अधिक बच्चे पैदा मत कीजिए
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(श्री रामकुमार शर्मा, मथुरा)
भारत में जनसंख्या के हिसाब से शश्यों की—अन्न की कमी है। इस अभाव को दूर करने के लिये, जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने के लिये, बंग दुर्भिक्ष-काण्ड की पुनरावृत्ति को रोकने के लिये, आज देश में शान्ति युद्ध चल रहा है। देश में विकास योजनाओं की सेना खड़ी कर दी गयी है। भारत के विशाल जनसमूह ने सरिताओं की तीव्र धाराओं को तोड़कर, बंजरों को सींचकर, टीलों को तोड़कर, लहलहाते हुए खेतों में परिणत कर दिया है। यहाँ अविश्रान्त परिश्रम द्वारा राष्ट्र के उत्पादन को बढ़ाने का एक महत् आयोजन पूरा किया गया। इस उत्थान कार्य में, शासक मण्डलों ने भी सक्रिय रूप से देश को समृद्धिशाली बनाने में सहयोग किया।
पर विश्व प्रसिद्ध शस्यश्यामला भारत भूमि में यह अभाव और दारिद्रय का वीभत्स ताण्डव, उपस्थित ही क्यों हुआ? क्या कारण है, इसके? इसकी खोज करने पर हमारे सामने दो भाँति की समस्यायें उपस्थित होती हैं। प्रथम तो जनसंख्या के अनुपात से हमारे देश की उत्पादन शक्ति पूरी नहीं पड़ती और दूसरी चिन्ता भरा विषय है, कीड़े-मकोड़े की भाँति बढ़ती हुई भारत की जनसंख्या। यदि यह का उत्पादन अधिक होता तो, इस विषय की चर्चा भी व्यर्थ सी होती, पर दुर्भाग्यवश अनेक कठिनाइयों और दैवी-प्रकोपों के कारण हम राष्ट्र का उत्पादन-विशेषकर खाद्य का उत्पादन उतनी शीघ्रता से नहीं बढ़ा सके जितनी शीघ्रता से हमने यहाँ की जनसंख्या को बढ़ाया। समस्या के इन दोनों रूपों को देखते हुए हमारे सामने वही समाधान उपस्थित होता है कि इन दोनों के बीच सन्तुलन की स्थापना हो। इस सन्तुलन की चर्चा करते हुए प्रसिद्ध अर्थशास्त्री माल्थस, जिसने अट्ठारहवीं शताब्दी के अन्त में घोषणा की थी “प्रत्येक राष्ट्र की जनसंख्या का उत्पादन उस मात्रा में बढ़ नहीं पाता” पर ध्यान जाता है। माल्थस का सिद्धान्त, व्यवहार की कसौटी पर सत्य उतरता है, या नहीं, यह तो विवादास्पद है, पर इसके द्वारा समस्या समाधान-पथ के किसी सत्य पर हमारी दृष्टि अवश्य पड़ जाती है।
इन समस्याओं पर विचार करते हुए कितने ही विद्वानों यह घोषणा की है—”जब तक भारत जनसंख्या वृद्धि रोकेगा नहीं, तब तक कृषि उत्पादन बढ़ाने के प्रयत्नों से सुनिश्चित या पूरा लाभ नहीं हो सकता, जो कुछ वृद्धि हो भी तो वह संख्या वृद्धि के अँशों में ही खप जायगी; कभी पूरी नहीं पड़ेगी।” इन विद्वानों के दिये गये निर्णयों पर, भारत को इसे अपनी एक महत्वपूर्ण समस्या मान कर, इसके लिये कुछ करना आवश्यक हो नहीं अनिवार्य होना चाहिये, नहीं तो प्रकृति द्वारा उत्पन्न अकाल, महामारी, रोग युद्ध-हिंसा इसके समाधान के लिये अनिवार्यता आयेगी ही। वह किसी के रोके रु कने वाली नहीं।
पण्डित जवाहरलाल नेहरू कहते हैं, कि भारत का एक 2 व्यक्ति हमारे लिये एक समस्या है और आज भारत की प्रतिवर्ष पचास लाख जनसंख्या की वृद्धि इस समस्या का कितनी गम्भीर और भयावनी बनाते जा रही है, यह हमारे लिये एक घोर चिन्ता का विषय है।
भारत के खण्डीकरण के पूर्व सन् 1941 ईस्वी में यहाँ की जनसंख्या 389 करोड़ के लगभग थी, जिसमें 31.9 करोड़ हिन्दुस्तानी भारत में और 7.॰ करोड़ पाकिस्तानी भारत की थी। सन् 1872 से 1901 ई॰ तक अखण्ड भारत में केवल 54 प्रतिशत की वृद्धि हुई और 1901 से 1954 तक में संघीय भारत में 52 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
