• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • संस्कृति सौष्ठव
    • संस्कृति सौष्ठव (Kavita)
    • वेदों में यज्ञाग्नि की प्रार्थना
    • सच्चा मार्ग तो कर्मयोग ही है
    • क्रोध को शत्रु से कम मत समझिए
    • भारतीय संस्कृति की उपयोगिता
    • बुरे विचारों से सावधान!!
    • हमें स्वतन्त्र चिन्तन करना चाहिए
    • बातें नहीं काम कीजिये
    • भारतीय एकता के सूत्र उसकी संस्कृति में
    • सच्ची स्वतन्त्रता
    • आत्मिक-शाँति कैसे मिले?
    • वर्तमान समस्याओं का हल-चरित्र निर्माण
    • अभिमान हटाइए
    • तीर्थ-यात्रा और धार्मिक मेलों का उद्देश्य
    • साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए आप यह कीजिए
    • रुपये की शक्ति
    • रुपये की शक्ति (Kavita)
    • साँस्कृतिक सेवा के लिए तपोभूमि यह करेगी
    • संतोषामृत पिया करें
    • हमारे जीवन में वनों का महत्त्व
    • अमृत वचन
    • अमृत वचन (Kavita)
    • अधिक बच्चे पैदा मत कीजिए
    • तपोभूमि—समाचार
    • नरमेध का आह्वान
    • नरमेध का आह्वान (Kavita)
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login





Magazine - Year 1956 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT SCAN


वेदों में यज्ञाग्नि की प्रार्थना

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 2 4 Last
शर्मास्यवधूत रक्षोऽवधूताऽरातयोऽदित्यास्त्वगसि प्रति त्वादितिर्वेत्तु॥ अद्रिरसि वानस्पत्यो ग्रावासि पृथुबुघ्नः प्रति त्वादित्यास्त्वस्तेत्तु ॥ 14 ॥

—यजुर्वेद, प्र.ख, प्र. अ.

अर्थ— हे यज्ञ! तुम सुख कारक एवं आश्रय लेने योग्य हो, तुम से रोग विनष्ट होते हैं तथा रोग के कीटाणु भी ध्वस्त होते हैं, तुम पृथ्वी के लिये त्वचा की भाँति रक्षक हो यानी जिस भाँति त्वचा के अभाव में प्राणी, प्रकृति दत्त गर्मी-सर्दी को सहन करने में असमर्थ है, उसी भाँति यज्ञ के अभाव से धरती के सारे प्राणी अपने को रक्षकविहीन स्थिति में अनुभव करेंगे और होंगे! तू हरीतिमा पूरित वनस्पतियों से आच्छादित पर्वत के सदृश्य सुन्दर, सुहावने और हितकारी हो, तुम इस सुविस्तृत आकाश में जल से लबालब भरे वर्षाभिमुख बादलों के सदृश हो तुम जो पृथ्वी मण्डल की रक्षक त्वचा बन कर विद्यमान हो, उसे वायु देव भी अपने शोधक और रक्षक रूप में स्वीकार करता है यानी यज्ञ के द्वारा ही पवन देव अपने में परिशोधक और जीवनतत्व दायक गुण ग्रहण कर प्राणियों के लिये लाभदायक सिद्ध होते हैं।

धान्यमसि धिनुहि देवाय प्राणाय त्वोदानाय त्वा व्यानाय त्वा। दीर्घामनु प्रर्णित— मायुषे धाँ देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वाँ महीनाँ पयोऽसि ॥ 20 ॥

यजु. प्रथम खण्ड, प्र. अ.

अर्थ— हे यज्ञ! तुम देवों का धान्य (भोजन) हो, अतः इस छवि के द्वारा तुम उसे प्रसन्न करो, जिससे वे प्रसन्न होकर यज्ञकर्ता को सुख और कल्याण प्रदान करें। हम तुम्हें प्राण, उदान, व्यान आदि प्राणों में, आयु में तथा जीवन की व्यापक उन्नति करने के लिए धारण करते हैं, आपके अनुग्रह से यह सब वस्तुएं हम प्राप्त करेंगे।

अदित्यै व्युन्दनमसि विष्णो स्तुपोऽस्यूर्ण— म्रदसं त्वा स्तृणामि स्वासस्थाँ देवेभ्यो भुवपतये स्वाहा भुवन पतये स्वाहा भूतानाँ पतये स्वाहा ॥ 2 ॥

—यजु ., प्र. ख., द्वि. अ.

