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Magazine - Year 1956 - Version 2

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साँस्कृतिक सेवा के लिए तपोभूमि यह करेगी

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भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए व्यक्ति गत तथा सामाजिक जीवन में सुसंस्कृत विचारधारा एवं सुव्यवस्थित कार्य प्रणाली का होना आवश्यक है। इस गतिविधि को आगे बढ़ाने के लिए ‘साँस्कृतिक सेवा-शृंखला का संगठन किया जा रहा है और यह आशा की जा रही है कि दस से सौ में सौ से हजार में, हजार से लाख में, करोड़ में, इस प्रकार घर-घर में और तन-मन में यह प्रवाह एवं प्रकाश पहुँचेगा और भारतभूमि में सर्वत्र प्राचीनकाल के समान स्वर्गीय वातावरण प्रादुर्भूत होगा।

एक दूसरा आवश्यक कार्य यह भी किया जाना है कि आज भारतीय धर्म, दर्शन, तत्वज्ञान,कर्मकाँड एवं आचार-विचार का जो रूप सामने उपस्थित है वह लम्बे अज्ञानान्धकार में गुजरने के कारण बड़ा ही विकृत,अव्यवस्थित और अनुपयोगी हो गया है। आज की स्थिति में तो वह लाभदायक एवं प्रेरणाप्रद न होकर हानिकारक एवं प्रतिगामी बन गया है। इस स्थिति में सुधार हुए बिना काम न चलेगा। हमें अपनी प्राचीन संस्कृति के वास्तविक एवं विशुद्ध रूप को सर्वसाधारण के सम्मुख उपस्थित करना होगा और बताना होगा कि यह रूढ़िवाद,प्रतिगामिता,भ्रमजाल संकीर्णता एवं सांप्रदायिकता नहीं वरन् एक अत्यन्त ही उपयोगी बुद्धिसंगत, विज्ञान सम्मत, मनोविज्ञान, नीतिशास्त्र, समाज व्यवस्था एवं मानवता की दृष्टि से वह सर्वोत्कृष्ट-प्रक्रिया हैं। तभी हम आज के बुद्धिवादी युग में भारतीय संस्कृति के महत्व को स्वीकार करने एवं उसे आचरण में लाने के लिए किसी को सहमत कर सकेंगे।

गायत्री तपोभूमि बहुत समय से इस दिशा में काम कर रही है। अब उसने पूरी तत्परता पूर्वक इस दिशा में प्रबल प्रयत्न करने का संकल्प किया है। गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति वस्तुतः साँस्कृतिक महाअभियान का मंगलाचरण, श्रीगणेश एवं शिलान्यास है। प्रातः स्मरणीय महामना मालवीय जी ने ‘हिन्दू विश्व विद्यालय’ की स्थापना के आरम्भ में उस भूमि पर 24 लक्ष का गायत्री महापुरश्चरण कराया था ताकि उस अभीष्ट उद्देश्य के सम्पादन के लिए आवश्यक दिव्य बल प्राप्त हो। साँस्कृतिक (गायत्री) और त्यागमय प्रेम (यज्ञ) का देवालय बना देना है। ऊन-जन के मन-मानस को विद्यालय,देवालय बना देने की प्रक्रिया वस्तुतः असाधारण है। उसे प्रारम्भ करते हुए दश महायज्ञों की शृंखला समेत 105 करोड़ जप, 125 लाख हवन, का आयोजन उचित ही है। 108 कुण्डों में होने वाली पूर्णाहुति किसी योजना की समाप्ति नहीं वरन् केवल मंगलाचरण की पूर्णाहुति है। वास्तविक कार्य तो सुव्यवस्थित रूप में अब आरम्भ होना है।

आगे के हमारे कुछ कार्यक्रम इस प्रकार हैं:—

(1) साँस्कृतिक शोध-कार्य

भारतीय संस्कृति मानव-जीवन को महान बनाने की एक चिर परीक्षित एवं वैज्ञानिक पद्धति है। आज समय के प्रभाव और भौतिकवाद के प्रसार के कारण उसकी भारी दुर्दशा हो रही है। प्राचीन युग की सुख-शान्ति को वापिस लाने के लिए भारतीय संस्कृति का सुसंस्कृत रूप से पुनरुत्थान करना होगा। उसके लिए निम्नलिखित कार्यक्रम सामने है—

1— भारतीय धर्म का आज जो रूप है उसमें कितना ही अंश प्राचीन मूल संस्कृति के अनुकूल और उपयोगी है और कितना ही अवाँछनीय अंश समय की विकृतियों के साथ उसमें मिला है। जिस प्रकार सोना और पीतल की मिलावट को चतुर सुनार शोध कर अलग 2 कर देता है उसी प्रकार सनातन भारतीय संस्कृति की शुद्धता और विदेशी आक्रमणों, स्वार्थी तत्वों तथा समय की विकृतियों के कारण समावेश हुई रूढ़ियों की अशुद्धता को अलग-अलग छाँट दिया जाय।