भारत जैसे विशाल देश की जनसंख्या में 15 प्रतिशत की वृद्धि होना, पाँच करोड़ जनसंख्या का बढ़ना है। यह बढ़ी हुई जनसंख्या,ब्रिटेन, फ्रांस और वेल्स की जनसंख्या के बराबर है और आस्ट्रेलिया की जनसंख्या से तिगुनी है। इस प्रकार कुल जोड़ बहुत अधिक है। इस विचार क्रम में हमें यह भी याद रखना चाहिये कि चीन को छोड़कर विश्व के अन्य सभी देशों से भारत की जनसंख्या अधिक है और समस्त संसार की आबादी का पांचवां अंश है। प्रोफेसर हिल, जो यह हिसाब लगाने में बड़े दक्ष हैं, का कहना है कि 1970 में भारत की जनसंख्या (यही वृद्धि क्रम बनी रहने की दशा में) 65 पैंसठ करोड़ की हो जायगी।
किसी देश की जनसंख्या वृद्धि दो कारणों से होती हैं:—(1)मृत्यु की गति की अपेक्षा उत्पन्न होने की गति की अधिकता और (2) देश से जनसंख्या की निकासी की अपेक्षा प्रवेश का आधिक्य।
भारत में जनसंख्या वृद्धि के उपर्युक्त दोनों कारण हो सकते हैं, किन्तु फिर भी निश्चित कारण अधिक सन्तानोत्पत्ति ही है। आज भारत में प्रति दस मिनट पर औसतन 80 बच्चे पैदा हो रहे हैं और दूसरी ओर प्रति दस मिनट पर औसतन मृत्यु संख्या, प्रति वर्ष घटती ही जा रही है, इसके
फलस्वरूप अतिजीवन की मात्रा बढ़ती ही जा रही है।
आज के विचारकों की वाणी में मृत्यु संख्या की अधिकता उस देश की असभ्यता का परिचारक है। शायद, असंयमित और अव्यवस्थित जीवन क्रम के आधार पर ही इन शब्दों की सृष्टि हुई हो। इस विचार की संगतता में भारत सबसे अधिक असभ्य देश माना जायगा। वर्तमान काल में मृत्यु संख्या का क्रम यों बताया जाता है—
1. अमेरिका—10-6 प्रति हजार
2. जर्मनी—12-3 “ “
3. ब्रिटेन—12-2 “ “
4. फ्रांस—15-3 “ “
5. जापान—17-6 “ “
6. भारत—26-6 “ “
इस मृत्यु संख्या वाली सभ्यता के हिसाब से भारत इस समय सर्वाधिक असभ्य देश हैं, किन्तु मृत्यु संख्या का क्रम प्रतिवर्ष घटता जा रहा है, इससे यह माना जाना चाहिये कि सभ्यता में हमारी (भारत की )प्रगति हो रही है।
भारत के शासक मण्डल ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुधारने की ओर समुचित ध्यान दिया है। पञ्चवर्षीय योजना में औषधि, सफाई, मलेरिया निरोधक योजना, प्रसूति गृह, सन्तान नियमन, चिकित्सालय आदि के लिये करोड़ों रुपये खर्च किये जाने की स्वीकृति दी गयी एवं तदनुसार कार्य भी किये जा रहे हैं, इस से क्रमशः मृत्यु संख्या घटने में गति बढ़ती जाती है, पर इससे खाद्यान्नों की समस्याओं का समाधान तो नहीं हो पाता है। देश के किसी न किसी भाग में बाढ़,
भूकम्प,अतिवृद्धि अनावृष्टि आदि का संकट बना ही रहता है अतः यहाँ की जनसंख्या और खाद्यान्न का उत्पादन भी बढ़ा दिया जाय और स्वास्थ्य की रक्षा के सारे सम्भव उपायों से काम लेकर,
अनुकूल स्थिति भी बनाली जाय, पर इससे जनसंख्या की अतिवृद्धि तो रुक नहीं सकता।
सन्तति निरोध की समस्या का समुचित समाधान क्या है? क्या कानून और विधान का
कठोर नियन्त्रण इसकी सफलता में सक्षम हो सकता है? कदापि नहीं। तो इस स्थिति से बाहर
निकलने का उपाय क्या होगा?
शिक्षा और सदाचार मय जीवन का प्रचार और प्रसार ही इसके प्रधान उपायों में से एक है। यह प्रचार और प्रसार (ही इसके प्रधान उपायों में से एक है यह प्रचार और प्रसार) वारणी के साथ मनोभावों एवं आचरणों तक में उतारना होगा, जिससे हम सभी राष्ट्र के उत्तरदायित्व के साथ उत्पन्न किये सन्तानों के विकास और उन्नति का उत्तरदायित्व भी अपने हृदय में धारण कर सदाचारमय जीवन बिताने की निष्ठा में रहें और चलें।

