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Magazine - Year 1956 - Version 2

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हमारे जीवन में वनों का महत्त्व

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(श्री कन्हैयालाल माणेकलाल मुंशी)

वृक्षों की नीली छटा के लिए हमारे पूर्वजों में जो प्रेम था, वह हममें भी होना चाहिए। हमें अपनी वन-प्रधान संस्कृति की ओर अभिमुख होना चाहिए। वनों की छाया में जन्म लिया। वृक्षों के पत्तों पर प्रभातकालीन-जलकण का जलपान किया। समीर में डोलती हुई पत्रावलियों में से आते हुए चन्द्रकिरण के साथ नृत्य कला के प्रथम पाठ पढ़े। इस संस्कृति के मौलिक सिद्धान्तों को अर्वाचीन जीवन में हम ला सकते हैं। हर एक युग में अपनी संस्कृति की प्रेरणा से हमने अपने संस्कारों की मूलभूत भावनाओं को सुदृढ़ बनाया है। इतना ही नहीं, विभिन्न युगों में जो विषमताएँ उपस्थित हुई, भारतवासियों ने उन्हें भेदने के लिए इन मूल्यों को शक्ति और व्यापकता प्रदान की।

एक समय ऐसा भी था, जब हमारी संस्कृति सर्वांग जीवन को समरस बनाती थी। आर्थिक जीवन पर भी उसका प्रभाव पड़ता था। लेकिन आज हमने इन प्रश्नों को एक दूसरे से बिलकुल पृथक् कर दिया है। सच तो यह है कि समस्त जीवन एक है, अभेद्य है। यह सत्य देखने की कला हमारे हाथों से निकल गई है। लेकिन मुझे तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि जब तक समस्त जीवन को एक रूप में देखने की कला हम फिर से नहीं सीखेंगे तब तक हममें न राष्ट्रीय आत्मविश्वास आयेगा और न इस भयंकर परिस्थिति से पार उतरने की शक्ति आयेगी।

आज तो बहुत बड़ा प्रश्न हमारे सामने है, उस को लीजिये। भारत में कभी भी अन्न की कमी नहीं थी। भूतकाल में भारत धान्य और धन से समृद्ध था। आज अन्न न्यूनता हमारे सामने ताँडव कर रही है। जो माता अभी तक ‘सजलाँ सफलाँ शस्य श्यामला’ था, वह क्षीण हो गई है। अपनी संतानों को भी वह खिला नहीं सकती। क्यों? क्योंकि जो हमारी साँस्कारिक प्रणाली है, उसको नवीन दृष्टि से देखने की शक्ति इसमें नहीं रही। किन्तु यह बात निश्चय समझिये कि इस शक्ति के बिना हम अर्वाचीन जीवन में टिक नहीं सकते।

थोड़े दिन पहले बम्बई में मैंने कहा था, “वृक्ष ही जल हैं, जल रोटी है और रोटी ही जीवन है।” यह वाक्य नग्न सत्य है। आज सभी भारतीय हृदयों में असन्तोष भरा है। क्योंकि हमारे खाने को अन्न नहीं। हमारे पास अन्न नहीं है; क्योंकि पानी संग्रह करने की पुरानी पद्धति हम हस्तगत नहीं कर सके। हमारे पास पानी नहीं है, वर्षा अनिश्चित है; क्योंकि हम तरु-महिमा भूल गये हैं। हजारों वर्षा तक हम जीवित रहे; क्योंकि हम वन-विहारी लोग थे, लेकिन आज हमारी दृष्टि संकुचित हो गई। हम नये-से बन गये। तरु-महिमा की हमको परवाह नहीं रह। वृक्षों को हम काटने लगे। वृक्षारोपण आज एक फैशन बन गया है, परन्तु उसमें जो धार्मिक श्रद्धा का तत्त्व था, वह चला गया।

हमारी सारी संस्कृति वन-प्रधान है। ऋग्वेद, जो हमारी सनातन शक्ति का मूल है, वन-देवियों की अर्चना करता है। मनुस्मृति में वृक्ष-विच्छेदक को बड़ा पापी माना गया है। उसके लिए दण्ड का विधान किया है। मत्स्यपुराण में कहा गया है- “जो आदमी वृक्षों को नष्ट करता है, उसे दण्ड दिया जाय।” तालाबों,सड़कों या सीमा के पास वृक्षों को काटना बड़ा गम्भीर अपराध था। उसके लिए दण्ड भी बड़ा कड़ा रहता था। उसमें कहा गया है कि जो वृक्षारोपण करता है, वह तीस हजार पितरों का उद्धार करता है। वृक्षों का रोपण स्नेहपूर्वक और उनका परिपालन पुत्रवत् करना चाहिये।

पुत्र और तरु में भी भेद है, क्योंकि पुत्र को हम स्वार्थ के कारण जन्म देते हैं, परन्तु तरु पुत्र को तो हम परमार्थ के लिए ही बनाते हैं। ऋषि-मुनियों की तरह वृक्षों की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि वृक्ष तो द्वेष-वर्जित है। जो छेदन करते हैं, उन्हें भी वृक्ष छाया, पुष्प और फल देते हैं।

