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Magazine - Year 1956 - Version 2

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सच्चा मार्ग तो कर्मयोग ही है

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(श्री स्वामी शिवानन्दजी सरस्वती)

सत्यता एवं श्रद्धा से सम्पन्न साधन ही दैवी साक्षात्कार का प्रधान साधन है। आत्म-साक्षात्कार से ही अमर शान्ति, शाश्वत-जीवन तथा चिंता, भय एवं मृत्यु से मुक्ति प्राप्ति होती है। मुक्ति की सर्वोच्च स्थिति के लिए साधना अत्यन्त आवश्यक तत्त्व है। सच्ची साधना द्वारा ही मनुष्य मुक्ति एवं ब्रह्मानन्द लाभ कर सकता है। मानव प्रकृति मल, विक्षेप, एवं आसुरी तत्त्व से युक्त है। साधना का अभिप्राय मानव की आसुरी प्रकृति का संस्कार एवं उसे दैवी प्रकाश के योग्य बनाना है। जब आन्तरिक संस्कार हो जाता है, तब आत्मज्ञान एवं ब्रह्मानन्द अन्तःकरण से स्वतः प्रकाशित होते हैं। इस आन्तरिक शुद्धि के अभाव में आत्म-साक्षात्कार के समस्त प्रयत्न उसी प्रकार निष्फल होते हैं। बिना आन्तरिक शुद्धि के यह प्रयत्न ऐसा ही है, जैसे लंगर पड़ी हुई नाव को खेने का प्रयत्न। ऐसी परिस्थिति में प्रगति असंभव है।

जगत के साधारण व्यक्तियों का हृदय स्वार्थ,ईर्ष्या, घृणा, अन्ध विश्वास एवं अभिमान के कारण अत्यन्त संकुचित रहता है। स्वार्थ एवं ईर्ष्या इत्यादि अपनी छाया उनके मन पर सदैव के लिए छोड़ देती हैं, जिनके कारण उनके तथा अन्य व्यक्तियों के मध्य एक ऐसी दीवार खड़ी हों जाती है, जो उसे अन्य व्यक्तियों से पृथक् कर देती है।

कर्मयोग का अभ्यास उस माया-मरीचिका को नष्ट करता है और उस पर्दे को तोड़ कर हृदय को विशाल करने में प्रचुर सहायता प्रदान करता है। इसके द्वारा हृदय का परिष्कार होता है। सच्चा कर्मयोगी दूसरों के प्रति निर्लेप सहानुभूति रखता है और नाना रूपों में उनकी सेवा करता है। जो कुछ उसके पास होता है, उस सभी में वह मुक्त हृदय से दूसरों को साझीदार बनाता है। वृद्ध पथिकों के लिये वह सरिता से जल लाकर देता है; रोगियों की औषधि का प्रबन्ध करता है, उनके नोन, तेत, लकड़ी का भार अपने ऊपर उठाता है। दया के इन छोटे-छोटे कार्यों से उसका हृदय कोमल हो जाता है। उसका सम्पूर्ण जीवन दया से ओत-प्रोत हो उठता है। उनके अतिरिक्त उसके चरित्र में सद्विद्या के लिए आवश्यक गुणों-जैसे सहिष्णुता, धैर्य, विनय इत्यादि का विकास होता है। वह अनिवर्चनीय आनन्द एवं आत्मिक बल का अनुभव करता है। प्राणिमात्र के हृदयों को एक सूत्र में आबद्ध करने वाली प्रेम-भावना उसके हृदय में दृढ़ हो जाती है। सभी उसे प्रेम की दृष्टि से देखते हैं। वह जिन-जिन की सेवा करता है, वे मुक्त कंठ से उसे आशीर्वाद देते हैं। वह उनके सद्संकल्पों एवं आशीर्वादों के फलस्वरूप दीर्घ-जीवन के आनंद लूटता है।

कर्मयोग, वेदान्त अथवा भक्ति योग से अधिक कठिन है। यह यंत्रवत् कार्य करना नहीं है। साधक को कर्मरत होते हुए वेदान्त भाव अथवा भक्ति भाव सम्मुख रखना चाहिये।

कर्मयोगी निरन्तर ब्रह्म की सेवा करता है, संसार के व्यक्तियों में वह ब्रह्म-स्वरूप देखता है और उसी भाव से निःस्वार्थ सेवा के कारण उसे प्रभु का विराट दर्शन लाभ होता है। कर्मयोगी को कभी आवश्यकतायें नहीं सतातीं। वह जब कभी किसी नये प्रदेश में जाता है तो उसे शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के निमित्त यथेष्ट सामग्री उपलब्ध हो जाती है। अनेक व्यक्ति उसे भोजन ग्रहण कराने के लिए आमन्त्रित करते हैं। उसके मुख-मण्डल से एक ऐसा तेज प्रकाशित हुआ करता है जिसके फल-स्वरूप सभी लोग उसकी सेवा करने को प्रस्तुत रहते हैं। सम्पूर्ण प्रकृति उसकी सेवा करने को तैयार रही है। हर प्रकार के दैवी ऐश्वर्य उसके पास रहते हैं।