2— हिन्दू परम्पराओं के अनुसार प्रचलित रीति रिवाजों पर अनेक दृष्टिकोण से विचार किया जाय और उनकी उपयोगिता अनुपयोगिता को स्पष्ट किया जाय।

3—शास्त्रों में जो परस्पर विरोधी सिद्धान्त तथा आदर्श पाये जाते हैं उनको ऐसे सुव्यवस्थित रूप में रखा जाय कि वे एक दूसरे के विरोधी नहीं वरन् पूरक प्रतीत हों। दार्शनिक और धार्मिक मतभेदों के कारणों को बताते हुए उनका समन्वय किया जाय।

4— पौराणिक अलंकार गाथाएं जो कहीं-कहीं असम्भव और अनैतिक सी दीखती है। इन रहस्यों के—गूढार्थ को प्रकट करके जनता में फैले हुए उन भ्रमों को दूर किया जाय जिसके कारण धार्मिक अविश्वास और सन्देह बढ़ता है।

5—देवी,देवताओं के अस्तित्व,विभिन्न रूप, उनके विचित्र इतिहास ऐसे हैं जिनके रहस्यों को साधारण व्यक्ति आज समझने में असमर्थ हैं। इसलिये इन बातों को संदिग्ध समझा जाता है। विद्वानों का काम है कि देववाद का वैज्ञानिक रूप सर्व साधारण के सामने प्रस्तुत करें।

6—भारतीय पुनर्जन्मवाद, परलोकवाद, अद्वैत, द्वैत और त्रैतवाद, वर्णाश्रम धर्म, स्पर्शास्पर्श, कर्म विपाक, आदि दार्शनिक विषयों का सरल रूप से सर्व साधारण जनता के समझने योग्य रीति से उपस्थित किया जाय।

7—भारतीय आचार-विचार,रहन सहन, भाषा,भेष भाव एवं परम्पराओं की उपयोगिता एवं आवश्यकता को इस रूप में उपस्थित किया जाय कि जनता उनको अपनाना, अपने लाभ की बात समझले।

8—षोडश संस्कारों को परिष्कृत रूप में उपस्थित किया जाय! बहुत लम्बा समय और धन व्यय कराने वाले विधानों को सरल बना कर संस्कारों को ऐसे ढंग से कराया जाय कि सर्व साधारण को उनमें रुचि एवं आकर्षण हो ।

पुँसवन सीमन्त संस्कार के समय गर्भस्थ बालक के प्रति गर्भिणी के तथा गर्भिणी के प्रति घर वालों के कर्त्तव्यों का उपदेश विस्तार पूर्वक किया जाय। नाम करण के समय बालक के सुविकसित करने के लिए घर वालों को समुचित उपदेश दिया जाय। यज्ञोपवीत के समय बालक को द्विजत्व को,आदर्शमय जीवन की शिक्षा दी जाय। विवाह के समय पति-पत्नी को उनके कर्त्तव्य भली प्रकार समझाये जायं और उन कर्तव्यों के पालन की—चिन्ह पूजा के रूप में नहीं— वरन् विधिवत् प्रतिज्ञा कराई जाय। अंत्येष्टि संस्कार के समय जीवन की नश्वरता, सत्कर्मों की श्रेष्ठता आदि का विस्तृत विवेचन किया जाय। इस प्रकार प्रत्येक संस्कार कर्तव्य भावनाओं को गहराई तक मजबूत करने वाला बनाया जाय। साथ ही उन्हें इतना सरल बनाया जाय कि गरीब आदमी भी उन्हें हँसी खुशी करा सके।ऐसी सरल संस्कार पद्धति बनाई जाय जिसका उपयोग साधारण व्यक्ति भी कर सकें।

9— पर्वों और त्यौहारोँ को मनाने की ऐसी रीति बनाई जायं, जिससे हर एक त्यौहार कुछ शिक्षा तथा प्रेरणा दे सके। त्यौहारों के उत्सव सामूहिक रूप से मनाये जायं और उसमें छिपे हुए संदेशों को समझाया जाय और उनसे प्रकाश ग्रहण किया जाय।

11—साँस्कृतिक शोध कार्यों के लिए एक विशालकाय केन्द्रीय पुस्तकालय की आवश्यकता है जिसमें अभीष्ट विषयों पर पर्याप्त साहित्य विद्यमान हो। यों तो तपोभूमि के पुस्तकालय में अब भी कई हजार अच्छी पुस्तकें मौजूद हैं, पर इनमें काम चलने का नहीं। जिनके पास ऐसी पुस्तकों का संग्रह है उनसे उधार या दान में माँग कर अथवा खरीद कर इस साहित्य भण्डार को भरना है ताकि शोध कार्य में रुकावट न हो।

उपरोक्त शोध-कार्य के परिणामों को जन साधारण तक पहुँचाने के लिए निम्न कार्य किये जाएंगे

