हमारी वसीयत और विरासत (भाग 128): स्थूल का सूक्ष्मशरीर में परिवर्तन— सूक्ष्मीकरण
हमें अपनी प्रवृत्तियाँ बहुमुखी बढ़ा लेने के लिए कहा गया है। इसमें सबसे बड़ी कठिनाई स्थूलशरीर का सीमा-बंधन है। यह सीमित है। सीमित क्षेत्र में ही काम कर सकता है। सीमित ही वजन उठा सकता है। काम असीम क्षेत्र से संबंधित हैं और ऐसे हैं, जिनमें एक साथ कितनों से ही वास्ता पड़ना चाहिए। यह कैसे बने? इसके लिए एक तरीका यह है कि स्थूलशरीर को बिलकुल ही छोड़ दिया जाए और जो करना है, उसे पूरी तरह एक या अनेक सूक्ष्मशरीरों से संपन्न करते रहा जाए। निर्देशक को यदि यही उचित लगेगा, तो उसे निपटाने में पल भर की भी देर नहीं लगेगी। स्थूलशरीरों का एक झंझट है कि उनके साथ कर्मफल के भोग-विधान जुड़ जाते हैं। यदि लेन-देन बाकी रहे तो अगले जन्म तक वह भार लदा चला जाता है और फिर खिंच-तान करता है। ऐसी दशा में उसके भोग भुगतते हुए जाने में निश्चिंतता रहती है।
रामकृष्ण परमहंस ने आशीर्वाद-वरदान बहुत दिए थे। उपार्जित पुण्यभंडार कम था। हिसाब चुकाने के लिए गले का कैंसर बुलाया गया। बेबाकी तब हुई। आद्य शंकराचार्य को भी भगंदर का फोड़ा ही जान लेकर गया था। महात्मा नारायण स्वामी को भी ऐसा ही रोग सहना पड़ा। गुरु गोलवलकर कैंसर से पीड़ित होकर स्वर्गवासी हुए। ऐसे ही अन्य उदाहरण भी हैं, जिनमें पुण्यात्माओं को अंतिम समय व्यथापूर्वक बिताना पड़ा। इसमें उनके पापों का दंड कारण नहीं होता। वह पुण्य व्यतिरेक की भरपाई करना होता है। वे कइयों का कष्ट अपने ऊपर लेते रहते हैं। बीच में चुका सके, तो ठीक; अन्यथा अंतिम समय हिसाब-किताब बराबर करते हैं, ताकि आगे के लिए कोई झंझट शेष न रहे और जीवनमुक्त स्थिति बने रहने में पीछे का कोई कर्मफल व्यवधान उत्पन्न न करे।
मूल प्रश्न जीवसत्ता के सूक्ष्मीकरण का है। सूक्ष्म व्यापक होता है, बहुमुखी भी। एक ही समय में कई जगह काम कर सकता है। कई उत्तरदायित्व एक साथ ओढ़ सकता है। जबकि स्थूल के लिए एक स्थान, एक सीमा के बंधन हैं। स्थूलशरीरधारी अपने भाग-दौड़ के क्षेत्र में ही काम करेगा। साथ ही भाषाज्ञान के अनुरूप विचारों का आदान-प्रदान कर सकेगा। किंतु सूक्ष्म में प्रवेश करने पर भाषा संबंधी झंझट दूर हो जाते हैं। विचारों का आदान-प्रदान चल पड़ता है। विचार सीधे मस्तिष्क या अंतराल तक पहुँचाए जा सकते हैं। उनके लिए भाषा माध्यम आवश्यक नहीं। व्यापकता की दृष्टि से यह एक बहुत बड़ी सुविधा है। यातायात की व्यवस्था भी स्थूलशरीरधारी को चाहिए। पैरों के सहारे तो यह घंटे में प्रायः तीन मील ही चल पाता है। वाहन जिस गति का होगा, उसकी दौड़ भी उतनी ही रह जाएगी। एक व्यक्ति की एक जीभ होती है। उसका उच्चारण उसी से होगा, किंतु सूक्ष्मशरीर की इंद्रियों पर इस प्रकार का बंधन नहीं है। उनकी देखने की, सुनने की, बोलने की सामर्थ्य स्थूलशरीर की तुलना में अनेक गुनी हो जाती है। एक ही शरीर समयानुसार अनेक शरीरों में भी प्रतिभाषित हो सकता है। रास के समय श्रीकृष्ण के अनेक शरीर गोपियों का अपने साथ सहनृत्य करते दीखते थे। कंसवध के समय तथा सिया स्वयंवर के समय उपस्थित समुदाय को राम और कृष्ण की विभिन्न प्रकार की आकृतियाँ दृष्टिगोचर हुई थीं। विराट रूप के दर्शन में भगवान ने अर्जुन को, यशोदा को जो दर्शन कराया था, वह उनके सूक्ष्म एवं कारणशरीर का ही आभास था। अलंकार काव्य के रूप में उसकी व्याख्या की जाती है, सो भी किसी सीमा तक ठीक ही है।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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