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Magazine - Year 1956 - Version 2

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साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए आप यह कीजिए

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गत अंकों में देशव्यापी साँस्कृतिक पुनरुत्थान आयोजन के लिये जागृत आत्माओं से समय और सहयोग की याचना की जाती रही है। कारण यह कि यदि संस्कृति का अधःपतन हो गया तो हमें अपने नैतिक मेरुदण्ड को सीधा रखना कठिन हो जायगा और फिर कितनी ही उन्नतिशील योजनाएं एवं व्यवस्थाएं बनाई जायं, व्यक्ति -गत अनैतिकता के छेदों से होकर वह सभी प्रयत्न निष्फल हो जाएंगे। राष्ट्र को ऊँचा उठाना है तो नैतिक बल की रक्षा और वृद्धि करनी होगी, इसके लिए संस्कृति ही सर्वश्रेष्ठ माध्यम है। अतएव साँस्कृतिक पुनरुत्थान पर हम अत्यधिक जोर देते हैं। यह निश्चित है कि यह कार्यक्रम लेखनी और वाणी से नहीं हो सकते, इसके लिए प्राणवान आत्माओं का सक्रिय प्रयत्न अनिवार्य है। इसी दृष्टि से जन सहयोग के लिए गत अंकों में हम ‘आत्म दान’ की याचना करते रहे हैं। हमें आपका समय चाहिए।

प्रसन्नता की बात है कि गत अंकों में की गई अपील निष्फल नहीं गई। यों आज आमतौर से हर आदमी अपनी व्यक्ति गत स्वार्थ परता की बात सोचता है। धन, इन्द्रिय भोग, मान बड़ाई की साँसारिक ऐषणाओं से लेकर स्वर्गमुक्ति की सुख सुविधा एवं ऋद्धि−सिद्धि में व्यक्ति गत लाभ के अतिरिक्त और कुछ नहीं सोचता। युग प्रभाव की इस व्यापक स्वार्थपरता के अज्ञानान्धकार में भी अभी अनादि प्रकाश जीवित है, ऋषि परम्परा की चिनगारियाँ अभी सर्वथा बुझ नहीं गई हैं, दधीचि की परम्परा का अभी सर्वथा लोप नहीं हुआ है। डूबती हुई ऋषि सम्पदा को बचाने के लिए अभी भी कुछ आत्माएं त्याग करने के लिए तत्पर हो रहीं हैं।

हमारे पास अनेकों पत्र इस सम्बन्ध में आये हैं। जिन्हें पढ़ कर हमें भारी उत्साह होता है और लगता है कि प्रभु की इच्छा पूर्ण होकर रहेगी। वे अनेक आत्माओं के अन्त करण में उत्साह, प्रकाश त्याग और धर्म प्रेम की भावनाओं को जागृत करके इस दिशा में प्रेरणा दे रहे हैं। लगता है कि एक विशाल सेना देश के साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए कटिबद्ध होकर घोर श्रमदान के साथ महा अभियान करने के लिए तैयार हो रही है। नर और नारी दोनों ही समान रूप से इस दिशा में कदम बढ़ाने के लिए कटिबद्ध हो रहे हैं।

साँस्कृतिक पुनरुत्थान के महान् अभियान में सम्मिलित होने वाली आत्माओं के संगठन को ‘साँस्कृतिक सेवा शृंखला’ नाम दिया जा रहा है। जैसे जंजीर की एक कड़ी दूसरे से जुड़ी होती है उसी प्रकार साँस्कृतिक सेवा के उद्देश्य के लिए यह लोग आपस में जुड़े रहेंगे और अपनी चेन बढ़ाने के लिए अपने जैसे और भी व्यक्ति पैदा करते रहेंगे। इस शृंखला में वे सभी वयस्क व्यक्ति प्रवेश कर सकेंगे। जो निर्धारित इस सिद्धान्तों को स्वीकार करेंगे और उन्हें अपने जीवन में चरितार्थ करने का व्रत लेंगे। कोई चन्दा, फीस, शुल्क आदि इसका नहीं है, पर धारण किए हुए व्रत को पालन करने की आशा उनसे रखी जायगी और अपने कदम मजबूत रखने की जिम्मेदारी उन पर छोड़ी जायगी।

साँस्कृतिक सेवा शृंखला के प्रत्येक सदस्य के लिए तीन कार्य आवश्यक हैं:-

आत्म बल प्राप्त करने के लिए नित्य कुछ पूजा उपासना करना।

अपने सम्प्रदाय या पूजा में अपनी पूर्ण निर्धारित मान्यता के अनुसार चलने में हर सदस्य स्वतन्त्र है, पर गायत्री उपासना को भी उसमें सम्मिलित रखना आवश्यक है। क्योंकि एक तो ऋषियों ने इस गायत्री को आवश्यक नित्यकर्म माना है, दूसरे इस महामन्त्र में सन्निहित शिक्षाओं के आधार पर ही साँस्कृतिक पुनरुत्थान का सारा कार्यक्रम चलाना है। (1) सद् ज्ञान की निरन्तर अभिवृद्धि (2) त्यागमय प्रेम से परिपूर्ण व्यवहार, इन दो कार्यक्रमों के प्रतीक ही गायत्री सद्ज्ञान) यज्ञ (त्यागमय प्रेम) हैं। इन दोनों प्रतीकों को हमारी नित्य उपासना में स्थान रहना है। चाहे 24 गायत्री मन्त्र जपने और 5 मिनट सुगन्धित धूपबत्ती या घृत दीप जलाने जितनी छोटी सी ही छोटी उपासना क्यों न हो, पर गायत्री एवं यज्ञ की परम्परा को दैनिक जीवन में प्रत्येक सदस्य को स्थान देना आवश्यक है।