1—भारतीय संस्कृति का सुव्यवस्थित रूप में उपस्थित करने तथा उसे सर्व साधारण तक पहुँचाने के लिए एक मजबूत प्रकाशन तन्त्र की आवश्यकता है। जिससे अभीष्ट विषयों पर अनेक ग्रन्थ,ट्रैक्ट, पर्चे,पोस्टर, फोटो, चित्र, पत्र पत्रिकाएं आदि प्रकाशित हों। भारत की विभिन्न भाषाओं में उनका अनुवाद हो। केवल मथुरा का केन्द्रीय प्रकाशन ही नहीं विभिन्न स्थानों पर ऐसे मुद्रण, लेखन,प्रचार एवं विक्रय के केन्द्र भी खोले जावें।

2—स्थान-स्थान पर ऐसे स्थिर और चलते फिरते पुस्तकालय खोलने की आवश्यकता है जो साँस्कृतिक साहित्य से परिपूर्ण हों। उनके द्वारा घर 2 पुस्तकें पढ़वाने की अच्छी व्यवस्था अवश्य हो। कोई लगन वाले व्यक्ति इस कार्य के लिए थोड़ा समय नियमित रूप से देते रहने का व्रत लें, तभी ऐसे पुस्तकालय चल सकते हैं। पुस्तकालय खुलवाने और उन्हें प्रेरणा देने के लिए संगठित और व्यवस्थित रूप से प्रयत्न किया जाय।

3—गीता प्रेस की रामायण,गीता परीक्षा तथा ईसाइयों के बाइबिल कोर्स की तरह साँस्कृतिक शिक्षाओं का एक पाठ्यक्रम बनाया जाय,उत्तीर्ण छात्रों को प्रमाण पत्र पदक,पुरस्कार,उपहार दिये जायं। इसी शिक्षाओं के लिए समय 2 पर शिक्षण शिविरों, रात्रि विद्यालयों एवं व्यवस्थित विद्यालयों की व्यवस्था की जाय।

(2) रचनात्मक सांस्कृतिक आयोजन

साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए स्थान 2 पर अनेक संगठन बनाने तथा अनेक सम्मेलन,आयोजन करते रहने की आवश्यकता है ताकि जनसाधारण की मनोभूमि पर साँस्कृतिक छाप गहराई तक डालने में प्रगति हो। इसके लिए निम्नलिखित कार्यक्रम उपयोगी हो सकते है:—

1—साँस्कृतिक शिक्षा के लिए समय 2 पर शिक्षण शिविर किये जायं। जिनमें एक व्याख्यान माला द्वारा भारतीय संस्कृति का वास्तविक स्वरूप समझाया जाय।

2— छोटे बड़े अनेक साँस्कृतिक उत्सव बराबर होते रहें। ग्राम मुहल्लों में पर्व त्यौहारों को सामूहिक रूप से मनाया जाय तथा वर्ष में एक बार कोई बड़ा आयोजन हो। साधारण सभा सम्मेलनोँ की अपेक्षा ऐसे वृहद् यज्ञ करना आधिक प्रभावोत्पादक हो सकते हैं जिनमें साँस्कृतिक शिक्षा, धर्म प्रचार, तथा परस्पर विचार-विनिमय की समुचित व्यवस्था हो।

3—उत्तम योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए विचार शील एवं कार्य संलग्न व्यक्तियों की विशेष गोष्ठियां सामयिक योजनाओं पर विचार करने के लिए होती रहें।

4—स्थान स्थान पर साँस्कृतिक सभाओं और गोष्ठियों का संगठन किया जाय।

5—प्रदर्शनी, अभिनय, संगीत, कवि-सम्मेलन, प्रतियोगिता, चित्र पद आदि मनोरंजनों और साँस्कृतिक भावनाओं का प्रचार।

6—संगीत,कला कौशल,साहित्य,धर्म,उद्योग आदि के ऐसे विद्यालयों की स्थापना की जाय जिनमें शिक्षार्थियों की साँस्कृतिक उन्नति पर पूरा ध्यान दिया जाय।

7—ऐसे स्मारकों,केन्द्रों तथा संस्थानों का निर्माण जहाँ से साँस्कृतिक प्रेरणायें प्राप्त होती रहें।

8—महिलाओं और बच्चों के साँस्कृतिक शिक्षण के लिए विशेष आयोजन।

9—साँस्कृतिक विकास के कार्यों पर अधिक ध्यान देने एवं अधिक सुविधाएं देने के लिए सरकार को तैयार करना।

(3) साँस्कृतिक विद्यालय

भारतीय संस्कृति को घर-घर पहुँचाने,उसे सुरक्षित रखने और बढ़ाने का कार्य करने को जो लोग अपना पूरा समय तथा मन लगाते थे उन्हें पाघा, पण्डित, पुरोहित आदि नामों से पुकारा जाता था। प्राचीनकाल में यह लोग अपनी योग्यता, सेवा-बुद्धि एवं तपस्या बढ़ाने के लिए कठोर साधना और अपने सेवा क्षेत्र के यजमानों की विविध विधि साँस्कृतिक सेवा करने में संलग्न रहते थे। यजमान भी समय 2 पर श्रद्धापूर्वक दान दक्षिण देकर उनके जीवन निर्वाह की व्यवस्था करते थे। गान्धीजी प्रत्येक ग्राम में एक ‘ग्रामसेवक” द्वारा रचनात्मक कार्य किए जाने पर जोर देते थे। लगभग वैसी ही साँस्कृतिक योजना के आधार पर प्राचीनकाल में हमारे दूरदर्शी पूर्वजों ने यजमान और पुरोहित की परम पुनीत परम्परा प्रचलित की थी।

