हमारी वसीयत और विरासत (भाग 140): ‘विनाश नहीं सृजन’— हमारा भविष्यकथन
अगला समय संकटों से भरा-पूरा है, इस बात को विभिन्न मूर्द्धन्यों ने अपने-अपने दृष्टिकोण के अनुसार विभिन्न प्रकार से जोरदार शब्दों में कहा। ईसाई धर्मग्रंथ ‘बाइबिल’ में जिस ‘सेविन टाइम्स’ में प्रलयकाल जैसी विपत्ति आने का उल्लेख किया है, उसका ठीक समय यही है। इसलाम धर्म में चौदहवीं सदी के महान संकट का उल्लेख है। भविष्य पुराण में इन्हीं दिनों महती विपत्ति टूट पड़ने का संकेत है। सिखों के गुरुग्रंथसाहिब में भी ऐसी ही अनेक भविष्यवाणियाँ हैं। कवि सूरदास ने इन्हीं दिनों विपत्ति आने का इशारा किया था। मिस्र के पिरामिडों में भी ऐसे ही शिलालेख पाए गए हैं। अनेक भारतीय भविष्यवक्ताओं ने इन दिनों भयंकर उथल-पुथल के कारण अध्यात्म-आधार पर और दृश्य गणित ज्योतिष के सहारे ऐसी ही संभावनाएँ व्यक्त की हैं।
पाश्चात्य देशों में जिन भविष्यवक्ताओं की धाक है और जिनकी भविष्यवाणियाँ 99 प्रतिशत सही निकलती रही हैं, उनमें जीन डिक्सन, प्रो. हरार, एंडरसन, जॉन बोवरिंग, कीरो, आर्थर क्लार्क, नोस्ट्राडेमस, मदर शिप्टन, आनंदाचार्य आदि ने इस समय के संबंध में जो संभावनाएँ व्यक्त की हैं, वे भयावह हैं। कोरिया में पिछले दिनों समस्त संसार के दैवज्ञों का एक सम्मेलन हुआ था, उसमें भी डरावनी संभावनाओं की ही आगाही व्यक्त की गई थी। टोरंटो-कनाडा में संसार भर के भविष्य विज्ञान विशेषज्ञों (फ्यूचरोलॉजिस्टों) का एक सम्मेलन हुआ था, जिसमें वर्तमान परिस्थितियों का पर्यवेक्षण करते हुए कहा था कि बुरे दिन अतिसमीप आ गए हैं। ग्रह-नक्षत्रों के पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव को समझने वालों ने इन दिनों सूर्य पर बढ़ते धब्बों और लगातार पड़ने वाले सूर्यग्रहणों को धरती निवासियों के लिए हानिकारक बताया है। इन दिनों सन् 85 के प्रारंभ में उदय हुए ‘हैली’ धूमकेतु की विषैली गैसों का परिणाम पृथ्वीवासियों के लिए हानिकारक बताया गया है।
सामान्य बुद्धि के लोग भी जानते हैं कि अंधाधुंध बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए अगले दिनों अन्न-जल तो क्या, सड़कों पर चलने को रास्ता तक न मिलेगा। औद्योगीकरण-मशीनीकरण की भरमार से हवा और पानी भी कम पड़ रहा है और विषाक्त हो चला है। खनिज तेल और धातुएँ, कोयला पचास वर्ष तक के लिए नहीं है। अणु परीक्षणों से उत्पन्न विकिरण से अगली पीढ़ी और वर्तमान जनसमुदाय को कैंसर जैसे भयानक रोगों की भरमार होने का भय है। कहीं अणुयुद्ध हो गया, तो इससे न केवल मनुष्य, वरन् अन्य प्राणियों और वनस्पतियों का भी सफाया हो जाएगा। असंतुलित हुए तापमान से ध्रुवों की बरफ पिघल पड़ने, समुद्र में तूफान आने और हिमयुग के लौट पड़ने की संभावना बताई जा रही है। और भी अनेक प्रकार के संकटों के अनेकानेक कारण विद्यमान हैं। इस संदर्भ में साहित्य इकट्ठा करना हो, तो उनसे ऐसी संभावनाएँ सुनिश्चित दिखाई पड़ती हैं, जिनके कारण इन वर्षों में भयानक उथल-पुथल हो। सन् 2000 में युग-परिवर्तन की घोषणा है। ऐसे समय में भी विकास से पूर्व विनाश की— ढलाई से पूर्व गलाई की संभावना का अनुमान लगाया जा सकता है। किसी भी पहलू से विचार किया जाए, प्रत्यक्षदर्शी और भावनाशील मनीषी— भविष्यवक्ता इन दिनों विश्वसंकट को अधिकाधिक गहरा होता देखते हैं।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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