बुरे विचारों से सावधान!!
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(श्री लालजीराम शुक्ल, एम. ए.)
मनुष्य के मन में चलने वाले विचार बाजार में चलने वाले लोगों के समान अनेक और कई प्रकार के होते हैं। अपनी दुकान पर बैठा हुआ व्यापारी इन अनेक राहगीरों को देखता रहता है। इसी तरह चतुर मनुष्य विचारों के प्रति साक्षी भाव रखता है। विचारों को मन में चलना रोक देना, उस प्रयत्न के समान है, जो बाजार के राहगीरों के रोकने में किया जाता है। हाँ, हमें अपनी दुकान पर हर एक प्रकार के विचार को ठहरने न देना चाहिए। हमें विचारों के प्रति सतर्कता रखनी चाहिए। भले और बुरे सभी प्रकार के विचार हमारी चेतना के समक्ष आते हैं। भले विचारों का स्वागत करना और बुरों को भगा देना, यही मार्ग कल्याण की ओर ले जाता है।
भले और बुरे विचारों की परख कैसे हो? भला विचार वह है, जो हमारे स्वागत करने पर ही हमारे पास आता है और जिसका तनिक भी अनादर होने से हमसे भाग जाता है। बुरा विचार वह है, जो चोरी से आ जाता है अथवा बरबस मन में घुस जाता है और एक बार घुस जाने से निकालने पर भी नहीं निकलता। जो विचार हमें अपने मन में आकर शान्ति दे, वह भला विचार है; पर बुरा विचार कभी-कभी बड़ा प्रिय रूप धारण करके आता है। बुरे विचार की बुराई कुछ काल के बाद ज्ञात होती है। दूसरों के अकल्याण की चिन्ता करना, ईर्ष्या करना, पहले-पहल अच्छे लगते हैं, पर ये विचार मन को इतना निर्बल बना देते हैं कि हम इनको अपने मन से निकालना भी चाहें, तो निकाल नहीं पाते। इन विचारों के बाद अपने ही अकल्याण के विचार मन में आने लगते हैं। मनुष्य अनेक प्रकार के अकारण भयों से डरने लगता है। इस तरह वह वास्तव में अपना विनाश कर लेता है।
जिस तरह मनुष्य साँप-बिच्छू को अपने सिरहाने रख के नहीं सोता उसी तरह उस बुरे विचारों को अपने मन में स्थान न देना चाहिए। जब बुरे विचारों को अनेक बार चेतना में प्रवेश करने से रोक दिया जाता है, तो फिर वे उसमें आने की हिम्मत नहीं करते। प्रतिक्षण इस कार्य में सतर्कता की आवश्यकता है। हम समझते हैं, अपने मन रूपी मन्दिर के हम मालिक हैं, पर बात ऐसी नहीं। मन तो एक प्रकार की सराय है, जिसमें नित्य नये यात्री लोग आया ही करते हैं और हम चौकीदार की तरह हैं। हमें चाहिए कि राहगीरों को मकान का मालिक न बनने दें और न उन्हें उससे कुछ उठाकर ले जाने दें।
जब कोई अवाँछनीय विचार मन में आवे तो उसके प्रतिकूल विचार लाकर उसे हटा देना चाहिए। किसी विचार का दमन कर देने से उस विचार की शक्ति हमें मिल जाती है। जब कोई विचार प्रबलता से मन में उठे,तो थोड़े काल के लिये उस विचार को छोड़ देना, हमारा पहला कर्तव्य है। इस प्रकार उस विचार पर ही हम विजय नहीं पाते; वरन् हम जिस काम को करना चाहते हैं, उसमें भी सफल हो जाते हैं। जब कोई संकल्प मन में उठे और वह संकल्प अपने कल्याण का हो, तो उस संकल्प को धारण कर के कुछ काल के लिये उसके विषय में चिन्तन करना छोड़ देना चाहिये। मानो इस तरह हमने खेत में बीज बो दिया है। बीज बो देने के बाद खेत में पानी खींचने की आवश्यकता है। आशा रूपी-जल, विचार रूपी-बीज को उगने के लिये डाला जाता है। अपने आप से हमें यही कहते रहना चाहिये—कहना चाहिये कि हमारा अमुक संकल्प है, वह अपने आप फलित होगा, जब उसके लिये उपयुक्त समय आ जायगा। कोई भी शुभ कल्पना व्यर्थ नहीं जाती।
संकल्प के फलित होने के लिये उद्विग्न मन होना उचित नहीं है। संकल्प का फलित होना, हमारे प्रयत्न पर ही निर्भर नहीं है, इसके लिये वाह्य वातावरण के अनुकूल होने की आवश्यकता है। वातावरण एकाएक अनुकूल नहीं हो जाता। वातावरण ही हमारे अदृश्य मन का कार्य है। अदृश्य मन वह विश्वकर्मा है, जो समस्त सृष्टि की रचना करता है। अपनी आज्ञा देने और मकान के तैयार होने में देरी अवश्य लगती है। जो संकल्प दृढ़ता से धारण किया जाता है, उसके अनुसार बाह्य परिस्थितियाँ भी बनती जाती हैं।
जिस प्रकार की हम तैयारी चाहते हैं, उसी प्रकार के विचार हमें अपने चेतन मन में ठहरने देना चाहिये। चेतन मन के विचार ही कुछ काल बाद अचेतन मन में चले आते हैं। फिर इस स्वभाव के अनुकूल वाह्य सृष्टि भी बन जाती है; अतएव जो भले जगत में रहना चाहता है, उसका पहला कर्त्तव्य यही है कि चेतन मन में आने वाले विचारों का निरीक्षण करता रहे। उसके मन में सभी भले विचार तो ने आवेंगे; पर बुरे विचारों का आना रोका जा सकता है। इस प्रकार हमारा आन्तरिक जीवन सुखी हो सकता है।

