क्रोध को शत्रु से कम मत समझिए
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(श्री महात्मा प्रभु आश्रितजी महाराज)
हम सुना करते थे कि माता को, बच्चे को दूध पिलाते समय सदैव सांत्वना रहनी चाहिए और ऐसा भी सुना कि किसी माता ने क्रोध की हालत में अपने बच्चे को दूध पिलाया और बच्चा मर गया। इसी भाँति काम भाव विह्वल होकर यदि माता दूध पिलाती है, तो उसके बच्चे की आँखें दुखने लगती हैं और वह बड़ा होकर बड़ा कामुक हो जाता है-लोभ दशा में पिलाया तो वह शिशु निश्चय ही लोभी और असन्तोषी निकलेगा।
क्रोध आदि के परमाणु एक विशेष रंग लिये होते हैं और उसका विशिष्ट प्रभाव पड़ता है—यह अगले दिन हमने पढ़ा। प्रोफेसर गेट्स ने विभिन्न मानसिक अवस्थाओं में निकलने वाले श्वासों को लेकर, परीक्षण किया। श्वासों द्वारा निकली वायु को लेकर उसे हिम द्वारा शीतल की हुई नलियों में एकत्र किया तो देखा कि जब मनुष्य स्वाभाविक शान्त दशा में होता है तो उसके श्वासों का द्रव पदार्थ कोई रंग धारण नहीं करता। क्रोध दशा में इस द्रव का रंग भूरा होता है, दुःख में खाकी, और पश्चात्ताप काल में गुलाबी रंग का होता है। यह पदार्थ इतना विषैला होता है कि सुअर के बच्चे को इसकी टीका देने से वह बच्चा मर गया। घृणा और क्रोध की अवस्था में एक घण्टे में मनुष्य श्वासों से इतना विषैला द्रव्य निकलता है कि उससे बीस व्यक्ति मर सकते हैं।
इसके विपरीत आनन्द, उत्साह, प्रेम, उल्लास की अवस्था में श्वासों द्वारा जो द्रव निकलता है, वह बड़ी भारी शक्ति और आह्लाद का देने वाला होता है।
काम-क्रोध आदि के परमाणुओं से हमारा अनादिकाल का संग है। दैवी परमाणु भी सदा से हमारे साथ हैं। यह हमारे उपयोग के लिये हैं। काम न होता तो सन्तान कैसे पैदा होते, वंश-परम्परा कैसे चलती? लोभ-मोह न होते तो सन्तानों का पालन-पोषण कैसे होता? क्रोध न होता तो दुष्टों से रक्षा कैसे होती, बुराई का विध्वंस कैसे होता, इत्यादि-इत्यादि। हमने अपनी अज्ञानता के कारण उनका दुरुपयोग कर संसार में दुःखों की मात्रा बढ़ा दी। दुरुपयोग करने से तो दुःख होगा ही।
जब हम में किसी भावों की अति हो जाती हैं तो हमारे श्वासों का रंग तदनुकूल बदलकर आकाश में जाते हैं और वहाँ से वैसे परमाणु खिंच- खिंच कर हम में भरने लगते हैं। यदि हम दैवी स्वभाव वाले हैं, तो दैवी गुण वाले परमाणु ही हमारे पास आयेंगे।
हम में क्रोध की अवस्थिति होने के कारण आकाश से क्रोध के परमाणु आ-आकर हम में भरते रहते हैं, ऐसी दशा में क्रोध को बाहर से दबा देना भी सम्भव नहीं होता, यदि दबा भी देते हैं तो अन्ततः वे उग ही आते हैं। बड़े-बड़े साधक भी इसी कारण से इसे हटाने में असफल हो जाते हैं।
