हमारी वसीयत और विरासत (भाग 141): ‘विनाश नहीं सृजन’— हमारा भविष्यकथन
पत्रकारों और राजनीतिज्ञों के क्षेत्र में इस बार एक अत्यधिक चिंता यह संव्याप्त है कि इन दिनों जैसा संकट मनुष्य जाति के सामने है, वैसा मानवी उत्पत्ति के समय में कभी भी नहीं आया। शांति-परिषद् आदि अनेक संस्थाएँ इस बात के लिए प्रयत्नशील हैं कि महाविनाश का जो संकट सिर पर छाया हुआ है, वह किसी प्रकार टले। छुट-फुट लड़ाइयाँ तो विभिन्न क्षेत्रों में होती ही रहती हैं। शीतयुद्ध किसी भी दिन महाविनाश के रूप में विकसित हो सकता है, यह अनुमान हर कोई लगा सकता है।
भूतकाल में भी देवासुर-संग्राम होते रहे हैं, पर जनजीवन के सर्वनाश की प्रत्यक्ष संभावना का, सर्वसम्मत ऐसा अवसर इससे पूर्व कभी भी नहीं आया।
इन संकटों को ऋषिकल्प सूक्ष्मधारी आत्माएँ भली प्रकार देख और समझ रही हैं। ऐसे अवसर में वे मौन नहीं रह सकतीं। ऋषियों के तप स्वर्ग, मुक्ति एवं सिद्धि प्राप्त करने के लिए नहीं होते। यह उपलब्धियाँ तो आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने वाले स्थूलशरीरधारी भी प्राप्त कर लेते हैं। यह महामानवों को प्राप्त होने वाली विभूतियाँ हैं। ऋषियों को भगवान का कार्य सँभालना पड़ता है और वे उसी प्रयास को लक्ष्य मानकर संलग्न रहते हैं।
हमारे ऊपर जिन ऋषि का— दैवी सत्ता का अनुग्रह है, उनने सभी कार्य लोक-मंगल के निमित्त कराए हैं। आरंभिक 24 महापुरश्चरण भी इसी निमित्त कराए हैं कि आत्मिक समर्थता इस स्तर की प्राप्त हो सके, जिसके सहारे लोक-कल्याण के अतिमहत्त्वपूर्ण कार्यों को संपन्न करने में कठिनाई न पड़े।
विश्व के ऊपर छाए हुए संकटों को टालने के लिए उन्हें चिंता है। चिंता ही नहीं, प्रयास भी किए हैं। इन्हीं प्रयासों में एक हमारे व्यक्तित्व को पवित्रता और प्रखरता से भर देना भी है। आध्यात्मिक सामर्थ्य इसी आधार पर विकसित होती है।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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