इसलिये जो विद्वान् पुरुष हैं, उनको वृक्षों का रोपण करना चाहिए और उन्हें जल से सींचना चाहिए।

हम स्वर्ग की बात क्यों करें? हम वृक्षारोपण करके यहाँ ही स्वर्ग क्यों न बनावें? समस्त इतिहास में महान् सम्राट अशोक ने ही कहा है- “रास्ते पर मैंने वटवृक्ष रोप दिये हैं, जिनमें मानवों, पशुओं को छाया मिल सकती है। आम वृक्षों के समूह भी लगा दिये हैं।” आज प्रभुत्व सम्पन्न भारत ने इस महाराजर्षि के राज्य-चिन्ह ले लिये हैं। जैसे 23 सौ वर्ष पूर्व उन्होंने देश में एकता स्थापित की थी, वैसी ही हमने भी प्राप्त कर ली है। क्या हम इस सन्देश को नहीं सुनेंगे? हम इस सन्देश को सुनकर निश्चय ही ऐसा प्रबन्ध करेंगे, जिससे भारत के भावी प्रजा-जन कह सकें, कि हमने भी हर रास्ते पर वृक्ष उगाये थे, जो मानवों और पशुओं को छाया देते हैं।

मेरा जन्म शहर में हुआ और शहर में ही प्रायः मैं रहा, किन्तु तरुओं के प्रति मेरा प्रेम सदा ही रहा। मथिरान की वृक्षावलियों की छाया में ही मैंने जीवन की सुन्दरता और प्रेरणा पाई है। अपने जीवन के महासंकल्प भी मैंने वहाँ ही किये। काश्मीर में पहल ग्राम के ऊपर बैंसस के देवदारु-वृक्षों की छाया में मुझे आत्मसिद्धि का किञ्चित स्पर्श हुआ। जंगल के पथ पर जाते ही वन देवियों ने मुझे कल्पना विकास की शिक्षा दी थी और अपना उपन्यास ‘भगवान् कौटिल्य’ लिखते समय नैमिषारण्य के काल्पनिक दर्शन करते हुए ही अपनी सनातन संस्कृति की अमर आत्मा का मुझे साक्षात्कार हुआ।

हमारी संस्कृति में जो सुन्दरतम और सर्वश्रेष्ठता है, उसका उद्भव सरस्वती के तट के वनों में हुआ। आर्यावर्त के एक श्रेष्ठ द्रष्टा ने ऋग्वेद में कहा है- “वरुण, अग्नि, पानी और औषधि आप सब तृप्त हों। मरुतों के आलिंगन से हमें सुख मिले और इन सब देवताओं के आशीर्वाद से हमारा रक्षण हो। नैमिषारण्य के वन में शौनक मुनि ने हमको महाभारत की कथा सुनाई-महाभारत, जो भारतीय आत्मशक्ति का स्रोत है। हमारे अनेक तपोवनों में ही ऋषि-मुनि वास करते थे, आजीवन अपने संस्कार, आत्मसंयम और भावनाओं को सुदृढ़ बनाते थे। भारतीय स्मरण भण्डार नन्दनवन के सौंदर्य से भरा हुआ है। महिलाओं में श्रेष्ठ सीताजी के भव्य आत्म समर्पण की निश्वास पूर्ण करुणा अशोक-वन से सम्बन्ध रखती है। हमारे जीवन का उल्लास वृन्दावन के साथ लिपटा हुआ है। वृन्दावन को हम कैसे भूल सकते हैं? वहीं कृष्ण भगवान् ने यमुना-तट पर नर्तन करते हुए डालियों और पुष्पों की ताल साथ अपनी वेणु बजाई। उसकी ध्वनि आज भी हमारे कानों में सुनाई देती है और भगवान् ने ही कहा था- “अश्वत्थः सर्व वृक्षाणाँ” अर्थात् मैं वृक्षों में अश्वत्थ हूँ।

हमको पूर्वजों की ज्वलन्त संस्कृति मिली है, परन्तु हम उसके योग्य नहीं रहे। हम अपने वनों को काट डालते हैं। हम वृक्षों का आरोपण करना भूल गये। वृक्ष-पूजा का हमारे जीवन में स्थान नहीं रहा। हमारी स्त्रियों में से शकुन्तला की आत्मा चली गई है। शकुन्तला वृक्षों को पानी दिये बिना आप पानी ग्रहण नहीं करती थी। आभूषण-प्रिय होती हुई भी वह यह सोचकर पल्लवों को नहीं चुनती थी कि इससे वृक्षों को दुःख होगा। जब वृक्षों में फल आते तो वह बहुत ही आनन्द अनुभव करती थी।

पार्वती ने देवदारु को पुत्र के समान समझ कर माँ के दूध के समान पानी पिलाकर बढ़ाया।

