संतोषामृत पिया करें
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(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए. )
को वा दरिद्रो? हि विशाल तृष्णाः।
श्री माँस्तु को? यस्यु समस्त तोषः॥
अर्थात् गरीब कौन है? जिसकी तृष्णा बड़ी है। अमीर कौन है? जो सदा सन्तुष्ट रहता है। भगवान के दिये धन से जो संतोष नहीं होता, वह मन का गरीब है और यही सच्ची गरीबी है।
टॉलस्टाय की एक कहानी है। एक लोभी व्यक्ति एक ऐसे राज्य में पहुँचा, वहाँ कुछ रुपया देकर व्यक्ति यथेष्ट भूमि प्राप्त कर सकता था। प्रातःकाल से हल बैल लेकर उसे एक स्थान से प्रारम्भ कर भूमि का चक्कर लगाना पड़ता था। सायंकाल तक वह जितना बड़ा चक्र बना पाता था, भूमि का वही घेरा उसे दे दिया जाता था। फीस सबके लिये एक ही थी। यह व्यक्ति वहाँ पहुँचा और फीस देकर भूमि का घेरा नापना प्रारम्भ किया। वह घेरा बनाने के लोभ में वह चलता रहा। सायंकाल होते-होते व इतना तेज चला कि घेरा पूर्ण करने से पहिले ही गिरा और तुरन्त मर गया। इस कहानी का शीर्षक है। ‘मनुष्य को कितनी भूमि की आवश्यकता है?’ अन्ततः वह व्यक्ति जितनी भूमि में गाढ़ा गया, उतनी ही भूमि उसे मिल सकी। वह बड़ा भूमि का घेरा व्यर्थ गया। कहानी का तात्पर्य यह है कि मनुष्य वृथा ही इतनी वस्तुओं की तृष्णा करता है। अन्ततः वही उसकी मृत्यु का कारण बनाती हैं। विधि का बनाया हुआ एक निश्चित क्रम है धन, भूमि, मकान, संपत्ति तथा नाना वस्तुओं की देन की एक सीमा है। भगवान प्रत्येक व्यक्ति का ध्यान रख उसके निर्वाह और सुख के लिये पर्याप्त सुख सुविधाएं प्रदान करते हैं, किसी को कभी नहीं भूलते, निरन्तर देते रहते हैं, पर भगवान के दिये धन,सुख, सुविधाओं से जिसे सन्तोष नहीं होता, उसकी बड़ी दुर्दशा होती है।
ईश्वर के संसार में कभी भी मर्यादा के भीतर रह कर खाने पीने, पहनने ओढ़ने, शरीर की नाना प्राकृतिक इच्छाओं की पूर्ति के सभी साधन प्रचुरता से हैं। किसी को किसी वस्तु की कमी नहीं है। जीवन की आधार भूत चीजें विपुलता से बिखरी पड़ी हैं।जितना जिस 2 के हिस्से में है, जितना जिस के भाग्य में लिखा गया है। वह उसे देर सवेर अवश्य प्राप्त होकर रहता है।कोई किसी के भाग्य के धन, सन्तान, सम्पत्ति, भूमि, ऐश्वर्य, मान, समृद्धि को उससे नहीं छीन सकता। शर्त यही है कि हम अपना कर्म करते रहें, परिश्रम में लापरवाही न करें,आलसी न बनें, मुक्त का धन लूटने की चेष्टा न करें। कर्तव्य मानकर समान को जो काम हमें सौंपा गया है, कठिन परिश्रम और सहयोग से उसे पूरा करते रहें। अपना पेट भर लेने के पश्चात् बचा हुआ धन या वस्तुएं ईश्वर की हैं हमारी व्यक्ति गत पूंजी नहीं है,उसे समाज के अन्य जरूरतमंद व्यक्तियों को दे देने (दान करने) में ही कल्याण है! आवश्यकता से अधिक धन इत्यादि रखकर दूसरों का शोषण करने वाले मोक्ष का सुख प्राप्त नहीं करते। तृष्णा के मायाजाल में अशांत पड़े रहते हैं।