आज उस प्रथा का रूप विकृत हो गया है उसे शुद्ध करने की आवश्यकता है जहाँ संभव हों वहाँ पुराने पुरोहितों को नियत कार्य पर लगाने के लिए प्रयत्न करना है, साथ ही नई पीढ़ी के नये उपाध्याय इसी आदर्श के अनुसार तैयार करने हैं। इस प्रकार साँस्कृतिक कार्यों के लिए पूरा समय देने वाले लगभग पाँच लाख व्यक्तियों की सेना सहज ही तैयार हो सकती है। यह सेना अज्ञान, अन्धकार, कुसंस्कार, निकृष्ट जीवन असुरता एवं भौतिकवाद के शत्रुओं को परास्त करके भारतीय संस्कृति की विजय-पताका फहराने में सफलतापूर्वक समर्थ हो सकती है।

गायत्री तपोभूमि में ऐसे ही कर्मनिष्ठ उपाध्याय तैयार करने के लिए एक साँस्कृतिक विद्यालय स्थापित किया गया है उसमें शिक्षा का निम्न कार्यक्रम रखा गया है:-

उपाध्याय के परमपवित्र कर्तव्य और उनका पालन करने में शास्त्रों के आदेश।

उपाध्याय का व्यक्ति गत जीवन किन विशेषताओं से परिपूर्ण हो।

उपाध्याय के लिए आवश्यक कर्त्तव्य शिक्षा- जिसे उसको प्राप्त करना ही चाहिये।

संस्कृत भाषा की नवीन पद्धति से इतनी शिक्षा जिसके अनुसार संस्कृत भाषा में संभाषण किया जा सके और आवश्यक व्याकरण तथा साहित्य का बोध प्राप्त करके संस्कृत ग्रन्थों को समझा जा सके।

संध्या, हवन, पंचयज्ञ आदि के नित्य कर्मों की शिक्षा।

सस्वर वेद पाठ करने की पद्धति सम्बन्धी आवश्यक जानकारी तथा मन्त्र-संहिता का एक बड़ा भाग कंठस्थ करना।

दैनिक हवन, दार्शपौर्णमाश इष्टि, विष्णुयज्ञ रुद्रयज्ञ, गायत्री यज्ञ आदि विभिन्न प्रकार के छोटे-बड़े यज्ञों को शास्त्रीय शिक्षा।

नामकरण, मुँडन, यज्ञोपवीत, वेदारंभ, यज्ञोपवीत, विवाह, अन्त्येष्टि आदि षोडश संस्कारों का शास्त्रीय ज्ञान तथा उन अवसरों पर देने योग्य प्रवचनों की तैयारी।

वकृत्व कला, भाषण देने, कथा कहने आदि की रीति-नीति।

कर्तव्य-शस्त्र, धर्म-शस्त्र, जन शिक्षण के योग्य समुचित ज्ञान-जिससे प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्तव्यों को शिक्षा एवं प्रेरणा दी जा सके।

रामायण, गीता, भागवत, वेद, उपनिषद्, पुराणों के धार्मिक उपाख्यानों की कथाएं जो जनजागरण, युग-निर्माण एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान में भारी सहायक हो सकती हो।

आरोग्य ज्ञान, आयुर्वेद के आधार पर रोगों आधार पर निदान, नाड़ी आहारविज्ञान, आसन-व्यायाम, लाठी आदि की साधारण शिक्षा।

संगीत, कथा कीर्तन, भजन आदि के लिए आवश्यक ताल स्वर तथा गायन वाद्य की शिक्षा। जिसके आधार पर रामायण आदि की कथा बाजे पर भी कही जा सके।

लोक व्यवहार, शिष्टाचार, संसार की वर्तमान समस्याएं, समाज शास्त्र, मनोविज्ञान आदि का आवश्यक ज्ञान।

हिन्दू धर्म के अनेक व्रत, पर्व, रिवाज, दर्शन, समाज रचना आदि आधारों की बुद्धि संगत विज्ञान सम्मत, विवेचन। उनके मनाने के आधारों, लाभों तथा विधानों का समुचित ज्ञान। इस विद्यालय में साँस्कृतिक जीवन बिताने एवं इसका आचार व्यवहार भारतीय परम्परा के अनुरूप निर्मित करने की छात्र को क्रियात्मक शिक्षा भी दी जायगी।

