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Magazine - Year 1956 - Version 2

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हमें स्वतन्त्र चिन्तन करना चाहिए

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(श्री आनन्दजी टीकापट्टी)

जिज्ञासा, किसी दृष्टि या विचार में आये तत्वों को ठीक-ठीक जानने की इच्छा करना मानव का नैसर्गिक स्वभाव है। यह स्वभाव है। यह स्वभाव जिनमें नहीं, वह मनुष्य, मनुष्य ही क्या? दूसरों के सोचे, बताये एवं बनाये पथ पर बिना समझे बूझे ही चलने लगना—बहुताँश में पशु वृत्ति की देन ही समझिये। जिज्ञासा की स्वरूपता ही मानव-जीवन के भविष्य की प्रधान संकेतिका है।

साधारण मनुष्य, संसार के विषयों को जानने की इच्छा करते हैं, वही सोचते हैं, वैसा ही चिन्तन करते हैं, फलतः उसका उन्हें ज्ञान होता है और उस ज्ञान के अनुसार आचरण कर सुखी या दुःखी बनते हैं—वैसा बनते हैं।

जिस भाँति आलसी, काहिल और विलासी वृत्ति के लोग अपने शरीर से पुरुषार्थ नहीं करना चाहते हैं-उससे कतराते हैं, उसी भाँति अधिकाँश लोग मन और विचार के जगत में सदा परोपजीवी स्वभाव के होते हैं। वे चाहते हैं कि दूसरे हमें चिन्तन और मनन करके विचार-दिशा प्रदान करें और मैं चुपचाप हाकें जाने वाले पशु की भाँति केवल उस पथ का अनुसरण करता चलूँ। उस पथ के अच्छे और बुरे होने का उत्तरदायित्व मेरे ऊपर नहीं हो, कोई इसे बुरा होने का दोष मेरे शिर नहीं डाल सके, पर ऐसा करते समय उसे यह पता नहीं होता, कि आखिर अनेकों पथों में से इसी राह को अपने चलने के लिए चयन कर लेने में तो उसी का ही एकमात्र उत्तरदायित्व हो जाता है। इसीलिए वे सभी भाँति अपने को निर्दोष सिद्ध करने में सफल नहीं हो सकते। फिर भी ऐसों जनों का मानसिक और बौद्धिक आलस्य दूर नहीं हो पाता। ऐसे मनुष्यों की, उन भेड़ों से बहुत कुछ समता की जा सकती है, जो एक भेड़ के पीछे चलने की वृत्ति रख कर कुएँ में भी गिर सकती हैं। इस वृत्ति के मनुष्यों का व्यक्ति त्व कभी निखर नहीं सकता। वह अपने जीवन में महान् कार्य करने के लिये प्रायः अपने जीवन में महान् कार्य करने के लिये प्रायः अयोग्य ही सिद्ध होते हैं।

अध्ययन तो अनेकों व्यक्ति करते हैं, पर सभी विद्वान नहीं हो पाते, इसका कारण क्या है? कितने व्यक्ति हजारों के हजारों पुस्तक पढ़ डालते हैं, कितनी रट भी लेते हैं, फिर भी यदि उनका अपना कुछ निश्चित विचार नहीं है, स्वतन्त्र चिन्तन नहीं है तो वह उतना बड़ा विशाल पठन-अध्ययन भी उसके व्यक्ति त्व का, उसकी सत्ता के महत्व को स्थापित करने में असमर्थ ही रहता है, जब कि एक स्वतन्त्र चिंतन और मननशील व्यक्ति अपने थोड़े से अध्ययन के सहाप्य से भी समाज और राष्ट्र में अपना एक विशिष्ट व्यक्तित्व निर्मित कर लेते हैं।

