भारतीय एकता के सूत्र उसकी संस्कृति में
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(आचार्य श्री नरदेव शास्त्री, वेदतीर्थ, ज्वालापुर)
नई ईंटें नये मकान, नया राज्य, नयी बातें-इस वर्तमान पाश्चात्य पद्धति के प्रजातन्त्र में सब कुछ नया ही प्रतीत हो रहा है हम भारतीयों को। प्रतीत क्या हो रहा है, सामने नयी नयी बातें आ रही हैं। इस नये ढंग के शासन काल में हमारे भारतीय नेता इस चिन्ता में हैं कि भूतकाल की बातें भूतकाल में विलीन हो गई “हेयं दुःखमनागतम्” की दृष्टि से ऐसा उपाय किया जाय, जिससे भारतीय जन एक दूसरे से बँधे रहे, उसमें एक प्रकार की सामान्य एकता का कोई आधार हो जिससे प्राप्त स्वतन्त्रता की रक्षा हो सके। जब हमारे देश पर विदेशी और विधर्मियों के आक्रमण होने लगे थे, तब हमारे पास क्या नहीं था? बल? बलशाली पराक्रमी राजे-महाराजे सैकड़ों थे। धन? धन-ऐश्वर्य भी इतना विपुल था कि संसार के राष्ट्र, भारत के लिये लालायित रहते थे। इसके ऐश्वर्य की ख्याति सात समुद्र पार पहुँच चुकी थी। इसीलिए तो मध्य-एशिया से जलालुद्दीन बादशाह ने काश्मीर पर चढ़ाई की थी, इसीलिये अनेक बलादृय़ यवन राजाओं के आक्रमण का ताँता बाँध रक्खा था, यहाँ तक कि हमारी भूलों से, एकता के सूत्रों के टूट जाने से बली पराक्रमी ऐश्वर्य संपन्न हमारे देश के राजे महाराजे परास्त हुए और अन्त में भारत में यवन-साम्राज्य की प्रस्थापना हो ही गई थी। इसी भारत की प्रशंसा सुन कर विदेशी यात्री भारत में आते रहे और वापस जाकर भारत के विषय में लिखते रहे, अपने देशवासियों को प्रोत्साहित करते रहे कि “अरे देखना है तो भूतल के स्वर्ग, भारत को देखो, भारत के धर्म, संस्कृति, सभ्यता, ऐश्वर्य, पराक्रम को देखो। प्राचीन भारतवासी गुरु गण संसार को निमन्त्रण देते थे कि आओ संसार के लोगों और हम से चरित्र-शिक्षा लो।”
इसी भारत की कीर्ति सुनकर ही तो अतुल पराक्रमी सिकन्दर आया था। कतिपय भारतीय राजाओं को परास्त करके और अन्त में मार खाकर स्वदेश लौट गया था। उस समय यदि हमारे राजे-महाराजे सब एक होकर एक साथ आक्रमणकारियों पर टूट पड़ते तो फिर किसी की यह हिम्मत न होती, अथवा पड़ती कि भारत की ओर आँख उठाकर भी देखे।
यहाँ अँगरेज भी ऐसी ही परिस्थिति में आया। पहले व्यापारी रूप में आया, फिर पराक्रमी किन्तु कुट्ठैल राजाओं की दशा देखकर उसने यहाँ की परिस्थिति से पूर्ण लाभ उठाया और अन्त में शासक रूप में भारत का भाग्यविधाता बन बैठा। अन्त में उसकी साम्राज्य लालसा इतनी बढ़ी कि उसको भी अपने पापों का फल भुगतना पड़ा—
लोभः पापस्य कारणम्।
अब पूर्वजों के अवशिष्ट इधर-उधर बिखरे हुए पुण्य-कणों के प्रताप से कहिए अथवा यह कहिए कि हमारे भी दिन फिरने थे इसलिए कहिए, हमारी स्वतन्त्रता पुनः प्राप्त हो गयी। और हमने स्वतन्त्रता प्राप्त करके अपनी नयी शासन पद्धति संभाल ली। अर्थात् भारत में पाश्चात्य ढंग का प्रजातन्त्र स्वीकार किया। हमने अपना संविधान भी बना लिया, और तद्नुसार लोकसभा, राज्य परिषद्, विधानसभा विधान परिषद आदि बनाकर इस लोकतन्त्र की गाड़ी को हाँकना प्रारम्भ किया। पर हमको यही चिन्ता रही, और बराबर रहती है कि प्राचीन समय में एकता के सूत्र जैसे भी रहे हों, इस नये युग में एकता के नये सूत्र होने चाहिए। प्राचीन समय में सब का आधार-धर्म रहता था, इस समय धर्म-कर्म की मीमाँसा ले बैठें तो एकता असम्भव हे क्योंकि नाना धर्म, नाना ग्रन्थ, नाना मति के घनघोर जंगल में एकता की बात करना, नहीं, नहीं, आशा भी करना आकाश पुष्प की आशा करने की भाँति असम्भव है। ये हैं उन लोगों के विचार, जिनके हाथ में आजकल शासनसूत्र है और जिनका कि वे बड़ी सावधानी से संचालन कर रहे हैं। इसलिए उन्होंने घोषणा कर डाली है कि पाश्चात्य ढंग के समाजवाद की स्थापना ही इस प्रजातन्त्र का उदृश्य है। उनकी समझ में इस प्रकार के समाजवाद के बिना भारत में एकता का रहना असम्भव है और धर्म के नाम पर तो एकता चल ही नहीं सकती, इसीलिए धर्मनिरपेक्ष राज्य की प्रस्थापना की गई है।
यह ऐसा क्यों किया गया?
