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Magazine - Year 1956 - Version 2

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सच्ची स्वतन्त्रता

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(श्री अगरचन्द जी नाहटा, बीकानेर)

हम सब अपने जीवन में प्रतिपल परतन्त्रता का अनुभव करते हैं और उससे दुखी रहते हैं। हम जो करना चाहते हैं, वह कर नहीं पाते, हम जो प्राप्त करना चाहते हैं वह प्राप्त हो नहीं रहा है, इससे हम परतन्त्र हैं, पराधीन हैं, इसमें दो मत हो नहीं सकते। सुखानुभव करने के लिए स्वतन्त्र होना परमावश्यक है। इस बात को भी हम जानते हैं कि कोई भी व्यक्ति पराधीन क्षण भर भी नहीं रहना चाहता। इसीलिए कहा गया है “पराधीन सपनेहु सुख नाहीं।” मनुष्य तो अधिक विचारशील प्राणी हैं पर पशु भी परतन्त्र रहना नहीं चाहते। कभी परतन्त्रता बन्धन में फँस जाते हैं तो स्वतंत्र होने को तड़पते रहते हैं।

अब हमें देखना यह है कि यह पराधीनता है क्या, एवं क्यों है? इसीलिए सर्वप्रथम ‘स्व’ और ‘पर’ का विवेचन आवश्यक हैं। वास्तव में देखा जाय तो केवल आत्मा ही हमारा ‘स्व’ हैं उसके अतिरिक्त सारे पदार्थ ‘पर’ हैं। धन, कुटुम्ब और परिवार ही नहीं, यह शरीर भी ‘पर’ हैं। इन सब ‘पर’ को ‘स्व’ मान लेने के कारण ही हम पराधीन बने हैं। हम सब मन एवं इन्द्रियों के गुलाम बने हुए हैं। जिन व्यक्तियों से हमें खाद्यादि पदार्थ या आजीविका मिलती हैं, उन कुटुम्बीजनों, सेठ, राजा आदि के दास बने हुए हैं। उनको प्रेरणा एवं कथानुसार हमें प्रवृत्ति करना पड़ रही हैं। इस दासता से छुटकारा पाना ही स्वतन्त्रता है जैसे इन पर पदार्थों ने हमें अपने आधीन बना रखा है वैसे ही हम इनको वश में कर अपने हितानुकूल काम इनसे लेने लगें, तभी हम स्वतंत्र कहे जायेंगे। संक्षेप में इन पर निमित्तों कारणों के वश हमारी आत्मा ही हमारे नियंत्रण में नहीं रही। वह कर्मों के नचाये नाचती हैं, वह अपना आपा, भूल एवं खो चुकी हैं। परतन्त्रता के मूल कारण हम ही हैं, हमारे कर्म ही हैं, दूसरे नहीं।

जहाँ तक आत्म स्वरूप का भान नहीं होता, मनुष्य चाहे कितना ही शक्ति शाली, व धन सम्पन्न हों वह पराधीन ही रहेगा। व्यवहार में ही देखते हैं कि एक व्यक्ति के घर में लाखों व करोड़ों की सम्पत्ति गड़ी हुई है पर जब तक उस व्यक्ति को उसका पता नहीं, वहाँ तक वह दूसरों के पास दीनता से प्रार्थना करता रहता है, आजीविका के लिए इधर-उधर चक्कर काटता रहता है। दूसरा जो भी कहे, चाहे वह बुरा भी हो पर उसी को मानना पड़ता है। जो काम हम करना नहीं चाहते, उसे अनिच्छा से भी करना पड़ता है। पर जब हमें अपने घर की समृद्धि का पता चल जाता है, उसी समय वह पराश्रितता से मुक्त हो जाता है। एक क्षण के लिए भी वह पराधीन नहीं रहना चाहता। उसी तरह आत्मा की अनंत शक्ति व समृद्धियों को हम भूले हुये हैं और सुख बाहर की ओर ढूंढ़ते फिरते हैं। उसे दूसरे पदार्थों और दूसरे व्यक्तियों से प्राप्त होने की चीज समझ रहे हैं। इस भूल को समझना व सुधारना होगा, तभी हमारी परतंत्रता मिट सकेगी।

विश्व के प्रायः समस्त धर्मों ने मन और इन्द्रियों को वश में रखने का उपदेश दिया है, इसके बिना आत्म-दर्शन असम्भव है। क्योंकि इन्द्रियाँ वाह्यमुखी है और मन चंचल है, जब तक बहिर्मुखता नहीं मिटेगी, अन्तरात्मा के दर्शन कैसे संभव हो सकता है? इसी प्रकार मन के संकल्प विकल्प उप सीमित नहीं होंगे, वहाँ तक निर्विकल्प निर्विकार आत्मा का भान नहीं हो सकता। अपनी शक्ति की वास्तविकता नहीं जानने के कारण ही हमने कर्मों को बलवान मान रखा है। हम प्रायः कहते रहते हैं क्या करें? कर्म सता रहें है अमुक शुभ काम करना चाहते हैं, पर कर नहीं पाते, अमुक अशुभ करना नहीं चाहते, पर करना पड़ रहा है, पर वास्तव में कर्म तो हमारे ही निर्मित हैं। हम जो कुछ मन, वचन, काया द्वारा प्रवृत्ति करते हैं उनकी शुभाशुमता पर कर्म में फलदायक शक्ति आती है। हम चाहें तो अपनी प्रवृत्तियों की दशा बदल सकते हैं, पूर्व कृत कर्मों को शुभ व शुद्धानुष्ठान द्वारा बदल सकते हैं, उनकी स्थिति बस में कमी कर सकते हैं यावत् उनको क्षीण भी कर सकते हैं। जो हमारे हाथ की बात हैं उसे व्यर्थ की भ्रामक धारणा वश, बेबस समझ, दुखी हो रहे हैं। कर्मों को हमने अनुचित महत्व दे रखा है।