उसके विषय में कोई भी यह नहीं कह सकता कि उसके दैनिक कर्त्तव्य उसका सम्पूर्ण समय नष्ट कर देते हैं और उसे साधन के लिए यथेष्ट अवकाश प्राप्त नहीं होता। सत्य भाव से प्रेरित होने के कारण उसका प्रत्येक कार्य पूजा जैसा फल देने वाला होता है। उनका जीवन ही साधना एवं अनुभव है।

आन्तरिक भावना तथा शुद्ध मानसिक संतुलन के करण कर्मयोगी का प्रत्येक कार्य आध्यात्मिक हो जाता है। ‘आत्मभाव’ एक शक्ति शाली परिवर्तनकारी शक्ति है। यह, वह दैवी शक्ति है, जिसके द्वारा साँसारिक वस्तुएं दैवी छटा से परिपूरित हो उठती है और मानवता देवत्व में परिणत हो जाती है। पतिव्रता अनुसूया विशुद्ध आत्म-भाव द्वारा ब्रह्मा, विष्णु, एवं महेश की सम्मिलित शक्ति यों पर विजय प्राप्त कर सकती थी और उन्हें नन्हें-नन्हें शिशुओं में परिणत कर सकती थी। इस प्रकार अनुसूया अपने आतिथ्य धर्म का पालन कर पाई थी और अपने पातिव्रत को अटल रख सकी थी। इस प्रकार कर्मयोगी भी, अपने आत्म-भाव के विकास द्वारा स्वधर्म का पालन करता है। उस पर वाह्य हलचलों का प्रभाव नहीं पड़ता प्रत्युत वह आध्यात्मिकता की निरन्तर वृद्धि करता है तथा आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करता है।

उपनिषदों के तत्व उसे बिना श्रुतियों के अध्ययन के ही केवल हृदय की पवित्रता एवं परमात्मा के आशीर्वाद के कारण ही हृदयंगम हो जाते हैं। बिना मनन तथा निदिध्यासन के ही उसे आत्मा का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। वह भक्तों की ऊँची श्रेणी में गिना जाता है और दैवी सम्पदाओं का आनन्द प्राप्त करता है।

“आत्मा का ज्ञान न वेदों के अध्ययन से, न बुद्धि की तीव्रता से, न केवल श्रवण मात्र से ही प्राप्त हो सकता है। जिसका आत्मा स्वयं वरण करती है; केवल उसी के द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। उसी को आत्मा अपना सच्चा स्वरूप दिखलाती है।”

कठोपनिषद् 1-2-23

‘हे अर्जुन! ऊपर कहे हुए संन्यास और निष्कर्म योग को मूर्ख लोग अलग-अलग फल वाले कहते हैं, न कि पण्डितजन, क्योंकि दोनों में से एक में भी अच्छी तरह स्थित हुआ पुरुष दोनों के फलस्वरूप परमात्मा को प्राप्त होता है।”

गीता अध्याय 5 श्लोक 4

“ज्ञान योगियों द्वारा जो परम धाम प्राप्त किया जाता है, निष्काम कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञान योग तथा निष्काम कर्मयोग को फलस्वरूप से एक देखता है वह ही यथार्थ देखता है।”

—गीता अध्याय 5 श्लोक 5

करोड़ों जन्म-जन्मान्तरों में भी, उस शुष्क हृदय वेदाँती के लिए मुक्ति की आशा नहीं, जो बिना कर्मयोग द्वारा आँतरिक शुद्धि के ही केवल उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र या वेदाँत के अभ्यास द्वारा मुक्ति प्राप्त करना चाहता है। वह उस मेढ़क की भाँति है, जो बरसात में व्यर्थ प्रलाप किया करते हैं। मेढ़क तो मनुष्य को केवल बरसात में ही परेशान करते हैं किंतु वेदान्ती मेढ़क , जो बिना हृदय की शुद्धि के एक किताबी कीड़ा होता है, व्यर्थ की दलीलों झगड़ों तथा कुतर्क द्वारा सारे संसार की शान्ति भंग करता है। सच्चा वेदान्ती दुनिया के लिए वरदान सदृश है। वह मौन भाषा में हृदय की विशुद्ध भावनाओं द्वारा उपदेश देता है। उसकी सेवायें “आत्म-भाव” से अनुप्राणित होती हैं।

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