(4) देव सम्पदा का सदुपयोग

देवपूजा कार्यों के लिए भारत में लगभग 56 लाख व्यक्ति अपना पूरा समय लगाये हुए हैं। साधु सन्त, पण्डे, पुजारी, पण्डित, पुरोहित आदि वर्ग के लोग इतनी बड़ी संख्या में देवपूजा कार्य के आधार पर अपनी जीविका चलाते हैं। देव कार्यों के बने हुए मन्दिरों, भवनों, इमारतों एवं इनसे सम्बन्धित चल अचल सम्पत्तियों का मूल्य लगभग तेईस अरब 23000000000) आँका जाता है। 56 लाख की यह विशाल जनसेना और 23 अरब रुपयों की विपुल सम्पत्ति इतनी बड़ी शक्ति है कि इससे साँस्कृतिक पुनरुत्थान तो क्या-एक विश्व युद्ध जीता जा सकता है।

यह धन जन की प्रचंड शक्ति आज निरर्थक पड़ी हैं। इतनी ही नहीं अधिकाँश तो इसका दुरुपयोग होता है। चंद व्यक्तियों की स्वार्थ सिद्धि के अतिरिक्त वह उद्देश्यपूर्ण नहीं होता जो इस शक्ति के द्वारा होना चाहिए। देवतत्वों को जन-मानस में स्थापित करके ही वस्तुतः इस देव-सेना का परम्परागत उद्देश्य है जो वस्तु जिस कार्य के लिए है, जो व्यक्ति जिस कार्य के लिए जनता से आजीविका प्राप्त करते है- उस उद्देश्य के लिए सर्वथा भुला न दिया जाय इसके लिए कुछ प्रयत्न किया जाना आवश्यक है।

मन्दिरों देवालयों को सांस्कृतिक तत्व ज्ञान एवं आयोजनों का केन्द्र बनाने और दान-दक्षिण से जीविका चलाने वालों को साँस्कृतिक सेवा करने के लिए तैयार करने के लिए भारी प्रयत्न करने की आवश्यकता है। दान देने वालों, देव सम्पत्ति के स्वामी एवं संरक्षकों से भी उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुछ करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। दान देने वाले और दान लेने दोनों को ही उनकी जिम्मेदारी बताने और उसे पूरा करने के लिए कुछ करने की प्रेरणा दी जानी चाहिए।

(5) गायत्री माता की उपासना

गायत्री महामंत्र को चारों वेदों तथा भारतीय संस्कृति का उद्गम कहा गया है। उसके 24 अक्षरों में इतनी महत्वपूर्ण शिक्षाएं भरी हैं कि उन्हें समस्त ग्रन्थों का सार एवं संसार का सब से छोटा किन्तु सबसे सार गर्भित धर्मशास्त्र कह सकते हैं। गायत्री उपासना अन्य समस्त उपासनाओं की अपेक्षा अधिक सरल, स्वल्प-श्रमसाध्य एवं अत्यधिक फलदायिनी है। प्राचीनकाल में ऋषि−मुनि इसी महामन्त्र के आधार पर तपस्याएं करके परम सिद्धि प्राप्त करते थे। सर्व साधारण के लिए गायत्री को एक आवश्यक नित्यकर्म माना गया है। गायत्री को एक आवश्यक नित्यकर्म माना गया है। गायत्री हीन की कटुशब्दों में शास्त्रकारों ने भर्त्सना की है। अध्यात्मिक उन्नति ओर साँसारिक कठिनाइयों को सरल बनाने में सद्बुद्धि का यह महामन्त्र एक अत्यन्त महत्वपूर्ण माध्यम माना गया है।

भारतीय धर्म की सर्वोत्कृष्ट ईश्वर उपासना-गायत्री का महत्व समझाने, किसी न किसी रूप में प्रतिदिन गायत्री उपासना, करने गायत्री की शिक्षाओं के आधार पर अपने विचारों एवं कार्यों को बनाने के लिए व्यापक प्रचार किया जाय और मुसलमानों के ‘कलमे’ की तरह आध्यात्मिक प्रकाश के रूप में प्रतिष्ठित कराया जाय।

कुछ अधिकारी साधक गायत्री की विशेष उपासनाएं करके उन शक्ति यों की खोज करें जो प्राचीन काल में हमारे पूर्वजों को इस महामंत्र की साधना से प्राप्त होती थी।

सामूहिक गायत्री उपासना, सामूहिक गायत्री यज्ञ अनुष्ठान आदि के आयोजनों की व्यवस्था करके जनमानस में गायत्री उपासना के लिए उत्साह पैदा किया जाय। तथा बताया जाय कि सद्बुद्धि की स्थापना के लिए बौद्धिक क्रान्ति-मानवता की पूजा एवं नारी की पद-दलित महानता का समुचित उत्कर्ष करने का आन्दोलन भी गायत्री आन्दोलन में सन्निहित हैं।

