नरमेध का आह्वान (Kavita)
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युग परिवर्तन की बेला में उठ चलो बढ़ो रे चलो, चलो।।
ऊषा के ऊपर आच्छादित, हट रहा सघन तम का वितान।
प्राची से बोला शंखचूड़, रे सोने वालो सावधान।।
गत हुई निशा, उग रही उषा, निद्रा तोड़ो-तन्द्रा छोड़ो।
जगने की बेला आ पहुँची, आलस प्रमाद से मुख मोड़ो।।
बढ़ रहे पथिक चलने वाले कब से अब तुम भी बढ़ो-चलो।। युग।।
मैं बढूँ, मजा लूँ मौज करूं, मेरा हित, स्वार्थ सधे मेरा।
अपना सुख, अपनी खुदगर्जी, चाहे कुछ, अनहित हो तेरा।।
इस तरह न सोचो रे पगलो! इस तरह सोचना बन्द करो।।
सबके हित में अपना हित है, सब साथ बढ़ो, सब साथ चलो।।
बर्बादी का युग चला गया, गिर लिये जहाँ तक गिरना था।
अब और कहाँ तक लौटोगे, फिर लिये जहाँ तक फिरना था।।
हो चुकी धर्म की ग्लानि विपुल, अब इस अधर्म का नाश करो।
अवतरित नये युग का प्रकाश, अगवानी करने बढ़ो चलो।। युग.।।
वह पावन संस्कृति फिर पनपे, जिसमें मानवता है प्रधान।
जिसका सत्, प्रेम, दया, मैत्री, तप, त्याग, सदाशयता विधान।।
वह अपनी संस्कृति फिर पनपे, नैतिकता जिसमें ओत-प्रोत।
जिस से झरते समता, ममता, सेवा, संयम के दिव्य स्रोत।।
तपसी भागीरथ! इस गंगा को भू पर लाने बढ़ो-चलो ।।युग.।।
अस्थियाँ दान करने वाले, देखो दधीचि कुछ माँग रहे।
लो सुनो-सुनो अर्हन्त बुद्ध, चुप-चुप कुछ तुम से माँग रहे।।
शिवि, हरिचन्द्र, बलि, भरत, कर्ण, कच रोहिताश्व से बड़ भागी।
कंजूसों! इन्हें निराश न लौटाओ, कुछ देने बढ़ो, चलो ।। युग.।।
युग ने ली अँगड़ाई है, आत्मा भारत की जाग चली।
सुन गुडाकेश का पाँचजन्य, भीरुता-दासता भाग चली।।
दे रहा चुनौती यौवन को, कर अट्टहास मरघट-मसान।
“नरमेध” ढूँढ़ता मुर्दों में, क्या है रे कोई प्राणवान।।
बलिदान करो बलिदान करो, मत रुको-डरो मत, बढ़ो चलो।।युग.।।
*समाप्त*

