तीर्थ-यात्रा और धार्मिक मेलों का उद्देश्य
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
(श्री लक्ष्मीनारायण टण्डन ‘प्रेमी’ एम. ए.)
भारतवर्ष धर्म प्रधान देश है। यहाँ की पृथ्वी का कण-कण महत्त्वपूर्ण है। यों तो संसार के देशों में अनेक तीर्थ-स्थान हैं, पर भारतवर्ष में तीर्थ-स्थानों की भरमार है। तीर्थ-स्थान से तात्पर्य ही है पवित्र स्थान और भारत की भूमि अपने महापुरुषों के महान कृत्यों के कारण अपने को कृत-कृत्य कर चुकी हैं। भारत के हिन्दू हमें जितनी तीर्थयात्रा करते दिखाई देते हैं उतने और कहीं के भी नहीं। यों तो ईसाइयों और मुसलमानों के भी जेरुसलाम, वेंरकन सिटी, मक्का और मदीना आदि तीर्थ हैं। भारतवर्ष में अजमेर शरीफ जैसे अनेक स्थान तथा दरगाहें हैं, जो मुसलमानों के पवित्र स्थान हैं।
हमारे ‘धर्म’ के अर्थ बहुत व्यापक है, और ‘तीर्थ’ के भी। भारतवर्ष ने सदा ही आध्यात्मिक विकास तथा आत्मिक उन्नति को ही अपने जीवन का लक्ष्य बनाया है। अतः अतीत काल से हमारे ऋषि-मुनियों ने अपनी तपस्या, त्याग और परोपकार से अपनी जन्म-भूमि तथा निवास-स्थान को सार्थक ‘तीर्थ’ नाम दिलवाया है। मैंने कहा है कि भारतवर्ष में अनेक तीर्थ हैं परन्तु उत्तर प्रदेश में तो तीर्थों की भरमार है, जहाँ भारत के कोने-कोने से यात्री आते रहते हैं। राम की जन्मभूमि अयोध्या तथा कृष्णा की जन्म तथा लीलाभूति 4 कोस के घेरे की ब्रजभूमि है। जिस के अंतर्गत मथुरा, वृंदावन, गोकुल डडड, डडडड घाट, बड़े दाऊजी, रावल, गोवर्धन, राधाकुण्ड, गिरिराज, जतीपुरा, डीग, कामवन, नंदगांव, प्रेम-सरोवर बरसाना, मधुवन आदि हैं। भगवान बुद्ध से सम्बन्ध रखने वाले स्थान बोध-गया, सारनाथ, राजगृह, कालसी आदि भी तीर्थ-स्थान ही हैं। आबू पर्वत आदि जैनियों की तीर्थभूति है अमृतसर आदि सिक्खों के तीर्थ हैं।
साधारण परदेशी यात्रियों की बहुत कुछ स्थानीय पण्डों पर निर्भर होना पड़ता है, और जो कुछ वे दिखा देते या स्थान की महत्ता बता देते हैं, उन्हें उसी पर विश्वास और सन्तोष करना पड़ता है। यदि यात्री जिज्ञासु हुआ तो कुछ पूछ पाछ कर और थोड़ा देख या जान लेता है- बहुत कुछ छूट भी जाता है। बेचारा इसी में अपने को धन्य समझता है-पुण्य का भीगी तो वह हो ही गया तीर्थ-यात्रा करने से आजकल न वैसे श्रद्धालु यात्री रहे हैं और न वैसे सात्त्विक भावनाओं वाले पण्डे। पहले पण्डे ‘ गाइड’ का काम करते थे। वे सन्तोषी-तपस्वी ब्राह्मण जो भी सहर्ष श्रद्धालु यात्री दे देता था, उसी से सन्तुष्ट होकर अपना कुटुम्ब पालते थे, किन्तु आजकल पण्डों का उद्देश्य ही प्रायः हो गया है यात्रियों की धोती तक उतरवा लेने का प्रयत्न। यह भारतवर्ष का दुर्भाग्य है। पहले विद्वान् पंडों यात्रियों को स्थान की धार्मिक महत्ता तथा इतिहास बताते और दिखाते थे और आज केवल धर्म, जो कुछ और जैसे भी हो यात्री से कुछ लेना मात्र रह गया है। पण्डों को ही क्यों दोष दिया जाय? समाज के प्रत्येक क्षेत्र में यही पाखण्ड और छिछोरपन रह गया है। आत्मा का लोप हो चुका है, बाहरी ढाँचा मात्र अवशेष है।