जिस भाँति शरीर से उत्पन्न शिशुओं को मनुष्य अपना सन्तान मान कर उसे स्नेह और प्यार देते हैं, उसके जीवन को विकसित, उत्कर्ष भरा बनाने के लिए यथा सम्भव प्रयत्न करते हैं, उसी भाँति यदि हम अपने स्वतन्त्र विचारों को सम्मान और स्नेह दे सकें, तो वे साधारण जैसे प्रतीत होने वाले विचार ही हमारे व्यक्ति त्व को एक ऐसा विशेष रूप में गढ़ डालते हैं, जिस भाँति हम अपने सन्तान को अपना रंग—रूप प्रदान करते हैं।

ऐसा नहीं करके यदि हम केवल दूसरों के विचारों से स्मृति भण्डार को भर कर उसे सदा दूसरों का ही बनाये रखा अन्न की भाँति खा और पचा कर उसे रक्त की भाँति अपने विचार का अंग नहीं बना लिया, उसका उपयोग नहीं किया, व्यवहार में चरितार्थ नहीं किया, तो हमारे वे सारे अध्ययन, हमारे लिये केवल बाँझ ही बनते हैं, हमारी शक्ति को नष्ट ही करते, पुष्ट नहीं करते। इसीलिए यदि हमें केवल भारवाही पशु न बन कर मानव बनने की अभिलाषा है तो, जिस वस्तु की हमें जिज्ञासा हो, उसे दूसरों से सुनकर, जानकर एवं अध्ययन करके ही निश्चिन्त न हो जायं, वरन् वह ज्ञान यदि हमारे अन्तरात्मा को स्वीकार है, तो उसे अपने अंग-अंग में उतर जाने दें, अपने मन, वाणी और व्यवहार को उससे ओत-प्रोत हो जाने दें। इसी का नाम स्वतंत्र चिन्तन और मनन है अन्यथा वह सत्वहीन है—कागज का फूल मात्र है।

जिस भाँति माँ का दूध पीकर, शस्य श्यामला भूमि का अन्न खाकर-जल पीकर, प्रकृति देवी से अन्य खाद्य ग्रहण कर हमारे शरीर परिपुष्ट हो होते और बढ़ते हैं, उसी भाँति प्रत्येक व्यक्ति के मूल गत विचारों की भी दशा है। वह अपने परिपोषण के लिये सभी दिशाओं से पोषकतत्व ग्रहण कर बढ़ता जाता है, पर उन तत्वों में ही अपने को खो नहीं देता। जिसने अपने को उसी में खोया, वह फिर कोई वृक्ष या व्यक्ति नहीं बनता वरन् स्वयं भी खाद्य-खाद बन जाता है और उसे चूसकर-अनुयायी बना कर दूसरे बढ़ते और विकास करते हैं।

अपने विचारों को निश्चित और विशिष्ट स्वरूप देने के लिये उसे वाणी और लेखन के द्वारा प्रगट करते रहना चाहिये। पुनः अभिव्यक्ति वाणी और लेखन का अनुशीलन कर उसे परिमार्जित और परिष्कृत बनाते जाना चाहिए। ऐसा अभ्यास करते-2 यह विचार हमारे आचरण में संक्रमित होने लगते हैं और एक दिन हम स्वयं उस विचार के मूर्त्तिमान स्वरूप बन जाते हैं। यह है सही शुद्ध, चिन्तन-मनन का परिणाम।

यह सृष्टि विविधात्मक रूप में ही अनन्त है। इसीलिए यहाँ की कोई भी रचना, सृष्टि, रूप और आकृति सम्पूर्णतया एक जैसी नहीं होती। इसलिए व्यक्ति त्व निर्माण करने के पहले हमें स्वयं अपना ही चिन्तन और मनन करना चाहिये। हम कैसा बनना चाहते हैं, यह भी गम्भीर चिन्तन और मनन के फल स्वरूप अपने अन्तर से ही उत्पन्न होता है, दूसरा इसे नहीं दे सकता। हाँ सद्गुरु इस चेतना को निर्मल और ग्रहण शक्ति सम्पन्न बना सकते हैं।

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