मंजरित वृक्षों का सौंदर्य हम नहीं भूल सकते। हम नहीं भूल सकते भव्य वृक्षों का अद्भुत गौरव और वृद्ध ऋषियों के समान जगत् के कल्याण में ही जीवन साफल्य समझने वाले वनों को। यदि प्रत्येक पुरुष और स्त्री वृक्षों के महत्व को समझे और पुत्रवत् उनका परिपालन करे तो भारत का हर नगर, हर गाँव जीवनोल्लास से ओत-प्रोत हो जायगा। यह सुगम और सीधा-सा तथ्य भी हम कैसे भूल सकते हैं।

हमारे पूर्वज वृक्षों को कितनी श्रद्धा एवं सम्मान की दृष्टि से देखते थे, इसके कितने ही प्रमाण भारतीय साहित्य में मिलते हैं और कई वृक्षों करने की प्रथा तो अब भी प्रचलित है। अब प्रति वर्ष वन-महोत्सव मनाने के आयोजन का उद्देश्य लोगों को फिर से वृक्षों के महत्त्व को समझना है।

प्राचीन भारत में वृक्षों का धार्मिक महत्त्व विशेष था। प्राचीन साहित्य में अरण्यों एवं वनों के प्रसंग बहुत आते हैं और मूर्तिकला और चित्रकला में तो वृक्षों और पुष्पों का विशेष स्थान रहा है।

सिन्धु घाटी-सभ्यता के अवशेषों से पता चलता है कि उस युग के लोगों को वृक्ष कितने प्रिय थे। उनके मिट्टी के बरतनों पर पीपल के पत्तों के चित्र मिलते हैं। उनके राज्य-चिन्हों में तो झुकी हुई डालों वाला वृक्ष अंकित है और दूसरे में एक ऊँचे वृक्ष पर बैठा हुआ एक मनुष्य तथा उसके नीचे एक क्षुधातुर व्याघ्र अंकित मिलता है।

वेदों में पर्वतों और नदियों, मेघों के गर्जन और बिजली की कड़क, भयानक प्रचण्ड वायु, प्रभात सुषमा, शीतल झरने, वृक्ष और वनों का वर्णन आता है। वनदेवी की स्तुति में लिखी गई ऋग्वेद की एक ऋचा में प्रकृति का शब्द चित्र खींचा गया है। अश्वत्थ और न्याग्रोध की लकड़ी से बने हलों और रथों का प्राचीन ग्रन्थों में प्रायः वर्णन आया है। आरण्यकों के विषय में तो कहा गया है कि उनका अध्ययन वन के शीतल और एकाँत स्थान में करना चाहिए।

रामायण और महाभारत के घटनास्थल बहुधा वनों में ही हैं। महाभारत में खाण्डव वन के जलने का उल्लेख है और रामायण में पंचवटी वन की रमणीयता का वर्णन वर्णन किया गया है। पुराणों में वृक्षों के महात्म्य, वृक्षारोपण के पुण्य और वृक्ष काटने के पाप के सम्बन्ध में बहुत कुछ कहा गया है।

अग्निपुराण में गृह निर्माता से कहा गया है—

“घर के उत्तर में पलाश, पूर्व में बड़, दक्षिण में शाम और पश्चिम में अश्वत्थ के वृक्ष लगाने चाहिए। दक्षिणावर्ती सीमा पर काँटेदार झाड़ी लगानी चाहिए, घर के पास ही फूलों का एक बगीचा लगाना चाहिए। जिसमें फूलों के पौधे और शीशम के वृक्ष लगाये जायं।”

इसी पुराण में वृक्षों की पूजा का महात्म्य बताया गया है—”जो मनुष्य लोगों के हित के लिये वृक्ष लगाता है, वह मोक्षपद प्राप्त करता है। वृक्ष लगाने वाला मनुष्य अपने 30,000 भूत और भावी पितरों को मोक्ष दिलाने में सहायक होता है।” मत्स्यपुराण में कहा गया है—”10 कुएँ बनवाना एक ताल बनवाने के समान है। 10 तालों का निर्माण एक झील के निर्माण के बराबर है। 10 झील बनवाना एक सुपुत्र प्राप्त करने के समान पुण्यकारक है। किंतु दस पुत्रों का पुण्य केवल एक वृक्ष लगाने से प्राप्त हो जाता है।”

बुद्ध भगवान् को वटवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। बौद्ध कला और साहित्य में इसका निरंतर उल्लेख आता है। सिकन्दर और यूनानियों ने भारत के विशाल वट-वृक्षों को देखकर आश्चर्य किया था।

हमारी संस्कृति जो सुन्दरतम और श्रेष्ठतम है, उसका उद्भव आश्रमों और तपोवनों में हुआ था। हमारे संस्कारों पर नन्दनवन के सौंदर्य और सती सीता के कारण अशोक वन के करुणापूर्ण वातावरण की छाप लगी हुई है और वृन्दावन को भी हम कैसे भूल सकते हैं, जहाँ कृष्णा भगवान् ने अपना महान् सन्देश हमें सुनाया था?”

दिल्ली प्रान्तीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन, द्वारा आयोजित गोष्ठी में दिया गया भाषण।

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