भारतीय संस्कृति की उपयोगिता
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आचार और विचार का आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध है। जो व्यक्ति जिस परिस्थिति में, जिस वातावरण में, कार्यक्रम में अपना अधिक समय बिताता है, उसके विचार और मनोभाव उसी ढाँचे में ढल जाते हैं। भाषा, भेष, भाव, रहन, सहन, रीति-रिवाज, आचार, व्यवहार के पीछे एक परम्परा,एक विचारा धारा, एक इतिहास, एक दार्शनिकता छिपी होती है। लकड़ी का एक सिरा उठाने से जिस प्रकार दूसरा सिरा भी उठ आता है, उसी प्रकार अमुक प्रकार के आचार से अमुक प्रकार के विचारों का उत्पन्न होना और अमुक प्रकार से विचारों से अमुक प्रकार के विचारों का उद्भव होना भी स्वाभाविक है। आसुरी आहार-विहार, म्लेच्छ भाषा, भेष रखने पर, स्वच्छन्द आचार-व्यवहार रखने वाले व्यक्ति के लिए सुसंस्कृत,धर्म सम्मत विचार रख सकना कठिन है। इसी प्रकार उच्च मनोभूमि के व्यक्ति को कुरुचि पूर्ण जीवन-पद्धति स्वीकार नहीं हो सकती। उच्च अन्तः मनोभूमि के अनुकूल जीवन विधि ही हमारी संस्कृति है। इसे यों भी समझ सकते हैं कि यदि ऋषि प्रणीत दर्शन के अनुसार मनःक्षेत्र रखना हो तो व्यवहार में भी उन परम्पराओं को स्थान देना होगा, जो इस मार्ग के पथिकों के लिए सहायक ही नहीं, आवश्यक भी हैं।
उच्च नैतिक जीवन का निर्माण अपने आप नहीं हो सकता—पशु से मनुष्य बनाने के लिए भारी श्रम करना पड़ता है। कच्ची धातु को मजबूत फौलाद बनाने के लिए उसे अनेक भट्ठियों में होकर गुजरना पड़ता है। साधारण घटापार्चा को महान् रसायन अभ्रक बनाने के लिए उसे अनेक औषधियों की भावनाएं तथा अनेक अग्नि संस्कारों का आयोजन करना होता है। माली जब पौधे का विकास, सौंदर्य पूर्ण करना चाहता है, तो उसे उस पर बार-बार ध्यान देने और गुड़ाई, निराई, काट, छाँट, खाद,पानी आदि की क्रियायें करते रहने की जरूरत पड़ती है। यही बात मनुष्य के बारे में भी है। उसे मिट्टी मिली कच्ची धातु या कुसंस्कारी जीव मात्र कहा जा सकता है, इसका विशेष परिष्कार ही उसे मानव या भूसुर बनाने में समर्थ होता है। इस विशेष परिष्कार को संस्कार और उसकी क्रिया पद्धति को संस्कृति कहते हैं। भारतीय संस्कृति का उद्देश्य मनुष्य की आन्तरिक आस्थाओं और व्यक्ति गत तथा सामाजिक गतिविधियों को उच्च नैतिक आधारों पर विनिर्मित करना है। यह निर्माण कार्य मानव जीवन में इतना महत्व पूर्ण है जितना और कोई कार्य नहीं हो सकता।
संस्कृति का प्रधान उद्देश्य जहाँ नैतिकता का निर्माण है वहाँ राष्ट्रीयता को मजबूत बनाना भी है। एक समान आचार-विचार वाले व्यक्ति स्वभावतः आपस में अधिक प्रेम कर सकते हैं ओर अधिक घनिष्ठ एवं संगठित हो सकते हैं। धर्म और सम्प्रदाय आरम्भ में एक सिद्धाँत मात्र थे पीछे चलकर उनका परिवर्तन एक संगठन के रूप में हो गया। कारण यही है कि एक समान आचार, विचार के लोग आपस में अधिक समीप आते-जाते हैं। अपनी पुण्य परम्पराओं, ऐतिहासिक