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Magazine - Year 1956 - Version 2

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संस्कृति सौष्ठव (Kavita)

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प्रभा-प्रतिभा के पुञ्ज प्रधान, ईश के वैदिक वन्द्य विधान। आर्य संस्कृति हे अखिल उदान, विश्व में तेरा जय जय गान॥1।।

‘प्रणव’ के नैगम नव्य निनाद, महामुनि मंगलमय मर्याद। साधना-सुषमा के संवाद, सृष्टि के श्रेयष्कर पन्थान॥ 2 ॥

स्वऋग्-यजु-साम अथर्वाधार, ज्ञान युत कर्मों का विस्तार। उपासन का हो प्रचुर प्रचार, बढ़े वर वेद-विटप विज्ञान ॥ 3 ॥

साँख्य, मीमाँसा, न्याय, नितान्त, योग शुभ वैशेषिक वेदान्त। कर रहें शंकाओं को शान्त, त्रित्व का देकर प्रबल प्रमाण ॥ 4 ॥

समुज्ज्वल सूत्रों का सञ्चार, सुखद शुचि स्मृतियों का अवतार। उपनिषद्वीणा की झंकार, सुनाती ‘श्रेय-प्रेय’ की तान ॥ 5 ॥

उदधि सम ज्ञान राशि गंभीर, हिमालय सी अविचल धीर। गंग सम पावन तारन तीर, भर रही लोकों में कल्याण ॥ 7 ॥

दे रही शान्ति-सौख्य सन्देश, सर्ग के सभी दूर कर क्लेश। विश्व बन्धुत्व वीरता देश—देश को देती है वरदान ॥ 7 ॥

विचरते जहाँ जीव स्वच्छन्द, न होता जगज्जन्य दुःख द्वन्द्व। मुक्ति पथ की वीथिका बुलन्द, बताते स्वयं वेद भगवान् ॥ 8 ॥

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