हमारे पुरखों ने बहुत सोच-समझ कर तीर्थयात्रा करने का आदेश दिया है। वे जानते थे यदि ‘यात्रा के लाभ’ के नाम पर देश वासियों को घूमने को कहा जायगा, तो बहुत कम लोग ‘यात्रा का लाभ’ उठायेंगे रुपये-पैसे की दिक्कत, साँसारिक झञ्झटों तथा अस्वास्थ आदि न जाने कितने बहाने निकल आयेंगे, परन्तु प्रकृति से ही धर्म-भीरु हिन्दू ‘धर्म’ के नाम पर अपना परलोक बनाने के लिए-सारी कुपरिस्थितियों की अवहेलना करते हुए धर्म लाभ के हेतु अवश्य यात्रा करेंगे, और अप्रत्यक्ष रूप में यात्रा के सब लाभों को भोग सकेंगे। तीर्थयात्रा करने से अनेक लाभ हैं। स्थान-स्थान की वेषभूषा, रहन-सहन, आचार-विचार, रंग-रूप, भाषा, वनस्पति, पैदावार आदि भिन्न-भिन्न होती है, अतः तीर्थयात्री का ज्ञान और अनुभव विस्तृत होता है। धार्मिक-ऐतिहासिक, भौगोलिक, कलात्मक, सामाजिक, आर्थिक तथा सामयिक ज्ञान तो होता ही है-मन्दिर और मूर्ति के सामने जाकर, श्रद्धा से नतमस्तक हो अपने कालुष्य का विसर्जन कर कुछ समय तक यात्री आत्मविस्मृति करके इस लोक से उस लोक को पहुँच जाता है। निश्चय रूप से स्थायी तथा सात्त्विक प्रभाव उसके हृदय और आत्मा पर पड़ता है। उसके हृदय में संसार की अनित्यता और विलास तथा वैभव के क्षणिक एवं मिथ्या अस्तित्व का ज्ञान उदय होता है, और अपने भविष्य के संशोधित जीवन तथा इस लोक और परलोक पर वह सोचने लगता है। परमात्मा के प्रति सच्ची भक्ति , सद्भावनाओं, सद्विचारों सत्कर्मों, परोपकार तथा दान-पुण्य आदि के प्रति श्रद्धा उत्पन्न होती है, और वह वहीं उनका श्रीगणेश भी कर देता है। अपने पुरखों तथा प्राचीन इतिहास की महत्ता का सच्चा आभास उसे मिलता है। इसके अतिरिक्त जलवायु का परिवर्तन और नाना प्रकार के रंग-बिरंगी प्राकृतिक दृश्य-झरने, पर्वत, कंदरा, जंगल, पशु-पक्षी आदि-उनके स्वास्थ्य तथा मन पर अपना अमिट प्रभाव डालते हैं। ईश्वर की महत्ता एवं अपनी लघुता का भी अनुभव वह करता है, तथा अपने और विराट प्रकृति के अटूट सम्बन्ध को समझकर ‘ब्रह्मास्मि’, ‘शिवोऽहम्’ महामंत्र का अर्थ समझ पाता है। ईश्वर की दी हुई आंखों का फल वह ईश्वर की कारीगरी और उसकी विचित्र लीला देख कर पाता है। उसकी निरीक्षण-शक्ति , प्रकृति के ज्ञान तथा विज्ञान की उपयोगिता की भावना में वृद्धि होती है। आजकल प्रदर्शनियों का फैशन सा है। प्रदर्शिनी के टीपटाप, अनेक उपायों तथा धन-खर्च से जो उद्देश्य सिद्ध होता है, वह अनायास ही तीर्थ-स्थान तथा मेलों से होता है।
भारतवर्ष के चार प्रसिद्ध धार्मिक हैं। पूर्व में समुद्र-तट पर जगन्नाथ पुरी दक्षिण में समुद्र-तट पर रामेश्वरम्, पश्चिम में समुद्र-तट पर द्वारिकापुरी तथा उत्तर में हिमालय की गोद में बदरीनाथपुरी। धर्म-ग्रन्थों में कहा गया है कि प्रत्येक हिन्दू का धर्म है कि वह चारों धाम की यात्रा करे। बिना ऐसा किए उसे मोक्ष नहीं मिलेगा। राष्ट्रीयता की भावना जागृत करने का कितना अमोघ उपाय है। यात्री अनुभव करेगा कि मेरा राष्ट्र सम्पूर्ण भारतवर्ष है। वह कितना विस्तृत और विशाल है। प्राकृतिक सौंदर्य, धन-धान्य से पूर्ण, वनस्पतियाँ तथा खनिज पदार्थों का भंडार यह मेरा भारतवर्ष कितना भव्य है। यात्री के हृदय में स्वतः स्वदेश-प्रेम की पूत-भावना यात्रा से जागृत होगी। समुद्र-तट का जीवन और दृश्य तथा पर्वतीय दृश्य और जीवन एकबार निकट से देख लेने पर क्या भूला जा सकता है?