(6) यज्ञ पिता की आराधना

यज्ञ भारतीय सूक्ष्म विज्ञान का प्रधान आधार है। उसमें आत्मोन्नति, स्वर्ग, मुक्ति आदि परमार्थिक लक्षों की प्राप्ति, बलवृद्धि, रोग निवारण, श्री समृद्धि, सुसन्तति, अभीष्ट वर्षा, कुसंस्कारों की निवृत्ति, दिव्य अस्त्र-शस्त्र, व्यापक वातावरण में परिवर्तन, सूक्ष्म जगत् पर अधिकार, आपत्तियों का निवारण एवं सुख-शान्ति वृद्धि की अपार संभावनाएं सन्निहित हैं, आज यह यज्ञ विद्या लुप्त प्रायः हो रही है। संसार में विभिन्न प्रकार की वैज्ञानिक शोधें को रही हैं। हमें भी पूर्वजों के इस महान् रत्न भंडार यज्ञ की शोध के लिये कुछ करना ही चाहिये। गायत्री-तपोभूमि द्वारा यज्ञ विद्या का तात्विक अन्वेषण करने के लिये यह बारह सूत्री कार्यक्रम चलाया जा रहा है-

अनेक यज्ञ विधानों की पद्धतियों को व्यवस्थित करना।

प्रयोग करके यज्ञ के लाभों को प्रत्यक्ष करने की स्थिति तक पहुँचाना।

यज्ञ सामग्रियों की कृषि कराके उपयुक्त गुण वाली वनस्पतियाँ उत्पन्न करना।

यज्ञों के सभी अभीष्ट यन्त्र एवं उपकरण जुटाना।

यज्ञ सम्बन्धी विस्तृत साहित्य का एक विशद् पुस्तकालय स्थापित करना, जिससे इस विषय की ‘रिसर्च’ में सहायता मिले।

यज्ञ विद्याओं के ज्ञाताओं का सम्मेलन बुलाते रहना तथा उनके परस्पर विचार विनिमय की व्यवस्था करना।

यज्ञ चिकित्सालय खोलकर रोग निवारण के सर्वोच्च उपाय खोजना।

केन्द्रीय प्रयोगशाला में नाना प्रकार के यज्ञ सम्बन्धी अनुसंधान करके उनके परिणाम दूसरों को बताना।

ऐसे अन्वेषकों की निर्वाह व्यवस्था करना, जो यज्ञ विद्या की शोध के लिये अपना जीवन खपाना चाहें।

यज्ञ विद्या का एक सुव्यवस्थित विद्यालय स्थापित करना।

आचार्य विनोबा की भूदान यात्रा की तरह यज्ञ प्रचार की टोलियाँ देश व्यापी भ्रमण करके जनता को यज्ञ का महत्व बतावें, यज्ञ आयोजन करें तथा यज्ञ सम्मेलनों में साँस्कृतिक धर्म-शिक्षा का प्रचार करें।

यज्ञ में सन्निहित त्याग भावना को जनसाधारण के हृदयों में स्थापित कराके उनका मानसिक स्तर ऊँचा उठाना।

यह कार्यक्रम अभी साधनों के अभाव में तपोभूमि द्वारा अव्यवस्थित रूप से चल रहा है, परन्तु आशा की जाती है कि प्रभु साधन जुटायेंगे और इस अन्वेषण कार्य का महत्वपूर्ण परिणाम होगा।

अगले वर्ष देश भर में 108 बड़े गायत्री यज्ञ कराने का विचार है जिसमें मानव मात्र के मन में सद्बुद्धि एवं त्यागमय प्रेम की भावनाएं उत्पन्न हों, तथा आज जो बुराइयाँ तथा विकृतियाँ संसार के सूक्ष्म वातावरण में व्याप्त हो गई हैं, उनकी शान्ति हो कम से कम 24 हजार और अधिक से अधिक सवालक्ष गायत्री मन्त्रों की आहुतियों के यह यज्ञ होंगे। इनमें सम्मिलित होने वालों की अन्तः शुद्धि होने के महान् लाभ के अतिरिक्त उसके साथ-साथ होने वाले साँस्कृतिक प्रचार आयोजन का भी कार्यक्रम रहेगा। इस प्रकार यह अध्यात्मिक प्रचंड प्रयोग एवं धर्म सम्मेलनों का सम्मिलित कार्यक्रम संसार के विक्षुब्ध वातावरण को शान्त करने और भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान में भारी सहायक सिद्ध होंगे।

इन दिनों भारी दक्षिण माँगने वाले पंडितों ने तथा अन्य आडंबरों ने यज्ञों को बड़ा दुर्लभ, कष्ट साध्य और महंगा बना दिया है। हमारा विचार इन कठिनाइयों को सरल बनाकर यज्ञ आयोजन को सर्वत्र- सुगम बनाने का है। इसके लिए यह मार्ग उचित है-

(1) यज्ञों की शास्त्रोक्त विधियों को थोड़े समय में सिखाने के लिए गायत्री तपोभूमि में व्यवस्था रहेगी। जिससे लोग यहाँ आकर सब विधान जान सकें और खुद ही मिलजुलकर यज्ञ व्यवस्था कर सकें।

(2) जहाँ शुद्ध हवन सामग्री बनाने या मँगाने की व्यवहारिक या आर्थिक कठिनाई हो वहाँ “चरु हवन” किये जायं खीर, मोहनभोग, तिल जौ चावल आदि हतिष्यान्न एवं उसी क्षेत्र में पैदा होने वाली सुविधापूर्वक प्राप्त होने वाली जड़ी बूटियों से ही हवन कराये जायं।