(2) मनोबल प्राप्त करने के लिए अपने विचारों और कार्यों को अधिक श्रेष्ठ बनाने के लिए नित्य प्रयत्न करना।

जन्म-जन्मान्तरों से सञ्चित कुसंस्कार नित्य ही टाँग पकड़कर पीछे घसीटते हैं और आत्म उत्थान के मार्ग में बाधा पहुँचाते हैं। इनसे प्रतिदिन डरने या निराश होने की नहीं, वरन् जीवन भर इनके विरुद्ध युद्ध करते रहने का व्रत लेने की आवश्यकता है। प्रातः उठते समय पिछले दिन की त्रुटियों को आज न करने के आधार पर आज का कार्यक्रम बनाना और रात को सोते समय दिन भर कार्यों की अच्छाई बुराई का लेखा जोखा लेना। इस क्रम से दिन-दिन अपने गुण, कर्म, स्वभाव, ज्ञान, स्वास्थ्य, मैत्री, आदि में अभिवृद्धि करते चलना। यह प्रगति मंद हो तो भी निराश न होकर उठने और बढ़ने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।

(3) धर्मबल प्राप्त करने के लिए साँस्कृतिक सेवा के लिए कुछ त्याग करना।

दूसरों को सुसंस्कृत बनाने के लिए अपने निकटवर्ती क्षेत्र में साँस्कृतिक विचार धारा का निरन्तर प्रचार करते रहना। अपने पास अच्छे साहित्य का संग्रह बढ़ाते चलना और उसे पढ़ने के लिए दूसरों को उत्साहित करना, अवसर मिलने पर उन्हें समझाने का प्रयत्न करना। छोटे बड़े साँस्कृतिक आयोजनों के द्वारा लोगों को एकत्रित करके उनमें सद्भावना के बीज बोना, अन्य प्रकार से दूसरों की सेवा करके अपने प्रेम एवं उपकार द्वारा उन्हें सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रस्तुत करना, साँस्कृतिक व्यापक आन्दोलन के केन्द्रीय कार्यक्रम मजबूत बनाने के लिए सहयोग देना आदि अनेकों मार्ग इसके हो सकते हैं।

हर व्यक्ति की योग्यता, परिस्थिति, शक्ति एवं सामर्थ्य, भिन्न होती है। सबके लिए एक समान कार्यक्रम नहीं बन सकते हैं। उपरोक्त तीन कार्यक्रमों को कौन व्यक्ति किस प्रकार चरितार्थ करे, यह उसे स्वयं ही सोचना पड़ेगा और बदलने वाली परिस्थितियों के अनुसार उनमें हेर फेर भी करते रहना होगा। मनोभूमि और परिस्थितियों के आधार पर शृंखला के सदस्यों की तीन श्रेणियाँ रहेंगी। (1) व्रतधारी (2) कर्मयोगी (3) आत्म दानी।

(1) व्रतधारी —जिनके जीवन में अभी निश्चिंतता नहीं आई है, जो बौद्धिक आर्थिक या शारीरिक दृष्टि से परावलम्बी हैं, ऐसे बालक, विद्यार्थी, महिलाएं, वयोवृद्ध आदि व्यक्ति अपना आत्मनिर्माण एवं उपासना तो सुविधा पूर्वक कर सकते हैं, पर लोक सेवा के लिए समय, अवसर एवं क्षेत्र कम ही प्राप्त होता है। ऐसे लोग व्रतधारी कहलावेंगे।

(2) कर्मयोगी —जिनका गृहस्थ, व्यवसाय कार्य का जीवन क्रम सुनिश्चित हो चुका है, जो स्वावलम्बी हैं वे अपने शरीर, मन, समय, शक्ति, सामर्थ्य एवं सम्पत्ति को ईश्वर की धरोहर और अपने को प्रभु द्वारा इन वस्तुओं के लिए नियुक्त किये प्रतिनिधि एवं ट्रस्टी मान कर भरत एवं जनक के समान सामने उपस्थित जिम्मेदारियाँ को पूरा करते रहेंगे और बचे हुए समय एवं सामर्थ्य का अधिकाधिक उपयोग विश्व की साँस्कृतिक सेवा के लिये करेंगे। गृही वानप्रस्थ की तरह वे घर को तपोवन में परिणत करने का प्रयत्न करेंगे।