भारतवर्ष की सात पवित्र पुरियाँ हैं। 1. अयोध्या 2. मथुरा, 3. हरिद्वार, 4.काशी, 5.काँचीवरम्, 6.उज्जैन तथा 7.द्वारका। किसी की भारतवर्ष के मध्य भाग में, किसी की दक्षिण भाग तथा पश्चिम भाग में इनकी स्थिति है। वैसे ही भारतवर्ष के प्रसिद्ध द्वादश ज्योतिर्लिंग निम्नलिखित हैं- 1. सोमनाथ 2.वयम्बकेश्वर 3.ओंकारेश्वर 4.महाबलेश्वर 5.केदारनाथ 6.विश्वनाथ 7. वैद्यनाथ 8. रामेश्वर 9. मल्लिकार्जुन 10. नागनाथ 11.घृषणेश्वर 12. भीमा शंकर। वैसे ही विभिन्न देवी पीठ विभिन्न स्थानों में हैं।
अब तो समस्त तीर्थों की यात्रा करेगा, वह स्वाभाविक ही है कि प्रायः समस्त भारतवर्ष घूम लेगा और उससे परिचित हो जायगा। व्यापार तथा वाणिज्य के दृष्टिकोण से भी यह ज्ञान उसके लिए लाभप्रद सिद्ध होगा।
हमारे तीर्थ-स्थान प्रायः प्रकृति की केलि-भूमि में स्थापित किए गए हैं। मनुष्य कूप-मण्डूक नहीं रह जाता । एक सुन्दर वस्तु सदा के लिए हर्ष का कारण होती है कि व्यापकता को अनुभव-प्राप्त यात्री समझ पाता है। हमारे धर्म-ग्रन्थों में तो प्रत्येक हिंदू के लिए तीर्थ-यात्रा करने का आदेश है। तीर्थ-यात्रा के बिना जीवन नीरस, व्यर्थ, धर्म-रहित माना जाता है। तीर्थ-यात्रा मनुष्य का एक कर्त्तव्य है, जिसका पालन कभी न कभी मनुष्य को अपने जीवन में करना पड़ता है। किन्तु जैसे प्रायः हर बात में सच्चे अर्थ को न समझ कर हमने उसके अर्थ को बिगाड़ा तथा घसीटा-घसीटा है, वही बात तीर्थ-स्थान के विषय में भी है। जैसे तीर्थ-स्थान अब धर्म-भीरु बूढ़ों और अशिक्षित तथा अर्ध-शिक्षित अधेड़ स्त्री-पुरुषों के ही हिस्से में हो। एक मनोवैज्ञानिक सत्य हम न भूलें ! वृद्धावस्था में इन्द्रियाँ शिथिल पड़ जाती हैं। नई बातों के प्रति उत्साह की कमी हो जाती है। अतः तीर्थ-यात्रा तो बचपन और जवानी में ही करनी चाहिए, आधिक रस तभी आता है। पर अवकाश-प्राप्त-जीवन तो वृद्धों को प्राप्त होता है, अतः वह सरलता से तीर्थ-यात्रा के लिए समय दे सकते हैं। तीर्थ-यात्रा उनके मनोरंजन का विशेष साधन भी है। जब उनका अन्त समय निकट आता है, तब वे अपना परलोक बनाने की चिन्ता में लगते हैं। तो प्रायः वृद्ध-वृद्धा ही क्यों तीर्थ-यात्रा करते हैं-युतक युवतियाँ और बालक-बालिकाएँ क्यों नहीं? इसका भी कारण है। कारण स्पष्ट है- प्राचीन समय में यात्रा -मार्ग ठीक न थे, यात्रा के साधनों की कमी थी, चोर-डाकुओं तथा मार्ग के अन्य कष्टों का भी भय था। इसी से वृद्धजन जब यात्रा आरम्भ करते थे, तो यही समझ कर करते थे कि ईश्वर जाने अब लौटने की नौबत आए या न आए। यदि न भी लौटे, तो परलोक बनेगा। अंतिम समय तो है ही। परन्तु अब रेल, मोटर, लारी, हवाई जहाज, घोड़ा गाड़ी आदि सभी साधन पर्याप्त और सुलभ है-मार्ग में भी भय और कष्ट की आशंका नहीं -पक्की सड़कें, धर्मशालाएँ तथा अन्य सुविधाएँ हैं-ऐसी दशा में अब छोटे - बड़े सब आयु के स्त्री-पुरुष आराम से यात्रा कर सकते हैं। किन्तु हिंदू लकीर के फकीर होते ही हैं। पुरानी बातों में यदि बुराइयाँ भी हैं, तो भी उन्हें छोड़ना पसंद नहीं करते, चाहे अज्ञान के कारण ही वे ऐसा क्यों न करने हों।
