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Magazine - Year 1956 - Version 2

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वर्तमान समस्याओं का हल-चरित्र निर्माण

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(श्री राजीवलोचन चौधरी बी. ए., लखनऊ)

भारत का महत्व अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। कृषि, उद्योग, व्यापार तथा अन्य बातों में भी देश के भीतर बड़ी उन्नति हो रही है। देश में शाँति है, सुव्यवस्था है और हमारे नेता बड़े उत्साह से काम कर रहे हैं। वह दिन दूर नहीं है जब ‘राम-राज्य’ की कल्पना साकार होगी।यह सब पढ़ने और सुनने में बड़ा अच्छा लगता है और इसमें सन्देह भी नहीं कि काफी प्रगति इधर कई वर्षों में हुई है। इतना सब होना आवश्यक था परन्तु इसको ही उन्नति की इति मान लेना घातक होगा। भौतिक साधनों और सुखों की दृष्टि से होने वाली उन्नति पर्याप्त नहीं होती, जब तक मानव-समाज की विचार-परम्परा नहीं बदलती, जब तक सर्व-साधारण की मनोवृत्तियों में अन्तर नहीं आता और जब तक किसी राष्ट्र के बच्चे बच्चे में नैतिकता और चरित्र का उदय नहीं होता। देश की उन्नति को स्थायी बनाने के शिला-आधार तो ये ही बातें हैं। दुर्भाग्य से हम इन्हीं बातों की ओर ध्यान नहीं दे रहें हैं। जाति और राष्ट्र का विकास मानों एक लम्बा रास्ता है। आजादी प्राप्त करने तक हमने केवल मंजिल पार की है और हमारी अन्तिम मञ्जिल होगी हमारे राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण जिसके बिना हम ऊँचे उठते हुए भी त्रिशंक की भाँति अधर में लटके रहेंगे

इस समय हमारी सबसे बड़ी राष्ट्रीय आवश्यकता-चरित्र है जिसके बिना राष्ट्र निर्माण का काम अधूरा रहेगा। यह चरित्र’ क्या है? अनेक ग्रन्थों में चरित्र की परिभाषाएँ दी हुई है, जो आसानी से देखी जा सकती है। यदि बौद्धिक-विश्लेषण की दृष्टि से देखा जाय, तो चरित्र अनेक सद्गुणों की समष्टि है। सत्य,ईमानदारी,दया,उदारता,विनय,त्याग,सहनशीलता, कर्त्तव्य पालन,न्याय प्रियता,प्रेम आदि अनेक गुण ऐसे हैं जो चरित्र के अंतर्गत आ जाते हैं। इस प्रकार की बौद्धिक व्याख्या सरल और संक्षिप्त जरूर है परन्तु न तो वह व्यवहारिक है और न व्याख्यात्मक। चरित्र क्या है, इसे तो कुछ उदाहरणों-कुछ प्रसंगों द्वारा ही स्पष्ट किया जा सकता है। पाठकों के लाभार्थ ऐसे प्रसंग और उदाहरण हम नीचे दे रहे हैं।

हमारे परिचित एक सज्जन बड़े धर्मात्मा पुरुष हैं। अपनी राह आते हैं, अनबन नहीं है और न किसी से लेन-देन है। लाखों की संपत्ति उनके पास है। जिस राह से निकलते हैं, लोग आदर से उनको प्रणाम करते हैं। प्रातःकाल और सायं वे माला भी जपते हैं। कई मन्दिरों में उनकी ओर से पूजा होती है। दान-दक्षिणा देने में वे आगे रहते हैं। नगर में उनकी बड़ी है। सैकड़ों नौकर-चाकर हैं। लोग समझते हैं वे बड़े चरित्रवान हैं। पंडितजी के जीवन का एक ऐसा पहलू है, जिसकी ओर किसी की निगाह भी नहीं जाती। उन्होंने यह धन-सम्पत्ति और मान-मर्यादा, कैसे पैदा की, इस पर किसी ने विचार नहीं किया। माल का लदान करने में, प्रतिमास हजारों रुपया अधिकारियों की जेबों में वे डालते हैं। बिक्री कर और आय-कर बचने से उनको लाखों की आमदनी हो जाती है, उनकी हिसाब-किताब की बहियाँ दो प्रकार की हैं, एक में असली हिसाब रहता है और दूसरी में नकली जो आयकर और बिक्री-कर के दफ्तरों में भेजी जाती हैं और चाँदी के बल अफसरों का मुँह बन्द कर दिया जाता है। अब सोचिये, क्या पंडितजी चरित्रवान् हैं? वास्तव में पंडितजी किसी व्यक्ति विशेष को कोई हानि नहीं पहुँचाते, इसी से सभी उन्हें चरित्रवान कहेंगे, परन्तु वे देश और समाज को तो बड़ी हानि पहुँचाते हैं। आय और बिक्री का धन जो जनता के लाभार्थ उनसे लिया जाना चाहिए और जिसे देना ही उनका ‘चरित्र’ गिना जाना चाहिए, वे चुरा लेते हैं। यही नहीं कितने ही अफसरों को प्रलोभन देकर वे उनका चरित्र भ्रष्ट करते हैं।