संसार के विषय वासना में लिप्त व्यक्ति के दुखों का अन्त नहीं होता। एक आवश्यकता पूर्ति के बाद दूसरी, फिर तीसरी चौथी अनन्त तृष्णाएं, हजारों छोटी बड़ी अच्छी बुरी इच्छाएं उसकी शान्ति सुख और सन्तुलन को भंग करती रहती हैं। इन्द्रियों को कभी सन्तोष नहीं मिलता। वासना कभी तृप्त नहीँ होती। आसक्ति ही दुःख का मूल है।
संग्रह से त्याग ही श्रेष्ठ है। संग्रह से आसक्ति बढ़ती है। जीव संसार के माया मोह में और भी जटिलता से बंधता जाता है। पद्मपुराण में एक स्थान पर कहा गया है:—
‘तपः संचय ऐवेह, विशिष्ठो धन संचयात्।
त्यजतः संचयात् सर्वान, यान्तिगाशमुपद्रवाः॥
न हि सचातात् कश्चित्, सुखी भवति मानवः।
यथा यथा न गृह्वभती,ब्राह्यणः सम्प्रतिग्रहम्॥
तथा तथा हि संतोषाद्, ब्रह्यतेजो विवर्धते।
अकिंचवत्व राज्यं च, तुलया समतोलयन्।
अकिंचन्त्वमधिकं, राज्यादपि जितात्मनः॥
अर्थात्-- इस लोक में धन संचय की अपेक्षा तपस्या का संचय ही श्रेष्ठ है। जो व्यक्ति सब प्रकार के लौकिक संग्रहों का परित्याग कर देता है, उसके सारे उपद्रव शान्त हो जाते हैं। संग्रह करने वाला कोई भी मनुष्य सुखी नहीं रह सकता। ब्राह्मण जैसे जैसे परिग्रह का त्याग कर देता है, वैसे ही वैसे सन्तोष के कारण उसके ब्रह्मतेज की वृद्धि होती है। एक ओर अकिंचनता और दूसरी ओर राज्य को तराजू में रखकर तोला गया, तो राज्य की अपेक्षा जितात्मा पुरुष की अकिंचनता का पलड़ा भारी होता है।
सबसे अधिक लोभ मनुष्य को धन का होता है जितना धन प्राप्त होता है। उतनी ही तृष्णा बढ़ती जाती है। सैंकड़ों से हजारों, हजार से दस हजार, लाख दस लाख निरन्तर धन की इच्छा अधिकाधिक बढ़ती जाती है। मनुष्य यह भूल जाता है कि धन एक साधन है स्वयं साध्य नहीं है। धन से मनुष्य की सात्त्विक आधार भूमि आवश्यकताएं पूर्ण होनी चाहिये। बचे हुये धन को दान द्वारा दूसरे जरूरतमंद व्यक्तियों में फैलना चाहिये। यदि मर्यादा से बाहर जाकर कोई कृपण केवल धन का संग्रह ही कर्तव्य ही मान बैठता है, तो वह बड़ी भारी मूर्खता करता है। स्कंदपुराण में कृपण धनी को पानी में डुबा देने का उल्लेख इस प्रकार है:-
धनवः तमदातारं, दरिद्र चातपस्विनम्।
उभातन्भसि मोक्तयौ, गले बध्वा महाशिलाम्॥
अर्थात्-जो धनवान होकर दान नहीं करता और दारिद्र होकर कष्ट सहन रूप तप से दूर भागता है, इन दोनों को गले में बड़ा भारी पत्थर बाँध कर जल में छोड़ देना चाहिए।
ऋषिकुमार नचिकेता ने सत्य ही कहा है कि मनुष्य धन से कभी भी तृप्त नहीं किया जा सकता यदि हमने प्रभु के दर्शन पा लिए हैं, आत्म साक्षात् कार कर लिया है, तो धन तो हम पा ही लेंगे। माँग ने योग्य वर तो आत्मज्ञान है।
पहले तो धन के पैदा करने में कष्ट होता है। फिर पैदा किए धन की रखवाली में क्लेश उठाना पड़ता है। इसके बाद यदि वह कहीं नष्ट हो जाय, तो दुःख और खर्च हो जाय, तो फिर दुःख होता है। धन अधिक होने पर तृष्णा और मोह तथा कम होने पर हृदय में जलन उत्पन्न करता है। अन्त में धन के त्यागने में भी दुःख ही हाथ लगता है। आप ही सोचिये? धन में सुख कहाँ है?