जैनतीर्थकारों ने ईश्वर की दासता को छुड़ाने के लिए हमें कर्मवाद का सिद्धान्त बतलाया पर खेद है हमने अपनी दासता को चिर अभ्यस्त मनोवृत्ति के कारण एक ही दासता छोड़ी, तो दूसरे कर्मों की दासता स्वीकार कर ली कर्म सिद्धान्त तो हमें स्वतंत्र होने का सन्देश देता है। उसे हम ने समझने की गलती व कमी के कारण परतंत्रता का कारण और वाहन बना दिया है। अतः इस भ्रामक विचारधारा को सबसे पहले निकालना आवश्यक है। बन्द करने वाले हम स्वयं हैं तो उससे मुक्त होने की क्षमता भी हममें हर समय विद्यमान है। जब तक हमने कर्मों को अपने से अधिक शक्तिशाली मान रखा है वहीं तक हम अपने का अशक्त समझ कर्मों के आधीन मान पराश्रित बने हुये हैं। जब हम आत्मा की अनन्त शक्तियों व कर्मों की कमजोरी का अनुभव करने लगेंगे, तो हम स्वतंत्र हो जायेंगे। कर्मों में शक्ति भरने वाले हम ही हैं। हमने ही उन्हें बनाया व उन में शक्ति का आरोपण किया। जब भी हम चाहें आत्मशक्ति की स्फुरता व प्रगटन द्वारा उनको शक्ति रहित कर जो चाहें प्राप्त कर सकते हैं।

अब पाठकों के हाथ में स्वतंत्रता की चाबी आ चुकी होगी। परतन्त्रता स्वरूप की अज्ञानता और स्वशक्ति के अप्रगटन के कारण ही हैं। हमने कर्मों को उनका कारण मान रखा है। तो अब वे कर्म आते किस रास्ते से हैं? विचार कर उसके द्वार पर ताला लगा देना है। कर्मों के बन्धन के 4 कारण माने गये हैं-1.मिथ्यात्व, 2.अविरति, 3.कषाय और 4. योग। अपने स्वरूप का मान होते ही मिथ्यात्व टल जाता है। ‘पर’ पदार्थों में सुख है, इस भ्रम के दूर होते ही ‘पर’ वस्तु के संग्रह या उन पर ममत्व की दिशा पलट जाती है। उनसे मुख मोड़ा कि विरति का (विरक्ति ) भाव आया। उन ‘पर’ पदार्थों में इष्ट निष्ट की कल्पना थी, वह दूर हुई कि कषाय की मन्दता हुई। जब ममत्व नहीं रहेगा तो उसके कारण होने वाले रागद्वेष व क्रोध आदि कषाय कैसे रह सकेंगे? यानी वे उत्पन्न ही नहीं होंगे। कषाय की कमी होने के साथ योगों की प्रवृत्ति स्वयं घट जायगी। जो रहेगी वह बन्धन का कारण नहीं रहेगी। यह मार्ग ज्ञानमार्ग है। इसमें स्वरूप के ज्ञान की प्रधानता है। आगे की प्रवृत्तियाँ तो उसी पर आश्रित हैं। दूसरा मार्ग है, योग मार्ग या कर्मयोग। इसका प्रारंभ होता है, मन वचन, माया एवं इन्द्रियों को वश में करने के प्रयत्न से। पहले इन्द्रियों को अनुकूल बना उनके विषयों के विष को बेकाम बना देना होगा, जिससे काषायों का उदय कम होने लगेगा। कषायों की महत्ता के अनुरूप ही सम्यकत्व, देशविरति, सर्वविरति भाव प्रगट होगा, यह आगमिक मान्यता है। उग्र अनन्तानुबन्धी चार कषायों के क्षय उपसम या क्षययोगसम से मिथ्यात्व दूर होकर सम्यग दर्शन प्रगट होता है अतः सच्ची स्वतन्त्रता आत्मिक शक्ति यों के विकास से मिलेगी और उसके लिए विषयों एवं कषायों से दूर रहना अत्यावश्यक है। इन्द्रियों व मन (मन वचन कायत्रियोग) पर नियन्त्रण लाना होगा। अभी हम इनके वश में हैं फिर ये हमारे वश में आ जायेंगे तो हम समस्त परतन्त्रता, पराधीनता, पराश्रितता व बन्धन से मुक्त होकर स्वतन्त्र हो जायेंगे। बाहरी स्वतन्त्रता तो स्वेच्छाचार और अहंकार की ओर ले जाती है। सच्ची स्वतन्त्रता तो आत्मिक स्वतन्त्रता ही है। इन्द्रियों की गुलामी व परतन्त्रता छोड़ आत्मशक्ति की ओर बढ़ें। हमारी समस्त प्रवृत्तियाँ आत्मा की प्रेरणा से ही स्वभावानुकूल हो। हम पौद्गलिक विषय कषायों को रागद्वेष से दूर हो आत्म स्वरूप में स्थित रहें यही सच्ची स्वतन्त्रता है।

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