संस्कृति सौष्ठव (Kavita)
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प्रभा-प्रतिभा के पुञ्ज प्रधान, ईश के वैदिक वन्द्य विधान।
आर्य संस्कृति हे अखिल उदान, विश्व में तेरा जय जय गान॥1।।
‘प्रणव’ के नैगम नव्य निनाद, महामुनि मंगलमय मर्याद।
साधना-सुषमा के संवाद, सृष्टि के श्रेयष्कर पन्थान॥ 2 ॥
स्वऋग्-यजु-साम अथर्वाधार, ज्ञान युत कर्मों का विस्तार।
उपासन का हो प्रचुर प्रचार, बढ़े वर वेद-विटप विज्ञान ॥ 3 ॥
साँख्य, मीमाँसा, न्याय, नितान्त, योग शुभ वैशेषिक वेदान्त।
कर रहें शंकाओं को शान्त, त्रित्व का देकर प्रबल प्रमाण ॥ 4 ॥
समुज्ज्वल सूत्रों का सञ्चार, सुखद शुचि स्मृतियों का अवतार।
उपनिषद्वीणा की झंकार, सुनाती ‘श्रेय-प्रेय’ की तान ॥ 5 ॥
उदधि सम ज्ञान राशि गंभीर, हिमालय सी अविचल धीर।
गंग सम पावन तारन तीर, भर रही लोकों में कल्याण ॥ 7 ॥
दे रही शान्ति-सौख्य सन्देश, सर्ग के सभी दूर कर क्लेश।
विश्व बन्धुत्व वीरता देश—देश को देती है वरदान ॥ 7 ॥
विचरते जहाँ जीव स्वच्छन्द, न होता जगज्जन्य दुःख द्वन्द्व।
मुक्ति पथ की वीथिका बुलन्द, बताते स्वयं वेद भगवान् ॥ 8 ॥