अब रेलवे या अन्य दफ्तरों के अफसरों की बात लीजिए। पंडितजी को लदान की सुविधाएं देकर या करों की छूट देकर किसी व्यक्ति विशेष को हानि तो नहीं पहुँचाई। पंडितजी का लाभ हुआ और अपना भी साथ में लाभ हुआ फिर क्या वे चरित्रवान् नहीं है? पर सोचिये उन्होंने समाज या सरकार का कितना उपकार किया। सरकार से उन्हें जो वेतन मिलता है, वह इसीलिए कि वे न्यायपूर्वक जनता के लिए व्यापारियों से कर वसूल कर ले, या लदान या माल भेजने में जो आवश्यक समझा जाय, जनता के हित में, उसे पहले भेजें। उन्होंने ऐसा नहीं किया। वेतन में दिया गया जनता का वह धन व्यर्थ गया। उनकी शिक्षा-दीक्षा पर लगाया गया सरकारी धन भी बेकार गया और पंडितजी जैसे व्यापारियों से कर वसूल न करके सरकार की गरीबी बढ़ाई और उस कमी को पूरा करने के लिए सरकार को नये कर लगाने के लिए प्रेरित किया। इस ओर न तो आप सोचते हैं, न हम, न सरकार और न वे अफसर। वे अफसर उच्च शिक्षा प्राप्त हैं, विनयी हैं, समाज में उनका सम्मान है, उनसे सब डरते हैं, परन्तु यह सब गुण मिल कर भी ‘चरित्र’ की संज्ञा नहीं प्राप्त कर सकते।

हम एक डाक्टर साहब को जानते हैं। उनके घर पर साधु-संतों की भीड़ मची रहती है। सन्ध्या से बारह बजे रात तक अंधाधुन्ध कीर्तन चलता रहता है। सैकड़ों माँ-बहनें भी इकठ्ठा होती हैं। डाक्टर साहब धर्म के प्राण तथा विनय के अवतार हैं। रुपये-पैसे की कमी नहीं कीर्तन में सैकड़ों की प्रसादी बँटती है। इस दृष्टि से डाक्टर साहब चरित्रवान् हैं, उनका चरित्र अनुकरणीय है। अब प्रातः काल का दृश्य देखिये। डाक्टर साहब अपने औषधालय में वर्तमान हैं। पचासों रोगी खड़े, बैठे और पड़े हैं। लाला तथा बाबू लोग, डाक्टर साहब से पहले मिल लेते हैं और उनसे डाक्टर साहब मुस्कुरा कर बातें करते हैं, उन्हें घण्टों देखते और जाते समय नमस्कार भी करते हैं। मैले-कुचैले लोगों का नंबर बारह बजे आता था। उनके करा-डडडड और पीड़ा की ओर से डाक्टर साहब उदासीन है, उन्हें देखते समय डाँटते जाते हैं और नुस्खा लिखने में जल्दी करते हैं। ऐसे रोगी कहते हैं-डाक्टर साहब, पैसा नहीं, दवा सस्ती दीजिए। उत्तर मिलता है- पैसा नहीं तो आये क्यों हो? दवा मुफ्त की नहीं मिलती। उधर डाक्टर साहब अपने कम्पाउंडरों को समझा देते हैं देखो, इन्हें दवा में पानी मिलाकर देना। अमीरों को रोग न होने पर भी साधारण पानी या ग्लूकोस के इन्जेक्शन देना आदि। अब आप बताइये डाक्टर साहब कहाँ तक चरित्रवान हैं? दुर्भाग्य से हमारे समाज में इन अयोग्य व्यवहारों को चरित्रहीनता नहीं माना जाता।

इसी प्रकार जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी चरित्रहीनता व्याप्त हो रही है। उसी का परिणाम है कि न्यायालयों में न्याय की हत्या हो नहीं है, निर्माणकार्य की योजनाओं से जो लाभ होना चाहिए नहीं हो रहा है, सरकारी विभागों से जो जनता को सुविधाएं मिलनी चाहिए, नहीं मिल रहीं है। इसका एकमात्र कारण यह है हम लोग चरित्र के वास्तविक अर्थ को भूल बैठे हैं। दुर्भाग्य से, केवल व्यभिचार, चोरी, डाका और हत्या के कार्य ही चरित्रहीनता के अंतर्गत माने जाते हैं। अब हम पतन की एक ऐसी सीढ़ी पर पहुँच गये हैं, जिसके बाद सर्वनाश निश्चित है। इस दुखद स्थिति से त्राण पाने का एक मात्र उपाय चरित्र है। जिस चरित्र की बात हम कह रहे हैं, उस चरित्र का अर्थ क्या है?