गाथाओं, रीति-रिवाजों को मनोभूमि में निरन्तर स्थान देते रहने से वे जीवन के अन्तराल में इतनी गहरी प्रवेश कर जाती हैं कि वे पूर्ण सत्य जैसी प्रतीत होती हैं, उनके प्रति असाधारण मोह हो जाता है। उनके चरितार्थ होते देखकर प्रसन्नता और दुर्बल होते देखकर दुख होने लगता है। अपने मजहब के तीर्थों, देवदूतों, ग्रन्थों, रिवाजों, कथाओं पर मनुष्य का एक ममता भरा सम्बन्ध जुड़ जाता है जो तोड़े नहीं टूटता। इस प्रकार संस्कृति, संगठन का वह कार्य करती है, जो वंश परम्परा भी नहीं कर सकती, भारतीय और पाकिस्तानी मुसलमानों में 99 प्रतिशत वे हैं जो मुश्किल से चार छः सौ वर्ष से मुसलमान बने हैं। इससे पूर्व उनकी वंश परम्परा लाखों करोड़ों वर्षों से हिंदू थी। कुछ सौ वर्षों तक एक संस्कृति के संपर्क में रहने से उन्होंने अपनी आस्था अब अपने वंशगत पूर्वजों, बान्धवों, तीर्थों एवं इतिहासों पर से हटा कर अरब देश के साथ सम्बन्धित करली हैं। उनकी भाषा, भेष, भाव एवं निष्ठा अरबी हो चली है। संगठित भी वे उसी आधार पर हो रहे हैं। यों दर्शन की दृष्टि से हिंदू धर्म संसार के अन्य किसी देश के धर्म या दर्शन से घटिया नहीं है पर प्रश्न धर्म, आदर्श, सिद्धाँत आदि की उत्कृष्टता का नहीं है। संगठन का आधार तो संस्कृति होती है जिसे गुणावगुण की परीक्षा करके नहीं वरन् निरन्तर अभ्यास और उपयोग के कारण अपनी प्रिय वस्तु मान लेता है। यह मनोवैज्ञानिक सचाई ही संस्कृतियों को संगठन के रूप में परिवर्तन कर देती है और सुदृढ़ राष्ट्रीयता का निर्माण करती है।
प्राचीन काल में मुसलमान आक्रमणकारियों ने इस बात का पूरा-2 प्रयत्न किया कि भारत के निवासी उनकी संस्कृति को स्वीकार कर लें, जिससे विरोध का आधार नष्ट हो जाय और उनकी स्वाभाविक स्नेह भावना अरब की ओर बह उठे। वे लोग धैर्य और चतुरता पूर्वक इस कार्य को न कर सके अति आतुरता और अति उत्साह से उन्होंने प्रलोभन और दमन को आधार बनाया। अँग्रेज आक्रमणकारियों का भी दृष्टिकोण वही था, उन्होंने बाइबिल को आगे लेकर वही सब चाहा, पर चूँकि वे अधिक चतुर थे, बर्बरता से उत्पन्न प्रतिक्रिया की हानि को वे समझते थे, इसलिए उन्होंने लार्ड मेकाले की योजना के अनुसार शिक्षा के माध्यम से अपनी संस्कृति को इस देश में प्रतिष्ठापित किया। धर्म विस्तार में तो उन्हें कम सफलता मिली, पर साँस्कृतिक दृष्टि से उन्हें आश्चर्यजनक सफलता मिली। अमेरिका आदि देश अपनी संस्कृति के धर्म के लिए भारत में भारी धन व्यय कर रहे है। कारण स्पष्ट है ईसाई संस्कृति को अपनाने वालों की निष्ठा ईसाई राष्ट्रों की ओर होने की आशा उसी प्रकार की जाती है जिस प्रकार मुसलमानी संस्कृति अपना लेने पर पाकिस्तान का उद्भव हो गया, संस्कृति में राष्ट्रीयता उत्पन्न करने की शक्ति है, इस तथ्य को ध्यान में रख कर चीन आदि देशों ने सम्प्रदाय और मजहब से संस्कृति को अलग रखा है। हाँ धर्म परिवर्तन तो कोई भी कर सकता है पर साँस्कृतिक भाषा