाड़ी के मुसाफिर एकदूसरे पर चढ़ बैठते हैं, वरन् वैसा है, जैसा कि दो घनिष्ठ मित्रों को दो शरीर एक प्राण होकर रहना पड़ता है। सही समीपता ऐसे ही गंभीर अर्थों में ली जानी चाहिए। समझा जाना चाहिए कि इसमें किसी को किसी के लिए समर्पण करना होगा। चाहे तो भगवान अपने नियम, विधान, मर्यादा और अनुशासन छोड़कर किसी भजनानंदी के पीछे-पीछे नाक में नकेल डालकर फिरें और जो कुछ भला-बुरा वह निर्देश करे, उसकी पूर्ति करते रहें; अन्यथा दूसरा उपाय यही है कि भक्त को अपना जीवन भगवान की मरजी के अनुरूप बनाने के लिए आत्मसमर्पण करना होगा।
हमें हमारे मार्गदर्शक ने जीवनचर्या को आत्मोत्कर्ष के त्रिविध कार्यक्रमों में नियोजित करने के लिए सर्वप्रथम उपासना का तत्त्व दर्शन और स्वरूप समझाया। कहा— ‘‘भगवान तुम्हारी मरजी पर नहीं नाचेगा। तुम्हें ही भगवान का भक्त बनना और उसके संकेतों पर चलना पड़ेगा। ऐसा कर सकोगे, तो तद्रूप होने का लाभ प्राप्त करोगे।’’
उदाहरण देते हुए उनने समझाया कि ‘‘ईंधन की हस्ती दो कौड़ी की होती है। पर जब वह अग्नि के साथ जुड़ जाता है, तो उसमें सारे गुण अग्नि के आ जाते हैं। आग ईंधन नहीं बनती, ईंधन को आग बनना पड़ता है। नाला नदी में मिलकर वैसा ही पवित्र और महान बन जाता है, पर ऐसा नहीं होता कि नदी उलटकर नाले में मिले और वैसी ही गंदी बन जाए। पारस को छूकर लोहा सोना होता है, लोहा पारस नहीं बनता। किसी भक्त का यह आशा करना कि भगवान उसके इशारों पर नाचने के लिए सहमत हो जाएगा, आत्मप्रवंचना भर है। भक्त को ही भगवान के संकेतों पर कठपुतली की तरह नाचना पड़ता है। भक्त की इच्छाएँ भगवान पूरी नहीं करते, वरन् भगवान की इच्छा पूरी करने के लिए भक्त को आत्मसमर्पण करना पड़ता है। बूँद को समुद्र में घुलना पड़ता है। समुद्र बूँद नहीं बनता। यही है— उपासना का एकमात्र तत्त्व दर्शन। जो भगवान के समीप बैठना चाहे, वह उसी का निर्देशन-अनुशासन स्वीकार करे। उसी का अनुयायी-सहयोगी बने।’’
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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