यों तो हम सवेरे से शाम तक अनेक काम करते हैं, परन्तु मुख्य काम वही है, जिसे हम अपना व्यापार, नौकरी या अन्य कोई धंधा कहते हैं, जो हमारी जीविका का आधार है। इस मुख्य कार्य को छोड़कर प्रायः हमारे अन्य कार्य ‘व्यक्ति गत’ ही कहलायेंगे। हमारी नौकरी या व्यापार या धंधा, ‘व्यक्ति गत’ कार्य नहीं कहलाना चाहिए। इसे व्यक्ति गत समझ लेने के कारण ही चरित्र-दीप उत्पन्न होता है। उसे हम अपने स्वार्थ का साधन समझ बैठते हैं, इसीलिये झूँठ बोलते हैं, घूस देते हैं, और घूस लेते हैं। उदाहरण के लिए कार्यालय का एक कर्मचारी, प्रायः यही समझता है कि इस नौकरी द्वारा हमें वेतन मिलता है, इस पद से मुझे जहाँ तक हो धन पैदा कर लेना चाहिए। कोई-कोई क्लर्क या बाबू समझते हैं। कि हमारी नौकरी तो पक्की है, जितना थोड़ा काम हम कर सकते हैं, करें, अधिक परिश्रम करने से हमारा क्या लाभ होगा? ऐसे विचार इसीलिए उत्पन्न होते हैं कि हम अपने धंधे को केवल अपने स्वार्थ का ही साधन समझते हैं। वास्तव में हमारे मन से यह भ्रम दूर होना चाहिए। हमारा धंधा, नौकरी या दुकानदारी या अन्य कोई काम ‘सामाजिक’ है। हम उसी के द्वारा समाज, राष्ट्र और देश को लाभ या हानि पहुँचाते हैं। मान लीजिए आप ठेकेदार हैं, सरकार से ठेका लेकर आप बाँध या पुल बनाते हैं। यदि आपने अपने निजी लाभ के लिए, इञ्जीनियर और दूसरे देख-रेख करने वाले कर्मचारियों को धन का लोभ देकर उस काम को करने में खराब माल-मसाले का प्रयोग कर दिया, तो आपने समाज को हानि पहुँचाई और राष्ट्र का अहित किया। यदि आपने अपना काम करते समय देश की बात सोची तो, आप अवश्य अपना कर्तव्य पालन करेंगे। कभी-कभी यह सोच कर बड़ा दुःख होता है कि अपने मुख्य कारोबार द्वारा हमारे भाई देश और समाज को बड़ी से बड़ी हानि पहुँचाते हैं, परन्तु दिन के घंटे दो घंटे समाज सेवा के लिए अवश्य देते हैं। यदि ध्यानपूर्वक देखा जाय तो इन सब बातों से कोई लाभ नहीं है। हम अपनी दुकान, मकान या कुर्सी पर बैठ कर ही सब से बड़ी समाज सेवा कर सकते हैं। उसी से हमारा चरित्र बनता है।

हम जो भी व्यवसाय आदि करते हैं, उससे हमारे राष्ट्र का हित या अहित होता है- यह सिद्धाँत ही चरित्र-निर्माण की कुञ्जी है। हम जो भी काम कर रहे हों, उसे ध्यान पूर्वक करे, परिश्रम से करें और उसे पूरा करने में अपना उत्तरदायित्व पूरी तरह निबाहें। यह सब कर सकना हमारे ही हाथ में है। इन सब बातों को समझने में देर नहीं लगती और न कुछ खर्च ही होता है। इन्हें व्यवहार में लाने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण हम आप सब मिलकर स्वयं कर सकते हैं और बिना कठिनाई के कर सकते हैं। जब हम सब मिल कर ऐसा करने लगेंगे, तो उससे समाज का वातावरण अपने आप स्वस्थ हो जायगा और जो कुछ दोष आज दिखाई दे रहे हैं, अपने आप दूर हो जायेंगे।

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