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Magazine - Year 1956 - Version 2

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अभिमान हटाइए

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(श्री सत्यदेव जी शास्त्री)

नारद जी भक्ति और सदाचार की मूर्ति समझे जाते हैं।

भक्ति-शास्त्र के तो वह प्रवर्तक माने गये हैं। भगवान् कृष्णा ने गीता में नारद को देवर्षियों में प्रमुख स्थान दिया है।

नारद के देवर्षि बनने का रहस्य क्या है? इस बात को सब न जानते होंगे। नीचे की उपनिषद् कथा से यह ज्ञात होगा।

एक बार नारद आध्यात्म-ज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने के लिये सनत्कुमार जी के पास गये। विनय पूर्वक प्रार्थना की-

“महाराज ! मुझे शिक्षा दीजिये”

‘तुम अब तक क्या पढ़े हो पहले यह बतादो’

‘महाराज! अब तक ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, पितृ विद्या, ज्योतिष, गणित, दैव विद्या, तर्क, न्याय, भूत विद्या, नक्षत्र विद्या सर्प विद्या, आदि सभी शास्त्र और विद्याएं मैं पढ़ चुका हूँ’

‘तो फिर तुम और क्या चाहते हो?’

‘भगवन् ! मैंने मन्त्र ही पढ़े हैं, शब्दों और शास्त्रों का ही ज्ञान है, आत्मा का-अपने का-ज्ञान नहीं हुआ। मैंने आप जैसे आत्म-ज्ञानियों से सुना है कि आत्मा को जान लेने से शोक छूट जाता है। मैं तो भगवन् शोक की नदी को तैर नहीं सका; शोक में डूब रहा हूँ। कृपया मुझे शोक-सागर से उस पार किनारे पर लगा दीजिये” नारद बोले। इस प्रश्न में ही देवर्षि बनने का रहस्य है, जब तक मनुष्य बड़े पोथियों के ज्ञान को और शब्द-ज्ञान को ही महान समझता है, तब तक वह शोक रहित नहीं हो सकता।

आचार्य शंकर ने उक्त उपनिषद् के मंत्र की व्याख्या में लिखा है-

‘यद्यपि नारद सारे विज्ञान और साधन शक्ति से सम्पन्न थे, तब भी उन्हें श्रेय मार्ग न मिल सका। जब वह उत्तम कुल-विद्या आचार, साधन और शक्ति के अभिमान से रहित होकर सनत् कुमार जी के पास विनम्र शिष्य के रूप में गये, तभी उन्हें विद्या का सत्य स्वरूप ज्ञात हुआ।”

मनुष्य अनेक अभिमानों में मस्त रह कर प्रभु से विमुख बनता है अभिमान एक प्रकार का बुखार है। उसे उतारे बिना आध्यात्मिक स्वास्थ्य-लाभ नहीं हो सकता।

देवर्षि नारद की उक्त कथा से यदि हम यह शिक्षा पाकर केवल पोथी ज्ञान को महत्त्व न देकर आचरण की शिक्षा पाकर बड़ा मानें, तथा अक्षर-ज्ञान और जन्म-जाति के मिथ्या-अभिमान को छोड़कर यथार्थ के उपासक बनें, तो हमारा और हमारे देश का महान् कल्याण होगा।

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