अर्थ—हे यज्ञ! तू पृथ्वी को सींचने वाला है, अर्थात् पृथ्वी निवासियों को सर्वांगी अभ्युन्नति और कल्याण के अमृत से अभिसिंचित करते हो। हे देवों को सुखद स्थिति देने वाले एवं सभी भाँति रक्षा करने वाले यज्ञ! हम तुम्हें सुविस्तृत और सूक्ष्म से सूक्ष्मतर बनाना चाहते हैं।

अग्ने वाजजिद्वाजं त्वाँ सरिष्यन्तं वाजजित सम्मार्ज्मि। नमो देवेभ्यो सुधा पितृभ्यः सुयने में भूयास्तम ॥ 7 ॥

—यजु. प्र. ख., दू. अ.

अर्थ हे बलप्रापक और बल के विजेता यज्ञ-अग्नि! मैं मुझे प्रदीप्त करता हूँ। देवों के लिये तुम सत्कार एवं पितरों के लिये शक्ति स्वरूप हो। ये दोनों मुझे संयम में चलाने वाले हों।

अस्कन्नमद्य देवेभ्यऽआज्य स्रंभ्रियासम— िघ्रणा विष्णो मा त्वावक्रमिषं वसुमतीमग्ने तेच्छायामुपस्थेषं विष्णो स्थानम्सीतऽइन्द्रो वीर्य्यमकृणो दूर्घ्वोऽध्वरऽआस्थात् ॥ 8 ॥

—यजु. प्र. ख., धू. अ.

अर्थ— आज मैं दिव्य गुणों के लिये, अविचलित आज्य को गति के साधक अग्नि के द्वारा अच्छे प्रकार धारण करता हूँ। हे यज्ञ! मैं धन-धान्य से युक्त तुम्हारे आश्रय को प्राप्त होऊँ। हे अग्ने! तू यज्ञ का आधार है। इससे वायु पराक्रम करता है, यह आकाशस्थ रहे।

अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती। व्यख्यन महिषो दिवम् ॥ 7 ॥

—यजु. प्र. ख., तृ. अ.

अर्थ—यज्ञाग्नि की दीप्तिप्राण से अगन तक अन्तर में विचरण करती है। यह महान् अग्नि द्यौलोक को प्रकाशित करता है। यह यज्ञ, अपने प्रभाव को भौतिक लाभ देने तक में ही सीमित नहीं करता। इसका प्रभाव यज्ञकर्ता के अन्तर में भी संक्रमित होता है जिससे प्राण और अपान को अलग करने वाले कपाट जल जाते हैं और जहाँ प्राण और अपान एकीभूत हुए कि दिव्यलोक में जाने का पथ और शक्ति एवं प्रकाश एक साथ ही मिल जाता है।

अयमग्निगृर्हपतिर्गार्हपत्यः प्रजाया वसुवित्तम्। अग्ने गृहपतेऽभि द्मुम्नभि सहऽआयच्छस्व ॥39॥

—यजु., प्र. ख., ती. अ.

अर्थ—यह पोषण करने वाली गार्हपत्य अग्नि, प्रजा के लिये अतिशय ऐश्वर्य, यश एवं बल का विस्तार करें।

अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्याऽअयम्। अपा रेतासि जिन्वति ॥ 12 ॥

—यजु. प्र. ख., तृ. अ.

अर्थ—यह महान् यज्ञाग्नि, पृथ्वी में व्याप्त हो कर इसका पोषक और संचालक बन जाता है, अन्तरिक्ष लोक में यह पर्जन्य से एकीभूत होकर वृष्टि (जल) का रूप धारण कर लेता है और यही यज्ञाग्नि द्यौलोक में व्याप्त और सामंजस्यसित होकर सूर्य रूप को प्राप्त होता है अतः यज्ञ के द्वारा मनुष्य प्रत्येक लोक की ऊँची से ऊँची स्थिति को प्राप्त कर लेता है।

गृहा मा विभीत मा वेपध्वमूर्ज विभ्रतऽएमसि। ऊर्ज विभ्रद्वः सुमनाः सुमेधा गृहानैमि मनसा मोदमानः ॥ 41 ॥

—यजु. , प्र. ख., तृ. अ.

अर्थ—यज्ञ भगवान यज्ञ कर्ताओं को आश्वासन देते हैं—”हे गृहस्थों! डरो मत। घबराओ मत, बल-वीर्य को धारण करने वाले हम तुम्हारे पास आये हैं। ओज को धारण करते हुए हम शुद्ध मन और बुद्धि वाले हम हृदय प्रसन्न होते हुए हम तुम्हें कल्याण के लिए प्राप्त होते हैं।

कुक्कुटोऽसि मधुजिहह्वऽइषमूर्जमावद त्वया वय संघात संघातं जेष्म वर्षवृद्धमसि प्रति त्वा वषं वृद्धं वेत्तु परापूत रक्षः परापूता अरातयोऽपहत रक्षो वायुर्वो विविनक्तु देवो वः सविता हिरण्य पाणिः प्रति - गृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना ॥ 16 ॥

यजु., प्र. ख. प्र. अ.