काश हम यह समझ लें कि यात्रा से फेफड़े स्वस्थ होते हैं, पर ठीक होता है तथा स्वास्थ्य बनता है। पैर ठीक करने का तो अमोघ उपाय ही पैदल चलना है और यात्रा का वास्तविक आनन्द तो पैदल ही चलने में आता है। उन यात्रा-प्रेमी भुक्त भोगियों से उनके यात्रा के आनन्द तथा अनुभव को पूछिए तो आपको पता चलेगा कि यात्रा में तीर्थ-स्थानों में जाने में कितना रस, कितना आनन्द है? कठिन मानसिक परिश्रम के बाद विशन्ति प्राप्त करने तथा मन-बहलाव के लिए यह यात्राएँ उपयोगी हैं। किन्तु जिन्हें समयाभाव है तथा जिन्हें पैदल चलने की इच्छा, शक्ति या अभ्यास नहीं है और जो धनाढ्य हैं, वे पैदल न भी यात्रा करे तौ भी उन्हें अन्य अनेक लाभ तो होंगे ही।
परन्तु अब तो तीर्थ यात्रा बनाम ‘सैर’ धीरे-धीरे सभी करने लगे हैं। विदेशी सभ्यता की विषैली वायु से प्रभावित हम भारतीय अपने पुरखों की मखौल उड़ाने में अपनी मर्दानगी खूब समझने लगे हैं। दूसरे, एक बात और भी है अनुभव-प्राप्त-यात्रा जानते हैं कि तीर्थ-स्थानों में कितना धर्म के नाम पर अधर्म और सत्यता के स्थान पर ढोंग होता है-कितने पाप, अनाचार और व्यभिचार के अड्डे तीर्थ बन गए हैं। सीधे और धर्म-भीरु-यात्री कैसे उल्टी छुरी से मूड़े जाते हैं। न जाने कितनी बार हमने पत्र-पत्रिकाओं में पंडों के अन्यायों को पढ़ा तथा यात्रियों की जबानी सुना है। प्रायः धन और कभी-कभी तो हज्जत पर भी बन आई है। पंडे भूखे गिद्ध की तरह यात्रियों पर टूट पड़ते हैं। और किस प्रकार अशाँति को प्राप्त होकर, तीर्थ-स्थानों की लूट-फूट से काँप कर वहाँ न जाने के लिए वे कान पकड़ते हैं। उन्हें वास्तव में ऐसे स्थानों से घृणा हो जाती है। विशेष कर नव-युवकों में प्रतिक्रिया के भाव पैदा होना- तीर्थों के लिए- अस्वाभाविक नहीं है।
मैं स्वयं इस बात का साक्षी और भुक्त भोगी हूँ। विद्वानों, नेताओं और सरकार का ध्यान इस ओर गया है और उन्होंने बहुत कुछ सुधार भी किए हैं। किन्तु जब तक हमारा अज्ञान और अन्ध-विश्वास दूर न होगा, तब तक बहुत अधिक आशा इस क्षेत्र में नहीं की जा सकती।