(3) यज्ञ के नाम पर बहुधा लोग बहुत धन संग्रह करके खा जाते हैं। इसलिए आवश्यक कार्य के लिए अनिवार्य रुपयों के अतिरिक्त सर्व साधारण से हवन में काम आने वाली वस्तुएं ही प्रधानतया इकट्ठी की जायं। सभी घरों से थोड़ी-थोड़ी हवनीय वस्तुएं संग्रह करके तथा सभी का श्रम सहयोग लेकर हवन को सामूहिक आत्मकल्याण का माध्यम बनाया जाय। इस माध्यम से सामाजिकता एवं सहकारिता की भावना पैदा की जाय।

(7) साँस्कृतिक शिक्षण शिविर

उपरोक्त कार्यक्रमों में जिन्हें अभिरुचि है, उनकी समुचित शिक्षा के लिए तपोभूमि में स्थायी विद्यालय है। पर ऐसे लोग जो कार्यव्यस्त हैं, अधिक लम्बा समय शिक्षा के लिए नहीं दे सकते किन्तु आत्म-कल्याण तथा लोक सेवा के लिए आवश्यक ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं उनके लिए लगभग दो मास के शिक्षण शिविर लगाये जायं। अभी ऐसे शिविरों की व्यवस्था मथुरा में ही की जा रही है, आगे सुविधानुसार स्थान-स्थान पर उनकी व्यवस्था की जायगी ताकि समीपवर्ती शिक्षार्थी सुविधापूर्वक वह लाभ उठा सकें।

चैत्र सुदी 15 को महायज्ञ की पूर्णाहुति होते ही पहला साँस्कृतिक शिक्षण शिविर तपोभूमि में आरंभ हो जायगा, यह ज्येष्ठ सुदी 10 गायत्री जयन्ती तक 55 दिन में समाप्त होगा। इसमें साँस्कृतिक पुनरुत्थान से सम्बन्धित प्रायः सभी विषयों की शिक्षा दी जायेगी। साँस्कृतिक विद्यालय में जो पाठ्यक्रम एक वर्ष में पूरा कराया जाता है इसका सामान्य ज्ञान इन थोड़े दिनों में कराने का प्रयत्न किया जायेगा।

इस शिविर में जो शिक्षाएं दी जायेंगी उनकी रूप रेखा इस प्रकार है:-

सैद्धान्तिक:-(1) भारतीय संस्कृति का तत्त्वज्ञान,(2) साँस्कृतिक आधार पर व्यक्ति गत तथा सामूहिक जीवन में सुख-शान्ति की संभावना, (3) नीति और सदाचार की उपयोगिता एवं आवश्यकता (4)जीवन को सुखी, संतुष्ट सम्पन्न एवं समुन्नत बनाने का मार्ग (5) कर्तव्य और उत्तरदायित्व समझना (6)ईश्वर और धर्म का जीवन में उचित स्थान, (7) प्राचीनता और आधुनिकता का समन्वय (8) धर्म-ग्रन्थों को समझने का सही दृष्टिकोण (9) साम्प्रदायिकता और धार्मिकता का अन्तर (10) विचार और कार्यों के सही या गलत होने की कसौटी।

साँस्कृतिक-(1) भारतीय संस्कृति का स्वरूप (2) व्रत, पर्व और त्यौहारों में सामूहिक चरित्र-निर्माण की शिक्षा (3) षोडश संस्कारों का आवश्यकता और विधि व्यवस्था (3) शिखा यज्ञोपवीत, तिलक, रीति-रिवाज, प्रथा परम्परा आदि के पीछे छिपे हुए रहस्य, (4) देवताओं के स्वरूप, देव पूजा का विज्ञान, देव उपासना से लाभ, (5) तीर्थों एवं देवालयों का वास्तविक रहस्य, (6) वर्णाश्रम-धर्म और आज की स्थिति का समन्वय (7) भाषा, भेष, भाव की एकता का महत्व (8) भारतीय शिष्टाचार और सदाचार(9) युग धर्म की आवश्यकता (10) जीवन का लक्ष पूर्ण करने वाली दार्शनिक दृष्टि।

व्यवहारिक-(1)ईश्वर की भावना पूर्ण प्रार्थना उपासना (2) शिक्षा प्रद वेद मन्त्रों को कंठस्थ करना (3) अनेक प्रकार के यज्ञों का विज्ञान और विधान (4)सोलह संस्कारों की शिक्षायें तथा कराने की सरल पद्धतियाँ (5) भाषण देने एवं कथा कहने का अभ्यास (6) कथा कीर्तन तथा शिक्षा प्रद भजनों के योग्य आवश्यक ताल स्वर, तथा गायन वाद्य की संगीत शिक्षा (7) गीता,रामायण,भागवत् सत्यनारायण आदि धर्म ग्रन्थों की अत्यन्त हृदय ग्राही तथा शिक्षाप्रद कथा कहने की नवीन पद्धति (8) आरोग्य शास्त्र का अपनी स्वस्थता एवं दूसरों की सेवा के योग्य ज्ञान (9) श्रम शीलता शिष्टाचार, दिनचर्या एवं कर्तव्य परायण की व्यवहारिक शिक्षा (10) शिक्षार्थी के व्यक्ति गत जीवन की समस्याओं पर आवश्यक सलाह।

