Upasana Ko Apnayen उपासना को अपनायें (भाग 2)
उपासना को समग्र रूप में अपनायें- समुचित लाभ उठायें
उपासना के दो पक्ष है एक कर्मकाण्ड दूसरा तादात्म्य। दोनों शरीर एवं प्राण की तरह अन्योन्याश्रित एवं परस्पर पूरक हैं। एक के बिना दूसरे को चमत्कार प्रदर्शित करने का अवसर ही नहीं मिलता। बिजली के दोनों तार जब मिलते हैं तभी करेण्ट चलता है। अलग- अलग रहें तो कुछ बात बनेगी ही नहीं। दोनों पहिए धुरी से जुड़े हो और समान रूप से गतिशील हो तभी गाड़ी आगे लुढ़कती है। लम्बी यात्राएँ दोनों पैरों के सहारे ही संभव होती हैं, भले ही एक के कट जाने पर उसकी पूर्ति लकड़ी के पैर से ही क्यों न की जा रही हो। दोनों हाथ से ताली बजाने की उक्ति से सभी परिचित हैं। सन्तानोत्पादन में नर और नारी दोनों का संयोग चाहिए।
ठीक इसी प्रकार उपासना का शास्त्र प्रतिपादित और आप्तजनों द्वारा अनुमोदित माहात्म्य तभी चरितार्थ होता है, जब उसका कर्मकाण्ड वाला प्रत्यक्ष और तादात्म्य वाला परोक्ष पक्ष समान रूप से संयुक्त सक्रिय होते हैं। जप, ध्यान, प्राणायाम के उपासनात्मक कर्मकाण्डों का स्वरूप सभी को विदित है। जिन्हें उस जानकारी में कुछ कमी हो वे अपनी स्थिति के अनुरूप किसी अनुभवी मार्गदर्शक से परामर्श अथवा प्रामाणिक ग्रन्थ का अवलोकन करके उसका समाधान निर्धारण कर सकते हैं, बड़ी और महत्त्वपूर्ण बात तादात्म्य है। उसे जीवन सत्ता में प्राण का स्थान मिला है। कर्मकाण्ड तो काय- कलेवर की तरह उपकरण ही कहे जाते हैं, प्रहार तो तलवार ही करती है। वस्तुतः युद्ध मोर्चे को जिताने में वह लौहखण्ड उतना चमत्कार नहीं दिखाता, जितना कि प्रत्यक्ष न दीखने वाला पराक्रम और साहस। ठीक उसी प्रकार उपासना कर्मकाण्ड पक्ष का तलवार जैसा प्रतिफल देखना हो, तो उसके पीछे तादात्म्य का भाव समर्पण नियोजित किए बिना काम चलेगा ही नहीं।
उपासना कर्मकाण्डों में विधि- विधान का स्वरूप प्रज्ञा परिजनों में से सभी जानते हैं। स्थान, पूजा उपकरण, शरीर, वस्त्र आदि की शुद्धि के अतिरिक्त मन बुद्धि और अन्तःकरण की शुद्धि तथा इन्द्रियों, अवयवों को पवित्र रहने की प्रेरणा देने के लिए आचमन, न्यास आदि किए जाते हैं। पवित्रता के प्रतीक जल और प्रखरता के प्रतिनिधि दीपक या अन्य किसी विकल्प का अग्नि स्थापन किया जाता है। समझा जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के लिए सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य आदि सज्जनता परक सद्गुणों की जितनी आवश्यकता है ठीक उतनी ही संयम, साहस, पराक्रम एवं संघर्ष के रूप में अपनाई जाने वाली तपश्चर्या का महत्त्व भी है। पवित्रता और प्रखरता का समन्वय ही पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचाता है। मात्र संत सज्जन बने रहने और पौरुष को त्यागकर बैठने पर तो कायरों और दीन दुर्बलों जैसी दयनीय स्थिति बन जाती है। मध्यकाल की भक्तचर्या ऐसे ही अधूरेपन से ग्रसित रहने के कारण उपहासास्पद बनती चली गई है। कर्मकाण्डों के विधि- विधान तादात्म्य की चेतना उत्पन्न करने एवं प्रेरणा देने के लिए विनिर्मित हुए हैं।
.....क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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