भेष, भाव, परम्परा आदि न बदलने पाये, इस पर समुचित ध्यान रखा है। अब राष्ट्रीयता और संस्कृति को अलग 2 करने का दोनों के आधार अलग अलग रखने का परीक्षण आरम्भ हुआ है। भारत आदि कुछ देशों में निरपेक्ष धर्म का ऐसा ही परीक्षण हो रहा है। इसके प्रयोग में सफलता मिल जाय तो संस्कृति से राष्ट्रीयता की उत्पत्ति के सिद्धाँत में अन्तर आ सकता है। इन परीक्षणों के सफलता-असफलता के लिए धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा की आवश्यकता है।
संस्कृति को जो लोग ‘कला’ तक सीमित कर देना चाहते हैं, वे उसके महत्व को घटाते हैं। आज लोक नृत्य, चित्रकला, संगीत पद्धति, शिलालेख, सिक्के, पुराने जेवर, खिलौने, ऐतिहासिक खोज वेष विन्यास आदि में संस्कृति को सीमाबद्ध किया जा रहा है। साँस्कृतिक कही जाने वाली पुस्तकों में इन्हीं बातों की चर्चा होती है। कोई साँस्कृतिक प्रदर्शनी, गोष्ठी,संगठन आदि हो रही हो तो वहाँ इन्हीं बातों का ऊहापोह होता दिखाई देता है। निस्संदेह यह बातें भी संस्कृति का एक अंग है, पर इन्हीं तक सारी गतिविधि को सीमित कर देना ऐसा ही है जैसे घोड़ा पालकर उससे सवारी का लाभ उठाने की अपेक्षा केवल घोड़े की पूँछ के कुछ बाल उखाड़ कर उसे टोपी में लटकाये फिरना। ‘पुरातत्व’ का ही दूसरा नामा संस्कृति नहीं है। दोनों में सम्बन्ध और समानता तो है पर कार्य क्षेत्र भिन्न है। पुरातत्व हमारे इतिहास पर प्रकाश डालता है पर संस्कृति का उद्देश्य तो मनुष्य को सुसंस्कृत बनाना—उसके विचार और कार्यों को उच्च नैतिक भूमिका में विकसित करना है। साँस्कृतिक में जो कला है वह केवल ‘कला’ नहीं, वरन् विचार और व्यवहार आध्यात्मिक सौंदर्य निखार की एक महत्व पूर्ण शक्ति तरंग कही जा सकती है।
विचार पद्धति को एक प्रकार के सैद्धान्तिक विज्ञान की शृंखला कही जा सकती है। उसे समझने और हृदयंगम करने के लिए स्थूल उपकरणों की आवश्यकता होती है। साइन्स के विद्यार्थी को केवल पुस्तक या व्याकरण के द्वारा सिद्धाँत समझाये जायं और उन सिद्धाँतों को उपकरणों, यंत्रों एवं वस्तुओं की सहायता से प्रत्यक्ष करके न दिखाया जाय तो समझने वाले को भारी कठिनाई पड़ेगी और समझने वाले तथा समझाने वाले का उद्देश्य पूर्ण न होगा। इसलिए सिद्धांतों के प्रतिपादन के लिए निश्चय ही कुछ प्रयोग प्रत्यक्ष रूप से करने होंगे। ठीक यही बात भारतीय संस्कृति के जीवन की निष्ठा और नीति का निर्धारण करने वाले उच्च आदर्शों के बारे में लागू होती है। उनको कह देना और सुन लेना इतना ही काफी नहीं है वरन् वे अन्तस्तल तक उतर जायं और हृदयंगम होकर जीवन की गतिविधि में प्रकट होने लगें, इस स्थिति को उत्पन्न करने के लिए कुछ प्रत्यक्ष प्रदर्शनात्मक आयोजनों की भी आवश्यकता पड़ती है। ऋषियों ने इस आवश्यकता को भली प्रकार समझ लिया था और उन्होंने उसकी समुचित व्यवस्था भी बना दी है।