एक विशेष बात हम यह देखेंगे कि प्रायः सभी तीर्थ-स्थान नदियों के किनारे हैं। प्राचीन काल में सबसे सुविधाजनक मार्ग नदी ही था। इसी के द्वारा व्यापार तथा आना-जाना रहता था। ऋषि-मुनि भी शान्ति और सुविधा के विचार से नदी-तटों पर ही अपनी कुटिया बनाते थे। नदी से जितने लाभ हो सकते हैं, वे सब नदी-तट पर बसने वाले ही उपयोग कर सकते हैं। इन्हीं नदी-तटों पर एक निश्चित अवधि के बाद महापुरुषों के सम्मेलन होते रहते थे और उसी अवसर पर व्यापारी एकत्र हो कर उन पर्वों को ‘मेला’ का रूप दे देते थे तथा साधारण जनता भी इनसे प्रत्येक प्रकार का लाभ उठाने के लिए एकत्र होती थी। इन महा-सम्मेलनों का ही आधुनिक रूप सभायें और अधिवेशन हैं। आधुनिक प्रदर्शनियों का काम यह मेले करते थे। एक ही स्थान पर महान ऋषियों, साधुओं, विद्वानों तथा जनसाधारण का एकत्रीकरण निवृत्ति और प्रवृत्ति का जैसे सुन्दर समन्वय हो। साधारण जनता को न केवल बड़े-बड़े महापुरुषों को एक साथ देखने तथा सत्संग का अवसर मिलता था, वरन् दूर-दूर के अपने सम्बन्धियों तथा मित्रों से भी इसी बहाने भेंट हो जाती है। इन धार्मिक मेलों का यही उद्देश्य था। कुंभ, अर्धकुम्भ, पूर्णमासी, अमावस्या को नदी- स्नान, प्रयाग का माघ-मेला आदि कितने मनोवैज्ञानिक तथा वैज्ञानिक आधार पर चालू किए गए हैं। इन महा-सम्मेलनों की सुचारु तथा सुव्यवस्थित रूप से निरन्तरता कायम रखने के लिए हमारे महर्षियों ने धर्म के नाम पर बड़ा सुन्दर उपाय निकाला। कुम्भ कभी कार्तिक पूर्णिमा, चन्द्र-सूर्य ग्रहणादि और अनेक पर्वों पर नदी-स्नान तथा तीर्थ-दर्शन का आदर्श एवं महत्त्व रखा। और इसी बहाने से लाखों यात्री साधु-महात्मा और व्यापारी एकत्र होते और विचार-विनिमय तथा धर्म-चर्चा के सुयोग से लाभ उठाते थे। क्या ही अच्छा हो यदि तीर्थ-यात्रा तथा धार्मिक मेलों की सच्ची उपादेयता हम समझ जायं।
प्रत्येक तीर्थ की स्थापना का कुछ उद्देश्य-विशेष दृष्टि में रख कर ही हमारे पूर्वजों ने अपनी ज्ञान-बुद्धि का परिचय दिया है। तत्कालीन परिस्थितियों तथा वातावरण के वे ज्ञाता थे। जैसे बदरीनाथ की पर्वत-श्रेणियाँ भूगर्भ-शास्त्र का ज्ञान कराती हैं। हिम, घाटी, जड़ी-बूटी, चट्टान, प्रपात, जलवायु तथा पर्वतादि का ज्ञान हमें होता है। द्वारका में जलयान द्वारा यात्रा, समुद्र, टापू आदि का ज्ञान, जगन्नाथ पुरी में समुद्र, समुद्र-भर की वनस्पति आदि तथा विभिन्न वस्तु-कला के नमूनों का ज्ञान, रामेश्वरम् में ईश्वरीय प्रकृति की अलौकिकता और मनुष्य की बुद्धि की पराकाष्ठा का ज्ञान ‘आदम का पुल’ आदि देख कर होता है। भारतवर्ष के प्रति श्रद्धा, भक्ति तथा बन्धुत्व का भाव यात्रियों के हृदय में भरते हैं। विद्यार्थियों को सैर-सपाटे से कार्यात्मक ज्ञान होता है। प्राचीन समय में पैदल, नाव, बैलगाड़ी, घोड़ा, ऊँट आदि पर ही यात्रा होती थी, जिसमें वस्तुओं को देखने समझने का काफी समय और अवकाश मिलता था। अब तो मोटर, हवाई जहाज और रेल से हम एक स्थान से अन्य नियत स्थान पर फुर्र से पहुँच जाते हैं- मार्ग के ज्ञान तथा दृश्यों का तो प्रश्न ही नहीं उठता। परन्तु पहले तीर्थ-यात्री को कष्ट सहिष्णुता तथा घटनात्मक बातों की शिक्षा मिलती थी।