अर्थ—हे यज्ञ! तुम जल के मालिन्य आदि दोष तथा उसमें रहे अभाव की परिपूर्ति करने वाले हो, मधु जिह्वा वाले हो अर्थात् माधुर्य्यतत्व से तुम ओत-प्रोत हो, तुम वृष्टि के वर्द्धक हो, मनुष्यों को यह जानना चाहिये कि यज्ञ, वृष्टि वर्द्धक है। तुम हमारे लिये अन्न और रस को सिद्ध करो, जिससे उसे भक्षण कर हम अन्तर और वाह्य दोनों संग्रामों में विजयशील हो सकें, तुम्हारे द्वारा हमारे बाहरी विघ्न नष्ट हो जायं और हमारी अदानशीलता के भाव विचार भी विनष्ट होवें। तुम आहुति में दिये गये पदार्थों को सूक्ष्म से सूक्ष्मतर बनाकर उसे परिव्यापक सूर्य किरणों के सहारे सर्वत्र फैला दो।

देव सवितः प्रसुव यज्ञं प्रसुव यज्ञपति भगाय। दिव्यो गर्न्धवः केतपूः केतं नः पुनातु वाचस्पतिर्वाधं नः स्वदतु ॥ 7 ॥

यजु., प्र. ख., एकादश अध्याय

अर्थ—हे सर्वतत्वों के उत्पादक यज्ञ! हमें सुख एवं ऐश्वर्य को देने वाले श्रेष्ठतम कर्म, यज्ञानुष्ठान में प्रवृत्त करो और यज्ञ के अनुष्ठान करने वालों को अपने दिव्य गुणों की उपलब्धि के लिये उत्प्रेरित करो। जिससे हम लोग दिव्य वाणी और दिव्य वाणी के अधिष्ठाता की पवित्रता से अपने ज्ञान और वाणी के साधनों को पवित्रित करें, जिससे हमारा ज्ञान अमृत से और हमारी वाणी आस्वाद से परिपूर्ण हो जाय।

इन्द्रस्य स्यूरसोंद्रस्यध्र वोऽसि ऐन्द्रमसि वैश्वदेवमसि30

—यजु, प्र. ख. पञ्च. अ.

अर्थ—हे यज्ञ! तू ऐश्वर्यवान इन्द्र या परमेश्वर के लिये सुनिश्चित रूप से आकर्षण के साधन हो,क्योंकि तुम्हारे द्वारा आह्वान होने पर परमेश्वर से आये बिना रहा ही नहीं जाता। इन्द्र के इन्द्रत्व और विश्व देव के विश्वदेवत्व सभी तुम पर ही अवलम्बित है-यानी तुम्हारे द्वारा ही इन दिव्य गुणों की अभिप्राप्ति सबों को होती है।

ध्रुवोसि पृथिवीं दृह ध्रुवक्षिदस्यन्तरिक्षम् दृहच्युमक्षिदसि दिवं दृहाग्नेः पुरीपमसि॥

यजु॰ प्र॰ ख॰, पञ्चम अध्याय, श्लोक 1

अर्थ—हे यज्ञ! तू अच्युत स्थान में वास करने वाला है, तू स्वयं ध्रुव है यानी तेरी क्रिया का फल अत्यन्त ही सुनिश्चित है, इसीलिए प्रार्थना है कि तू पृथ्वी लोक को शुभ में दृढ़ करो, अन्तरिक्ष लोक को मंगलमयता में स्थिर करो और द्यु लोक को कल्याण में चिर प्रतिष्ठित करो।

रक्षोहणो वो वलगहनः प्रोक्षामि वैष्णवात्रक्षोहणो वो वलगहनोऽवनयासि वैष्णवात्रक्षोहणो वो वलगहनोऽवस्तृणामि वैष्णावात्रक्षोहणो वाँ वलगहनाऽउपदधामि वैष्णवी रक्षोहणो वाँ वलगहनो पर्युहामि वैष्णवी वैष्णवमसि वैष्णवा स्थ ॥25॥

—यजु. प्र. ख.,पञ्चम अ.