महर्षि कश्यप का वचन है कि यदि ब्राह्मण के पास धन का बड़ा संग्रह हो गया, तो यह उसके लिए अनर्थ का हेतु है। धन-ऐश्वर्य से मोहित ब्राह्मण कल्याण से भ्रष्ट हो जाता है। धन सम्पत्ति मोह में डालने वाली होती है। मोह नरक में गिराता है। इसलिए कल्याण चाहने वाले पुरुष को अनर्थ के साधन भूत अर्थ का दूर से ही परित्याग कर देना चाहिए। जिसके लिए धर्म के लिए भी धन-संग्रह की इच्छा होती है, उसके लिए उस इच्छा का त्याग ही श्रेष्ठ है; क्योंकि कीचड़ में लगाकर धोने की अपेक्षा उसका दूर से स्पर्श न करना ही अच्छा है। धन के द्वारा जिस धर्म का साधन किया जाता है, वह क्षयशील माना गया है। दूसरे के लिए जो धन का परित्याग है, वही अक्षय धर्म है। वही मोक्ष प्राप्त कराने वाला है।
धन की तरह विषय वासना की इच्छा भी विषैली है। वासनाएँ निरन्तर बढ़ती हैं। कभी तृप्त नहीं होती। भोग वासना आजकल की पाश्चात्य सभ्यता की कलंक कालिमा है। जो कामी हैं, उनका विवेक नष्ट हो जाता है। जहाँ धन और बढ़ती हुई वासनाएँ हैं, वहाँ बुद्धि पंगु हो जाती है। वासना, भोग,विलास-प्रिय व्यक्ति के पास यदि रुपया हो तो वह लोक का नाश करने वाला होता है जैसे वायु अग्नि 43 की ज्वाला को बढ़ाने में सहायक होता है और जैसे दूध साँप के विष को बढ़ाने में कारक होता है, वैसे ही दुष्ट का धन उसकी दुष्टता को बढ़ा देता है। वासना के मद में अन्धा हुआ व्यक्ति देखता हुआ भी अन्धा ही रहता है। विषय वासना की बढ़ती हुई इच्छाएँ प्रत्यक्ष विष के समान हैं।
इसी प्रकार सम्पत्ति एकत्रित करने की इच्छा भी उत्तरोत्तर बढ़ती है। एक मकान के पश्चात् दूसरा, फिर तीसरा चौथा, यहाँ तक की नई इच्छाओं के दास होते हैं। सम्पत्ति को बढ़ाने की इच्छा का कभी अन्त नहीं होता। इसी प्रकार संतान की इच्छा भी कभी पूर्ण नहीं होती। इच्छाओं का बड़ी संख्या में उत्पन्न होना ही मनुष्य के दुःख का कारण है; हमारी अपूर्णता का सूचक है। उच्चतम स्थिति पर पहुँचने के लिए हमें इच्छाओं का दमन करते रहना चाहिए। उनमें आशक्ति कम करने से कृति अन्तर्मुखी होती है।
हमें यह भली-भाँति स्मरण रखना चाहिए कि संसार में कभी किसी को इच्छाएँ पूर्ण नहीं हुई हैं। तृष्णा बढ़ती ही रही हैं। ईश्वर ने अपने परिश्रम की जो रोटियाँ हमें दी हैं, वे ही हम ईमानदारी से लेते रहें, सदा अपनी मेहनत की कमाई पर निर्भर रहें यही श्रेष्ठ सुख शान्ति का साधन है। आशक्ति का त्याग करके, क्रोध को जीत कर, स्वल्पाहारी और जितेन्द्रिय होकर बुद्धि से इन्द्रियों को रोक कर ही हम आनन्द प्राप्त कर सकते हैं।
जीर्यन्ति जीर्यतः केशा, दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः।
जीविताशा धनाशा च, जीर्यतोऽपि न जीर्यति॥
चक्षुः श्रोत्राणि जीर्यन्ति, तृर्ष्णंका तरुणायते।
अर्थात् जब मनुष्य का शरीर जीर्ण होता है, तब उसके बाल पक जाते हैं और दाँत उखड़ जाते हैं पर यह तृष्णा ऐसी दुष्ट है कि सदैव तरुणी रहती है।
जो कुछ ईश्वर की देन के रूप में आपके पास है, उसे मर्यादा के भीतर रह कर भोगें और संतोषामृत पान करते रहें।