इस व्यवस्था का नाम ‘संस्कार’ रखा गया है। हम बराबर सुसंस्कृत बनते चलें, इस उन्नति क्रम में सहायता देने के लिए पग-पग पर ऐसे प्रोत्साहन भरे प्रदर्शनात्मक, उल्लास पूर्ण, विचारोत्तेजक, मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ने वाले, मंत्र शक्ति से समन्वित धार्मिक परम्पराओं से ओत-प्रोत सामाजिक उत्सवों का निर्माण किया गया। इन आयोजनों के द्वारा ऐसा वातावरण उत्पन्न किया जाता है, जिससे उन भाग लेने वालों को साँस्कृतिक आदर्शों को हृदयंगम करने और आचरण में लाने की भारी प्रेरणा मिले। गरम लोहे की ठोक पीट करने पर उसे मनमर्जी से तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है। सभा प्रदर्शनों और सामूहिक सामाजिक उत्सवों में मनुष्य की मनोभूमि उल्लसित होती है उस समय में वह कई बार साहसपूर्ण निर्णय कर डालता है, ऐसे अनेक उदाहरण देखे गये हैं। गरम लोहे की तरह जो छाप उस पर उस समय डाली जाती है वह अधिक टिकाऊ होती देखी गई है। इसीलिए संस्कारों का महत्वपूर्ण आयोजन किया गया है।
षोडश संस्कार प्रसिद्ध है। बालक के गर्भ में आने से लेकर मृत्यु पर्यन्त पुँसवन, सीमन्त, जातकर्म नामकरण, अन्न प्राशन, चूड़ाकर्म, विवाह, अग्न्याधान, अन्त्येष्टि आदि संस्कार समय-समय पर होते रहते हैं, इससे उसे आगामी कार्यक्रम के लिए समुचित शिक्षण बड़े ही उल्लासपूर्ण वातावरण में मिलता रहता है। प्रति मास आने वाले त्यौहार, व्रत और जयन्तियाँ अपने भीतर भारी शिक्षाएं छिपाये हुए है। हर त्यौहार जीवन में इस विशेष सिद्धाँत का, कार्यक्रम का प्रतीक है, उस त्यौहार को उस सिद्धान्त एवं कार्यक्रम को समझने और समझाने का यदि पूर्वकाल की भाँति समुचित व्यवस्था रहे तो हँसी-खेल में जीवन की महान शिक्षा का वह विश्व विद्यालय घर-घर में बड़ी सफलतापूर्वक चलता रहे। व्रत उपवास स्वास्थ्य सुधार एवं आत्मशुद्धि के लिए ही नहीं हैं वरन् इन व्रतों के साथ जो कथा-गाथाएं एवं परंपराएं जुड़ी रहती हैं वे उस दिन के विशेष चिन्तन मनन के कारण अन्तःकरण पर एक अभीष्ट छाप छोड़ती है। महापुरुषों और देवताओं की जन्म जयन्तियाँ उन महान आत्माओं के कार्यों, चरित्रों और उपदेशों को हमारे सम्मुख रखने के लिए सचमुच ही बहुत भारी प्रेरणा अपने अन्दर छिपाये रहती हैं। यदि इन संस्कारों, त्यौहारों, पर्वों, व्रतों, जयन्तियों को लकीर पीटना मात्र न रख कर प्रेरणाप्रद उत्सवों का प्राचीनकाल जैसा रूप दे दिया जाय। प्रभावशाली, चरित्रवान और निस्वार्थ पुरोहित यदि इन कार्यक्रमों को पूरी दिलचस्पी के साथ लोकमानस निर्माण की दृष्टि से कराने लगे तो यह निश्चित है कि जितना कार्य अनेकों सभा सोसाइटियों, अखबार, पर्चे, लाउडस्पीकर, विद्यालय, शिविर नहीं कर सकते वह सब अनायास ही बहुत सुगम रीति से हो सकता है। जीवन के महान आदर्शों की शिक्षा देने के लिए वह संस्कार, त्यौहार आदि के अवसर सर्वोत्तम माध्यम सिद्ध हो सकते हैं।