इसलिए कि अँगरेज ने अपने समय में, अपने शासन के सुभीते के लिए भारत में जो शिक्षा-दीक्षा दी थी, उसी का यह परिणाम है कि उस शिक्षा में पालित-पोषित-संरक्षित-परिवर्द्धित एक एरो समुदाय का निर्माण हुआ जो भारत को स्वतन्त्र करने के लिए संबद्ध हुआ और उन्हीं के प्रयत्नों का फल है कि इस प्रकार की स्वतन्त्रता मिली, और इस प्रकार का स्वराज्य आया। गोरे गुरु गण ने भारत को भी कुछ सिखलाया उसकी विद्या ही उसके सामने आयी और वह भारत छोड़ने पर विवश हुआ। गोरे गुरु गण जाते जाते भी ऐसी जाति बनाकर छोड़ गये कि जिस जाति में देशभक्ति के कीटाणुओं की तो बहुत भरमार है किन्तु जिस जाति के मस्तिष्क में भारतीय धर्म, संस्कृति शिक्षा-दीक्षा के कीटाणुओं का अत्यन्त अभाव है। भारत तो चाहिए, उसके लिए मर मिटने को सदा तैयार, पर भारतीय धर्म और संस्कृति नहीं चाहिए—ऐसी दशा है। इसलिए वे खोज में हैं कि एकता के लिए कोई नये सूत्र ढूँढ़कर निकाले जायं। न जाने ये नये सूत्र भारतीय वातावरण में फिट ( ठीक ) बैठते हैं कि नहीं—न जाने क्या होता है? अभी तो नयी शासन प्रणाली की नयी प्रयोगशाला में नये-नये प्रयोग हो रहे हैं।
हमारा अपना विचार है कि हम भारतीयों के लिए नये एकता के सूत्रों की आवश्यकता नहीं है। हमारे प्राचीन भारत की एकता का सूत्र अब भी विद्यमान है—वह है अपनी संस्कृति! इस संस्कृति का सम्बन्ध हमारे अपने धर्म से है और नाना धर्म, नाना पन्थ के रहते हुए भी हमारे पूर्वज एकता में नानात्व और नानात्व में एकता को देखने का पाठ पढ़ा गये हैं। उन्हीं सूत्रों को दृढ़ करने की आवश्यकता है। संस्कृति कहिए संस्कार कहिए, है एक ही बात। अनेक परम्परागत संस्कारों से ही किसी जाति समुदाय, देश, राष्ट्र की संस्कृति बनती है, हमारे देश में नाना धर्म, नाना पन्थ, नाना विचार रहते हुए भी सब एक सूत्र में बँधे रहे। न बँधे रहते तो एक सहस्र वर्ष की भयंकर दासता, विदेशी विधर्मियों की प्रभुता का सुदीर्घकाल, इनमें यह भारत जीवित ही कैसे रहा—इस पर संसार आश्चर्य करता रह गया। वह संस्कृति के कारण ही जीवित रहा, विपरीत परिस्थितियों में भी सब कुछ सहता रहा और फिर उभर गया है। अब अन्य देश के लोग यह देख रहे हैं कि भारत जिस पाश्चात्य प्रजातंत्र का प्रयोग कर रहा है, इसमें कहाँ तक सफल हो रहा है। इस पाश्चात्य प्रजातन्त्र में भारतीय भूमि में क्या-क्या परिवर्तन होंगे इत्यादि।
उनको आश्चर्य है कि जब से सृष्टि बनी, तब से युद्ध-महायुद्ध भी होते आये हैं। उनमें शस्त्रास्त्रों और मारक अस्त्रों का भी प्रयोग होता चला आया है—हिंसा भी चली आ रही है, इसको कोई रोक न सका। पर भारत भी क्या विचित्र देश है कि उसने स्वतन्त्रता की प्राप्ति के लिए सत्य और अहिंसा ( जो कि भारतीय धर्म के दो प्रमुख अंग हैं ) नामक वस्त्रों का प्रयोग किया और सफल भी हुआ—संसार देखता का देखता रह गया कि आश्चर्य, परमाश्चर्य, यह क्या हुआ—ऐसा तो न कभी सुना, न देखा, न हुआ।
अब भी संसार में मत्स्यन्याय का प्रयोग हो रहा है। जैसे एक मछली दूसरी छोटी मछली को निगल जाती है और दूसरी बड़ी मछली उन दोनों को हड़प जाती है, इसी प्रकार की दशा हो रही है पाश्चात्य राष्ट्रों की। सब अपनी-अपनी कक्षा में स्वतन्त्र हैं, तो भी कोई राष्ट्र सुख-समाधान से नहीं बैठ रहा है, कारण उन राष्ट्रों की राजसी अथवा राक्षसी महत्वाकाँक्षा ही है। बलाढ्य राष्ट्र तो आपस में टकरा कर नष्ट होने को फिर ही रहे हैं, पर छोटे-छोटे राष्ट्रों को भी स्वतन्त्रतापूर्वक जीने नहीं दे रहें हैं—
