होली
होली विशेषांक— 4
पुराणकालीन, आदर्शसत्याग्रही, भक्त प्रह्लाद के दमन के लिए हिरण्यकश्यप के छल-प्रपंच सफल न हो सके। उसे भस्म करने के प्रयास में होलिका जल मरी और प्रहलाद तपे कंचन बन गए। खीज-क्रोध से उन्मत्त हिरण्यकश्यप जब स्वयं उसे मारने दौड़ा, तो नृसिंह भगवान ने प्रकट होकर उसे समाप्त कर दिया। इस कथा की महान प्रेरणाओं को होली के यज्ञीय वातावरण में उभारा जाना उपयुक्त है।
यह राष्ट्रीय चेतना के जागरण का पर्व है। जहाँ वर्गभेद है, वहाँ समस्त साधन होते हुए भी क्लेश और अशक्तता ही रहेगी; जिनमें भ्रातृत्व सहकार है, वे अल्प साधनों में भी प्रसन्न और अजेय रहेंगे, इसलिए इसे समता का पर्व भी मानते हैं। कार्य-विभाजन के लिए किए गए चार प्रमुख वर्गों को महत्त्व देने की परंपरा रखी गई है। होली पर्व में शुद्र वर्ग को प्रधान महत्त्व देकर समता-सिद्धांत को चरितार्थ किया जाता रहा है।
इन सब प्रेरणाओं— विशेषताओं को उभारने— पनपाने के लिए होली पर्व का सामूहिक आयोजन अतीव उपयोगी है। प्रभावशाली लोकसेवी भावनापूर्वक इसके लिए प्रयत्नरत हों, तो बड़े आकर्षक और प्रभावशाली रूप में यह मनाया जा सकता है । होली पर्व पर जो कुरीतियाँ पनप गई हैं, उन्हें निरस्त करने में भी सामूहिक पर्व आयोजन से बड़ी सहायता मिलती है । उत्साह बना रहे, पर उसे मोड़ देकर शुभ बनाया जाए। यह कलाकारिता है। इसे प्रभावशाली लोकसेवी थोड़े प्रयास-पुरुषार्थ, सूझ-बूझ से संपन्न कर सकते हैं।
— कर्मकाण्ड भास्कर / 10 - पर्व प्रकरण / होली
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