साधारण रूप में क्रोध को दो विचारों से दबाया जाता है। एक दबाया जाता है, इस भावना से कि धर्मात्मा-महात्मा कहलाकर यदि हम क्रोध करेंगे तो लोग हमें क्रोधी समझेंगे, कलंक लगेगा। इस भाव से दबाया हुआ क्रोध अन्ततः चमक ही उठता है। उसे छिपा के नहीं रखा जा सकता। दूसरा दबाना होता है इस भाव से कि इसके कारण हमारा आत्मिक पतन होगा। ऐसी भावना वाले क्रोध को छिपाते नहीं। वे कह देते हैं कि हम में क्रोध उत्पन्न हो गया है, हम उसे हटाने का प्रयत्न करते हैं। इस भाव से संयम करने वाला अन्त में इसे हटाने में सफल हो जाता है।
किसी व्यक्ति में जो भाव सब से अधिक स्थिर है, वही भाव अन्त में प्रगट होता है और वह मनुष्य वैसा ही बन जाता है।
जब समाज के अत्यधिक लोगों में क्रोधादि दुष्ट भावों की अतिशयता होती है तो यह सम्पूर्ण आकाश को भी ऐसे दुष्ट परमाणुओं से भरपूर कर देते हैं और यही कारण है, कि साँप, बिच्छू, मच्छड़, रोगाणु आदि विषैले कीट-पशुओं की संख्या दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। ऐसे परमाणु को घटाये बिना इसकी बाढ़ रोकी नहीं जा सकती। पवित्र और उच्च भाव की साधना ही इसके निवारण के उपाय हैं। इसलिये हमें थोड़ी देर के लिये भी अपने में दुष्ट भावना को नहीं आने देना चाहिये।
साधकों के जीवन में पश्चात्ताप की विशेष आवश्यकता है और यों तो सभी मनुष्यों को ही इसकी आवश्यकता है। पश्चात्ताप से दुष्ट परमाणुओं के रंग फीके होकर गुलाबी रंग में परिणत हो जाता है। इससे भावी कल्याण की सम्भावना उत्पन्न होती है।
भगवान सब कर्मफलों के प्रदाता है और उन्हीं के पास सारे सुखैश्वर्य्य,कल्याण और आनन्द हैं। हमारा जब तक उनसे सीधा सम्बन्ध नहीं हो जाता, तभी तक उन वस्तुओं से हम वञ्चित से होते हैं। सीधा सम्बन्ध होने पर तो फिर इन वस्तुओं की कमी, कभी होती ही नहीं। उनसे सीधा सम्बन्ध जोड़ने के लिये हमें अपने में सब से प्रथम श्रद्धा लानी चाहिये। श्रद्धा को पनपाने के लिये नम्रता चाहिये। नम्रता, श्रद्धा का मूल है। मूल को शहों तक पहुँचाने वाली सूक्ष्म डोरियाँ हुआ करती हैं, जो शहौं से जल खींचकर मूल में पहुँचाती हैं और फिर मूल उसी रस का शाखा, प्रशाखा, पल्लवों और फलों तक पहुँचा देता है, जिससे सम्पूर्ण वृक्ष हरे-भरे वैभवपूर्ण हो जाते हैं। तो आध्यात्मिक नम्रता के वे दोनों रसवाही सूक्ष्म रज्जु पवित्रता तथा उदारता है। पवित्रता तथा उदारता का मूल केन्द्र परमात्मा है। अतः जब मानव के हृदय में श्रद्धा उपजती है, तब उसकी एक तन्तु नीचे जाती है, जो नम्रता कहलाती है और एक ऊपर में सुदृढ़ तना बन कर कर्म नाम धारण करती है। श्रद्धा की नींव की ओर बढ़ने वाले तन्तु नम्रता में दो सूक्ष्मतर तन्तु दांये-बांये फूट पड़ते हैं, जो पवित्रता और उदारता का रूप धारण कर, प्रभु के केन्द्रीय उत्स से प्रेम रस पान करती हुई उसे प्रवाहित करती चलती है और मूल को रस से भर कर पुनः उसके द्वारा वृक्ष के कण-कण में पहुँचा कर उसे सुशोभित कर देती है। यदि क्रोध रूपी कुठार द्वारा ये दोनों तन्तु काट दिये जायं, तो उस वृक्ष का शुष्क होकर नष्ट हो जाना, निश्चित सा है। इसीलिये भक्तगण पवित्रता और उदारता रूपी तन्तुओं को सावधानता पूर्वक अखण्डित रखने का प्रयत्न करें। क्रोध से दूर रहें।