(3) आत्मदानी —जिनके ऊपर पारिवारिक जिम्मेदारियाँ नहीं हैं तथा चरित्र में आवश्यक दृढ़ता, स्वभाव में पर्याप्त सौजन्य तथा परमार्थ में कष्ट सहने एवं श्रम करने के लिये समुचित उत्साह है, वे फल पुष्पों से लदा हुआ विशाल वृक्ष उत्पन्न करने के लिए सहने जलने के लिए प्रत्युत बीज की तरह अपना सर्वस्व संस्कृति सेवा के लिए उत्सर्ग करेंगे। यह एक प्रकार का संन्यास हैं। व्रतधारी और कर्मयोगी तो अपने-अपने घर एवं क्षेत्र में कर्म करते रहेंगे पर आत्मत्यागी सदस्य सम्पूर्ण विश्व को अपना घर मानकर व्यापक क्षेत्र में कार्य करने के लिए निकल पड़ेंगे। सामान्यतः वे गायत्री तपोभूमि को अपना घर समझेंगे।

साँस्कृतिक शृंखला का प्रत्येक सदस्य अपनी मनोभूमि और कार्य प्रणाली का निर्माण निम्न-भावनाओं के आधार पर करेगा:—

परमात्मा सर्वव्यापी और न्यायकारी है। उत्थान और पतन के समस्त हेतु हमारे भीतर छिपे हुए हैं। मानसिक सन्तुलन को स्थिर रखना, कर्तव्य कर्म में प्रवृत्त रहना, ईश्वर की सच्ची भक्ति है।

क्षणिक सुख की अपेक्षा स्थिर लाभ को महत्व देना, वस्तुएं संग्रह करने की अपेक्षा शक्ति बढ़ाना एवं स्वार्थ को परमार्थ में घुला देना ही सच्ची बुद्धिमानी है।

स्वच्छता, नम्रता एवं उदारता के सद्व्यवहार पर ही हमारी सुख-शान्ति निर्भर है।

विवेक को सर्वोपरि मानना, शक्तियों का सदुपयोग, और ऊँचा उठने की सत्प्रवृत्ति में ही मनुष्य की महानता सन्निहित है।

यह चारों संकल्प गायत्री के (1) ॐ भूर्भुवः स्वः (2) तत्सवितुर्वरेण्यं (3) भर्गो देवस्य धीमहि (4) धियो योनः प्रचोदयात् इन चार चरणों की व्याख्या है। इन भावनाओं को स्वीकार करना, नित्यप्रति इनका चिन्तन और मनन करना चाहिए। इन्हें कार्य रूप में परिणत करना चाहिए। उपरोक्त चारों संकल्पों में सन्निहित 13 तथ्य तथा 1 इन्हें कार्य रूप में परिणत करने की जिम्मेदारी, इस प्रकार कुल 14 रत्न अध्यात्म समुद्र- मंथन से निकलने वाले यह 14 रत्न हैं। इन्हें ही 9 लड़े 4 गांठें 1 ब्रह्मग्रन्थि इस प्रकार के यज्ञोपवीत के 4 भाग माने गये हैं। स्त्रियाँ अनन्त चतुर्दशी को 14 गाँठ का अनन्त धारण करती हैं, यह भी एक प्रकार का यज्ञोपवीत ही है। व्यक्ति गत तथा समस्त विश्व को सुखी बनाने के लिए यह 14 रत्न अत्यन्त ही मूल्यवान हैं। इन आदर्शों, शिक्षाओं, मान्यताओं, एवं भावनाओं को अपने तथा दूसरों के मनः क्षेत्र में अधिकतम व्यापक बनाना साँस्कृतिक सेवा शृंखला के प्रत्येक सदस्य का आवश्यक कर्तव्य है।

कार्यक्षेत्र में उपरोक्त मान्यताओं को चरितार्थ करने के लिए ऋषियों ने साँस्कृतिक परम्पराओं, प्रथाओं,रीति-रिवाजों,मान्यताओं, व्रत, पर्व, त्यौहार, संस्कार,आहार-विहार,आचार-विचार, हन-सहन,भाषा, भेष, भाव, पूजा-उपासना, कथा कीर्तन, यज्ञ हवन, तीर्थ यात्रा, ग्रन्थ,शास्त्र, आदि का निर्माण किया है। आयोजनों का-परम्पराओं का विधिवत् पालन करने से ही उपरोक्त चार संकल्पों में सन्निहित तत्वज्ञान को जनसाधारण की मनोभूमि में स्थापित करना तथा स्थिर रखना सम्भव है। इसलिए तात्विक

सिद्धान्तों की भाँति ही इन प्रक्रियाओं के आयोजन में भी साँस्कृतिक सेवा-शृंखला के सदस्य उत्साहपूर्वक कटिबद्ध रहेंगे।

साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना का यह मानसिक और व्यवहारिक कार्यक्रम बहुत ही विशाल है, इसे हर कर्म प्रेमी अपनी सुविधा, योग्यता और परिस्थिति के अनुसार कार्यान्वित कर सकता है। हमें सेवा शृंखला में सम्मिलित होकर दोनों ही प्रकार के

कार्यक्रमों को व्यापक बनाना है, ऋषि-ऋण चुकाने के लिए बहुत कुछ प्रयत्न करना है। आइए, आगे बढ़े, कुछ करें।

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