हमारी वसीयत और विरासत (भाग 138): मनीषी के रूप में हमारी प्रत्यक्ष भूमिका
साहित्य की आज कहीं कमी है? जितनी पत्र-पत्रिकाएँ आज प्रकाशित होती हैं; जितना साहित्य नित्य विश्व भर में छपता है, उस पहाड़ के समान सामग्री को देखते हुए लगता है, वास्तव में मनीषी बढ़े हैं; पढ़ने वाले भी बढ़े हैं। लेकिन इन सबका प्रभाव क्यों नहीं पड़ता? क्यों एक लेखक की कलम कुत्सा भड़काने में ही निरत रहती है एवं उस साहित्य को पढ़कर तुष्टि पाने वालों की संख्या बढ़ती है। इसके कारण ढूँढ़े जाएँ, तो वहीं आना होगा, जहाँ कहा गया था— ‘‘पावनानि न भविन्त’’। यदि इतनी मात्रा में उच्चस्तरीय— चिंतन को उत्कृष्ट बनाने वाला साहित्य रचा गया होता एवं उसकी भूख बढ़ाने का माद्दा जनसमुदाय के मन में पैदा किया गया होता, तो क्या ये विकृतियाँ नजर आतीं, जो आज समाज में विद्यमान हैं। दैनंदिन जीवन की समस्याओं का समाधान यदि संभव है तो वह युगमनीषा के हाथों ही होगा।
जैसा कि हम पूर्व में भी कह चुके हैं कि नवयुग यदि आएगा तो विचार-शोधन द्वारा ही; क्रांति होगी, तो वह लहू और लोहे से नहीं, विचारों की विचारों से काट द्वारा होगी; समाज का नवनिर्माण होगा, तो वह सद्विचारों की प्रतिष्ठापना द्वारा ही संभव होगा। अभी तक जितनी मलिनता समाज में प्रविष्ट हुई है, वह बुद्धिमानों के माध्यम से ही हुई है। द्वेष-कलह, नस्लवाद, व्यापक नरसंहार जैसे कार्यों में बुद्धिमानों ने ही अग्रणी भूमिका निभाई है। यदि वे सन्मार्गगामी होते; उनके अंतःकरण पवित्र होते; तप-ऊर्जा का संबल उन्हें मिला होता, तो उन्होंने विधेयात्मक विज्ञान-प्रवाह को जन्म दिया होता; सत्साहित्य रचा होता, ऐसे आंदोलन चलाए होते। हिटलर ने जब ‘नीत्से के सुपरमैन’ रूपी अधिनायक को अपने में साकार करने की इच्छा की तो सर्वप्रथम सारे राष्ट्र के विचार-प्रवाह को उस दिशा में मोड़ा। अध्यापक-वैज्ञानिक वर्ग नाजीवाद का कट्टर समर्थक बना, तो उसकी उस निषेधात्मक विचार-साधना द्वारा, जो उसने ‘मीन केंफ’ के रूप में आरोपित की। बाद में सारे राष्ट्र के पाठ्यक्रम, अखबारों की धारा का मोड़ उसने उस दिशा में मोड़ दिया जैसा कि वह चाहता था। जर्मन राष्ट्र नस्लवाद के अहं में सर्वश्रेष्ठ जाति का प्रतीक होने के गर्वोन्माद में उन्मत्त हो व्यापक नरसंहार कर स्वयं ध्वस्त हो गया। यह भी मनीषा के एक मोड़ की परिणति है, ऐसे मोड़ की, जो सही दिशा में होता, तो ऐसे समर्थ-संपन्न राष्ट्र को कहाँ-से-कहाँ ले जाता।
कार्ल मार्क्स ने सारे अभावों में जीवन जीते हुए अर्थशास्त्ररूपी ऐसे दर्शन को जन्म दिया, जिसने समाज में क्रांति ला दी। पूँजीवादी किले ढहते चले गए एवं साम्राज्यवाद दो तिहाई धरती से समाप्त हो गया। ‘दास कैपीटल’ रूपी इस रचना ने एक नवयुग का शुभारंभ किया, जिसमें श्रमिकों को अपने अधिकार मिले एवं पूँजी के समान वितरण का यह अध्याय खुला, जिससे करोड़ों व्यक्तियों को सुख-चैन की— स्वावलंबनप्रधान जिंदगी जी सकने की स्वतंत्रता मिली। रूसो ने जिस प्रजातंत्र की नींव डाली थी, उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद के पक्षधर शोषकों की रीति-नीति ही उसकी प्रेरणास्त्रोत होगी। मताधिकार की स्वतंत्रता, बहुमत के आधार पर प्रतिनिधित्व का दर्शन विकसित न हुआ होता; यदि रूसो की विचारधारा ने व्यापक प्रभाव जनसमुदाय पर न डाला होता, तो 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' की नीति ही सब जगह चलती; कोई विरोध तक न कर पाता। जागीरदारों एवं उत्तराधिकार के आधार पर राजा बनने वाले अनगढ़ों का ही वर्चस्व होता। इसे एक प्रकार की मनीषाप्रेरित क्रांति का कहना चाहिए कि देखते-देखते उपनिवेश समाप्त हो गए; शोषक वर्ग का सफाया हो गया। इसी संदर्भ में हम कितनी ही बार ‘लिंकन’ एवं ‘लूथर किंग’ के साथ-साथ उस महिला ‘हैरियट स्टो’ का उल्लेख करते रहे हैं, जिसकी कलम ने कालों को गुलामी के चंगुल से मुक्त कराया। प्रत्यक्षतः यह युगमनीषा की भूमिका है।
बुद्ध की विवेक एवं नीतिमत्ता पर आधारित विचार-क्रांति एवं गांधी, पटेल, नेहरू द्वारा पैदा की गई स्वातंत्र्य आंदोलन की आँधी उस परोक्ष मनीषा की प्रतीक है, जिसने अपने समय में ऐसा प्रचंड प्रवाह उत्पन्न किया कि युग बदलता चला गया। उन्होंने कोई विचारोत्तेजक साहित्य रचा हो, यह भी नहीं। फिर यह सब कैसे संभव हुआ। यह तभी हो पाया, जब उन्होंने मुनि स्तर की भूमिका निभाई, स्वयं को तपाया, विचारों में शक्ति पैदा की एवं उससे वातावरण को प्रभावित किया।
परिस्थितियाँ आज भी विषम हैं। वैभव और विनाश के झूले में झूल रही मानव जाति को उबारने के लिए आस्थाओं के मर्मस्थल तक पहुँचना होगा और मानवी गरिमा को उभारने, दूरदर्शी विवेकशीलता को जगाने वाला प्रचंड पुरुषार्थ करना होगा। साधन इस कार्य में कोई योगदान दे सकते हैं, यह सोचना भ्रांतिपूर्ण है। दुर्बल आस्था अंतराल को तत्त्व दर्शन और साधना-प्रयोग के उर्वरक की आवश्यकता है। अध्यात्मवेत्ता इस मरुस्थल की देख-भाल करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते व समय-समय पर संव्याप्त भ्रांतियों से मानवता को उबारते हैं। अध्यात्म की शक्ति विज्ञान से भी बड़ी है। अध्यात्म ही व्यक्ति के अंतराल में विकृतियों के माहौल से लड़ सकने— निरस्त कर पाने में सक्षम तत्त्वों की प्रतिष्ठापना कर पाता है। हमने व्यक्तित्वों में पवित्रता व प्रखरता का समावेश करने के लिए मनीषा को ही अपना माध्यम बनाया एवं उज्ज्वल भविष्य का सपना देखा है।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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