प्रत्येक जीवित व्यक्ति की जन्मतिथि और कुछ विशेष पूर्वजों की निधन तिथि यदि ठीक प्रकार मनाई जाने लगे तो हर जीवित व्यक्ति को अपने जीवन का मर्म समझने सोचने का अवसर मिलता रहे और पूर्वजों के जीवन से शिक्षा प्राप्त करने एवं उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर मिलता रहे। इन दो व्यक्ति गत त्यौहारों का प्रचलन अब लुप्त होता जा रहा है पर वस्तुतः इनका मनाया जाना बहुत ही शिक्षाप्रद एवं उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
अनेकों रीति रिवाज, पूजा उपासना के प्रकार तीर्थयात्रा कथा, कीर्तन, आचार-विचार, रहन-सहन, भाषा-भेष भाव, आदि के पीछे भी उन्हीं आदर्शों की आत्मा झाँकती है जो मानव को महामानव बनाने के लिए बनाये गये हैं। रामायण, भागवत, गीता आदि की कथाएं यद्यपि आज के लोग अमुक उपाख्यान सुन लेने से स्वर्ग का अमुक लाभ प्राप्त होने की तुच्छ बुद्धि के अनुसार पढ़ते-सुनते हैं, पर यदि उन्हें आदर्शों की प्रेरणा के लिए सुना या पढ़ा जाय तो सामान्य सभा-व्याख्यानों की अपेक्षा उनका प्रभाव अनेक गुना हो सकता है। ऐसी कथाएं मरने के बाद स्वर्ग पहुँचाने के लाभों तक ही सीमित न रह कर नैतिक उत्थान में तुरन्त सहायक हो सकती है और भूतल पर स्वर्ग रचना की भूमिका सम्पादन कर सकती हैं। प्राचीनकाल में होता भी ऐसा ही था।
वर्णाश्रम-धर्म एक श्रेष्ठतम समाज रचना है। आज ऊँच-नीच की, भेदभाव की, विशेषाधिकारों की जो विकृतियाँ उसमें घुस पड़ी हैं, उन्हें हटा दिया जाय तो वह वस्तुतः एक अत्यन्त उपयोगी और समाज को सुव्यवस्थित, सुविकसित और सुसंगठित होने में योग दे सकती है।
पंडित, पुरोहित, साधु, संन्यासी, पुजारी आदि का लोक सेवी एवं धर्म प्रचारक वर्ग यदि आज की हरामखोरी को छोड़कर प्राचीनकाल की भाँति जनता के नैतिक शिक्षण के लिए आदर्श प्रहरी की तरह अपने आप को जुटा दे तो करोड़ों रुपया जो इन लोगों के निमित्त आज अपव्यय हो रहा है वह सच्चे अर्थों में सार्थक हो जाय।
जो सिद्धाँत आदर्श और आचार, विचार आज कुछ अटपटे से लगते हैं और जिनकी वास्तविकता में सन्देह होने के कारण लोग उन्हें अपनाने को तैयार नहीं होते, यदि उनको वैज्ञानिक दृष्टि से उपयोगिता, तान्त्रिक दृष्टि से वास्तविकता और व्यवहारिक दृष्टि से आवश्यकता को समझा दिया जाय तो उपहास का कारण न रह कर वे तथ्य जीवन के एक महत्व पूर्ण अंश बनकर हमारे उत्थान में भारी सहायता पहुँचा सकते हैं।
पुरानी होने पर हर वस्तु में कुछ विकार आते हैं, हमारी संस्कृति में भी आये हैं, पर मूल वस्तु शुद्ध हो तो बाहरी विकार जल्दी ही दूर हो जाते हैं।
चाँदी जमीन में गढ़ी रहे तो मैली हो जाती, पर उसे माँजने पर फिर पहला रूप निखर सकता है। भारतीय संस्कृति ने प्राचीन काल में इस देश के कोने-कोने में आदर्शवादी का शुभ्र प्रकाश फैलाया था नररत्न पैदा किये थे और सुख शान्ति की स्वर्गीय परिस्थितियों का इस भूमि पर अवतरण किया था। प्रयत्न करने पर अब फिर भी वैसा हो सकता है। साँस्कृतिक पुनरुत्थान आज की एक महान आवश्यकता है। उसकी उपेक्षा करने से प्रगति-पथ पर आगे बढ़ नहीं सकते।

