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Magazine - Year 1956 - Version 2

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आत्मिक-शाँति कैसे मिले?

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हलचल और हाहाकार आत्मा का गुण नहीं है। अनन्त की ओर देखो, वह कितना शाँत है। अनंत की शाँति के गर्भ में कितनी व्यथाएँ- कितनी आहें आतीं और विलीन हो जाती हैं।

मानव-मन उस शाँति से परिचित नहीं और न हो सकता है। मन सीमित है अनंत की शाँति असीम है। सीमित वस्तुओं में असीम का समीकरण नहीं हो सकता। अनंत का अर्थ है मुक्ति , सीमित का अर्थ है प्रसन्नता। मुक्ति अथवा स्वतन्त्रता में ही शाँति है और परतन्त्रता में दुःख। मनोनाश के बिना मुक्त वस्था प्राप्त करना असंभव है।

निशीथ की शाँति, ज्योत्स्ना की शाँति,ऊषा की शाँतिमयी काँत, सागर का शाँत हृदय, झीलों की शाँत मुखड़े, फूलों का शाँत मुसकान, प्रकृति का शाँतिमय हास, सौरभ का शाँतिमय सुवास, नदियों का कल-कल, झरनों का झरझर, समीरों का सन-सन,पक्षियों के कलरव, कोयलों की कूक, गगन की नीलिमा, हिमाच्छादित भूथरों की गंभीर एवं शाँत आकृतियाँ हम देखते हैं। फिर भी हम उस विचित्र गान के रव में अपना आत्मिक रव संबंधित नहीं करते। शाँति के गीत, आत्मा के गान एवं फूलों की मुसकान एक हैं। सबों में एक ही संगीत व्याप्त है। सबों से होकर एक ही शक्ति काम कर रही है। वही ध्वनि ब्रह्म है वही वैज्ञानिकों का स्पन्द जगत है, वही आदि शक्ति माया की क्रीड़ा है, वही आत्मा का अनहत्रव है। वही ओऽम है। उसी से सारी दुनिया की उत्पत्ति हुई है। उसमें सारी दुनिया लय प्राप्त करती है। वही एकमेव सत्य है।

अन्तर की शाँति ही वास्तविक शाँति है समुद्र के ऊपर तूफान उठते हैं, जहाज उलटते हैं, प्रलय का दृश्य उपस्थित होता है, पर उसका हृदय शाँत है। आकाश में घन-घोष होता है। काल मेघों का दृश्य दृष्टिगत होता है, परन्तु अनन्त आकाश की अन्तरात्मा सदा अविचलित तथा दृढ़ रहती है। मानवी स्थिति आत्मिक स्थिति नहीं। वह समुद्र में लहरों के समान और आकाश में बादलों के समान प्रगट होती है। वह असत्य है। उसके साथ अहंता एवं संगदोष के कारण ही सारी अशाँति का जन्म होता है। आत्मा ही सदा सत्य है। आत्मिक स्थिति ही हमारी वास्तविक स्थिति है।

आत्मिक शाँति प्राप्त करो तुम्हारे पास दुनिया की सारी शक्ति चली आवेगी। तुम्हारी इच्छा के अनुकूल पृथ्वी चलेगी और सूरज उगेगा। तुम्हारी इच्छा ईश्वर की इच्छा होगी। तु प्रचण्ड सूर्य के समान ईश्वरीय प्रकाश को जनता में विकीर्ण करोगे। आत्मा का वैयक्तिक एवं सामूहिक प्रतिष्ठान ही आत्मिक-शाँति का लक्ष्य है, इस लक्ष्य को समझो।

भगवान बुद्ध की शाँति, ऋषियों की शाँति, ब्रह्म-ज्ञानियों की शाँति, अनाहत् की शाँति, समाधि की शाँति, भगवान राम की शाँति, भगवान कृष्ण की शाँति, भगवती की शाँति एवं शाँति की शाँति को प्राप्त करो। वही प्राप्त करने योग्य है। वही सर्वस्व है। मुक्त हो जाओ और अपूर्व आनन्द में विलीन हो जाओ।

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