शिविर में सैद्धान्तिक, साँस्कृतिक एवं व्यवहारिक तीनों ही प्रकार की शिक्षाएं अधिकारी विद्वानों द्वारा दी जावेंगी। यह शिक्षायें निश्चित रूप से शिक्षार्थी के जीवन को ऊँचा उठाने वाली सिद्ध होंगी जो छात्र उन शिक्षाओं को प्राप्त करना चाहें वे अपना पूर्ण परिचय लिखकर पूर्व स्वीकृति प्राप्त करलें और पूर्णाहुति के समय दो महीने ठहरने की तैयारी करके आवश्यक वस्त्र, बिस्तर आदि लेकर आवें। साधारणतः छात्रों को भोजन व्यय जो लगभग 15 मासिक पड़ता है अपना खर्च स्वयं ही करना चाहिये। जो इसमें असमर्थ हों, उनको भोजन की व्यवस्था ‘अखंड ज्योति कार्यालय में आचार्य जी के चौके में हो जायगी। तपोभूमि में इस वर्ष लगातार कई ऐसे शिविर करने का विचार है।

इस आयोजन को सफल बनाने के लिये सभी के विशेषतया आपके सहयोग की भारी आवश्यकता है और वह सहयोग इस प्रकार हो सकता है:-

1.उपरोक्त योजना को ध्यान पूर्वक दो तीन बार पढ़िये और अपनी सलाह दीजिए कि उसमें कहाँ-कहाँ त्रुटि है और क्या आवश्यक बातें इसमें छूट गई हैं?

2.इन कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए क्या तैयारी करनी चाहिए और किस प्रकार इस योजना को व्यापक बनाया जाना सम्भव है, यह बताइये।

3.अपने बारे में सोचिए कि आप इस योजना के बताये हुये कार्यों में से क्या-क्या कर सकते हैं?

4.अपने को व्रतधारी या कर्मयोगी श्रेणी में रखकर आत्म निर्माण एवं समीप वर्ती क्षेत्रों में कुछ कार्य कर सकना क्या आपके लिए शक्य है? यदि है तो साँस्कृतिक सेवा शृंखला में संबद्ध होने में जो अड़चन है उसे हल कीजिये।

5.आपके समीपवर्ती क्षेत्र में जो प्रतिभा-शाली चरित्रवान एवं लोक सेवा की भावन वाले व्यक्ति हों, उन्हें नरमेध में सम्मिलित होकर धर्म सेवा का कार्य करने में लग जाने के लिए प्रेरणा कीजिये।

6. साँस्कृतिक शिक्षण शिविर में शिक्षा प्राप्त करने आना आपके लिए शक्य न हो तो दूसरों को भिजवाइए जो आपके क्षेत्र में इस कार्य को आगे बढ़ा सकें। समीपवर्ती पण्डितों, पुरोहितों एवं उनके बालकों को इस शिक्षा के लिए भिजवाने का विशेष प्रयत्न कीजिए।

7. पूर्णाहुति के समय मथुरा आने का प्रयत्न कीजिये और इस महान् आयोजन को सफल बनाने में परामर्श एवं विचार विनिमय का अवसर दीजिये।

8. इन कार्यों में अभिरुचि रखने वाले उस क्षेत्र के सत्पुरुषों को यह योजना दिखाइए, और इसके लिए उनका सहयोग, परामर्श पथ प्रदर्शन एवं आदर्शवाद माँगिए।

9.अपने क्षेत्र के धार्मिक व्यक्तियों का एक संग- बनाइये और अगले वर्ष एक बड़ा यज्ञ करके सत्पुरुषों का इकट्ठा कीजिये और इन साँस्कृतिक कार्यों के उस क्षेत्र में फैलाने की योजन बनाइये।

10. तपोभूमि में तपस्वियों का शरीर निर्वाह, प्रचार, पत्र व्यवहार, दैनिक यज्ञ, विद्यालय योजना सञ्चालन आदि का खर्च दिन-दिन बढ़ने की सम्भावना है आय का कोई स्थायित्व नहीं, इन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर यदि कुछ आर्थिक सहयोग सम्भव हो तो वह कीजिये।

भारत की अन्तरात्मा जाग रही है। हमारा साँस्कृतिक पुनरुत्थान होना सुनिश्चित है, आइए कुछ करने के लिये आगे बढ़े। प्रभु प्रेरणा से सम्पन्न हो रहे एक महान् कार्य के भागीदार बनाने का श्रेष्ठ प्राप्त करना हमारे लिये दूर दर्शिता एवं बुद्धिमता की ही बात होगी।

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