भारत ने स्वतन्त्र होकर संसार के ईर्ष्यालु राष्ट्रों में परस्पर शान्ति, समृद्धि, सौमनस्य के हेतु एक भारतीय संस्कृत से ओतप्रोत सुन्दर उपाय बतलाया है। वह रामबाण औषधि है पञ्चशील, जिसको संसार सेवन करें तो संसार के राष्ट्रों के समस्त दुःख ही जाते रहेंगे। महाभारत में शान्तिपर्व में आमृशंस्य धर्म के प्रसंग से जो धर्मत्व कहे हैं, उन्हीं का तो अनुवाद है पञ्चशील।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत्।
जो बात,जो व्यवहार स्वयं अपने आपको नहीं भाता, प्रतिकूल लगता है, उस प्रकार का व्यवहार हम दूसरों से न करें—
यन्येषाँ हितं न स्याद्, आत्मनः कर्म पौरु षम्॥
हमारे जिन कर्म और पौरुष से दूसरों का हित बिगड़ता है उन कर्मों और पौरुषों को प्रयत्न से त्याग देना चाहिए। हमें अपनी स्वतन्त्रता प्यारी है तो हम दूसरों की स्वतन्त्रता पर आघात क्यों करें, हमें परतन्त्रता अच्छी नहीं लगती तो हम दूसरों को परतंत्र बनाने की क्यों चेष्टा करें? हमें कोई त्रास-भय देवे हमें अच्छा नहीं लगता तब हम अन्यों को क्यों भय दिखलायें, त्रास क्यों दें, इसी में “जीओ और जीने दो”—”स्वयं सुखी रहो औरों को सुखी रहने दो”—किसी पर “आक्रमण मत करो” समझौते से काम लो, अहिंसा का पालन करो, बैर से बैर कभी शान्त नहीं होते इत्यादि उच्च तत्व भारतीय उच्च-संस्कृति के ही तो अंग है और सात्विक अंग हैं। आज संसार हमारे पंचशील के गुण गा रहा है। एक-एक राष्ट्र बारी-बारी से घोषणा करता जा रहा है कि “हमको पंचशील मंजूर है।”
संसार में पिछले सहस्रों वर्षों में अनेक जातियाँ, देश, राष्ट्र उठे, नष्ट हुए—ऐसे कि उनका नाम तक मिट गया। पर वाह रे भारत, तू अब भी जीता है, जीता ही नहीं रहा, अपितु उठकर खड़ा हुआ है। यह तेरी परम्परागत संस्कृति का ही प्रभाव है।
इस नये युग में भी हमको अपनी एकता के लिए नये सूत्रों के टटोलने की आवश्यकता नहीं है। हम अपनी संस्कृति को भी संभाले रहेंगे, तो बने रहेंगे। केवल बने ही नहीं रहेंगे अपितु और बिगड़े हुओं को सुधारेंगे।
स्मरण रहे!
हमारी संस्कृति का सम्बन्ध हमारे धर्म से है। और वे सब धर्मतत्व वेदशास्त्र, पुराण, इतिहास आदि में ओतप्रोत हैं और वे सब या तो वेदवाणी में हैं अथवा देववाणी में हैं। देववाणी से अभिप्राय संस्कृत से है। इसलिए हमारा धर्म, हमारी संस्कृति, और हमारी संस्कृत विद्या इनका घनिष्ठ सम्बन्ध है। उसी ने आज तक हमको एकता के सूत्रों में बान्ध रक्खा है। नयी संस्कृति बनाने में न जाने कितने सहस्र वर्ष लगेंगे और इतने वर्ष लगकर वह हमारी पुण्य-पवित्र भारतभूमि के अनुरूप भी रहेगी कि नहीं, पता नहीं—इसलिए अपनी पुरातन संस्कृति की उपासना कीजिए—हमारे धर्म ग्रन्थों में क्या नहीं हैं जो हम दूसरों से उधार लेकर काम चलाने की इच्छा करें?
यदिहास्ति तदन्यत्र, यन्नेहास्ति न तत्कचित्॥
जो हमारी संस्कृति है, उसी का उच्छिष्ट संसार में बिखरा पड़ा है। जो हमारी संस्कृति में नहीं मिलेगी ऐसी कोई सुवस्तु कहीं भी अन्यत्र देखने को नहीं मिलेगी। इसलिए भारत तू तो वह है, केवल अपने स्वरूप को समझने की बात है—
तत् ‘त्वमसि’ भारत,