अर्थ—रोग कृमि नाशक तथा विषाक्त रोग-नाशक यज्ञ-प्रयोगों! हम तुम को सिक्त करते हैं। रोग-कृमि नाशक तथा विषाक्त-रोग नाशक यज्ञ-प्रयोगों! हम तुम्हें स्वाधीन करते हैं। हे रोग-कृमि नाशक तथा विषाक्त-रोग नाशक यज्ञ प्रयोगों! हम तुम्हें विस्तृत करते हैं। हे रोग-कृमि नाशक , विषाक्त-रोग नाशक तथा यज्ञ से संगत द्यावा पृथ्वी! हम तुम्हारा आश्रय लेते हैं। हे रोग कृमि नाशक, विषाक्त रोग-नाशक एवं यज्ञ से संगत द्यावा पृथ्वी! तुमको हम यज्ञ प्रयोगों से परिपूरित करते हैं। हे हव्य! तू यज्ञ के योग्य है तथा है ऋत्विजों! तुम यज्ञ को सम्पन्न करने योग्य हो। तुम हमारे रोग-शोकों को निवृत्त करो।

ये रुपाणि प्रतिमुञ्चमानाऽअसुराः सन्तः स्वधया चरन्ति। परापुरो निपुरो ये भरन्त्यग्निष्टाँल्लो-कात्प्रणुदात्यस्मात् ॥30॥

—यजु. प. ख. दू.अ.

अर्थ—जो रूप को बदलने वाले, जो घातक अन्न से आकृष्ट होकर विचरते तथा जो दूरस्थ और निकटस्थ स्थानों में रहते हैं, उनको यज्ञ-अग्नि इस लोक से दूर करें। सूक्ष्म जगत् में सदा ही आसुरी शक्तियाँ चक्कर लगाया करती हैं, जहाँ किसी ने भी शरीर, प्राण और मन से जरा भी घातक अन्नों का सेवन किया कि आसुरी शक्तियाँ उनमें प्रवेश कर जाती हैं और उसे क्रियात्मक असुर बना डालती है। अतः शरीर, प्राण और मन से हमें सावधानता पूर्वक सात्विक तत्व ही ग्रहण करना चाहिये। किंतु यज्ञ की दिव्य और प्रचण्ड शक्ति इन असुरों को जलाये डालती है, इसीलिये यज्ञकर्ताओं पर आसुरी शक्ति यों का कुछ बल नहीं चलता।

अत्र पितरो मादयध्वं यथाभागमावृषायध्वम्। अमीमदन्त पितरो यथा भागमावृषायिषत्॥31॥

यजु.,प्र. ख., दू. अ.

अर्थ—हे यज्ञ के द्वारा आहुत देवताओं और पितरगणो! आप लोग इस यज्ञ में आकर आनन्द और पुष्टि को प्राप्त कीजिये और हमें भी आनन्द और पुष्टि दीजिये। जिस भाँति सवितादेव निष्काम भाव से विश्व को सुख पहुँचाते हैं, उसी भाँति हम सब भी आपके समान ही विश्व सेवा में संलग्न रहें।

First 2 4 Last


Other Version of this book



Version 2
Type: TEXT
Language: HINDI
...

Version 1
Type: SCAN
Language: HINDI
...


Releted Books


Articles of Books

  • संस्कृति सौष्ठव
  • संस्कृति सौष्ठव (Kavita)
  • वेदों में यज्ञाग्नि की प्रार्थना
  • सच्चा मार्ग तो कर्मयोग ही है
  • क्रोध को शत्रु से कम मत समझिए
  • भारतीय संस्कृति की उपयोगिता
  • बुरे विचारों से सावधान!!
  • हमें स्वतन्त्र चिन्तन करना चाहिए
  • बातें नहीं काम कीजिये
  • भारतीय एकता के सूत्र उसकी संस्कृति में
  • सच्ची स्वतन्त्रता
  • आत्मिक-शाँति कैसे मिले?
  • वर्तमान समस्याओं का हल-चरित्र निर्माण
  • अभिमान हटाइए
  • तीर्थ-यात्रा और धार्मिक मेलों का उद्देश्य
  • साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए आप यह कीजिए
  • रुपये की शक्ति
  • रुपये की शक्ति (Kavita)
  • साँस्कृतिक सेवा के लिए तपोभूमि यह करेगी
  • संतोषामृत पिया करें
  • हमारे जीवन में वनों का महत्त्व
  • अमृत वचन
  • अमृत वचन (Kavita)
  • अधिक बच्चे पैदा मत कीजिए
  • तपोभूमि—समाचार
  • नरमेध का आह्वान
  • नरमेध का आह्वान (Kavita)
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj