विज्ञान को शैतान बनने से रोकें:अनियंत्रित प्रगति अर्थात महामरण की तैयारी
सामान्य व्यक्ति का मस्तिष्क विकृत हो तो वह थोड़े ही व्यक्तियों का अहित कर सकता है। उसी तरह की दुर्बुद्धि वाले लोगों का एक समूह निकल पड़े, तो हानि की सँभावनाएँ निश्चित बढ़ती हैं। किंतु यदि यही रोग राजसत्ताओं में व्याप्त हो जाए, तब तो यह समझना चाहिए कि महायुद्ध, महामरण की सँभावनाएँ ही सुनिश्चित है।
राजसत्ता भी कोई जड़ वस्तु नहीं है, उस पर भी नियंत्रण मनुष्य का ही रहता है; चाहे वह राजतंत्र हो अथवा प्रजातंत्र। एक ओर मनुष्य की सुरसा की तरह बढ़ रही लालसाएँ और महत्त्वाकांक्षाएँ, अनियंत्रित विज्ञान का योगदान और उस पर भी निरंकुश-उद्धत। आज विश्व के रंगमंच पर यह परिस्थितियाँ पूरी तरह घटाटोप छाई हुई हैं। वह मारण अस्त्र तेजी से बनते चले जा रहे हैं कि सृष्टि का किसी क्षण विनाश संभव है। आइंस्टीन का यह कथन— “तृतीय विश्वयुद्ध होगा या नहीं? यह तो ज्ञात नहीं, पर यदि हुआ तो अगला युद्ध ईंट और पत्थरों से लड़ा जाएगा”, नितांत सत्य है कि इस कथन में सृष्टि के महाविनाश का दृश्य पूरी तरह झाँक रहा है।
यों पिछले दिनों रूस और अमेरिका के बीच एक रक्षा संधि हुई है, जिसमें दोनों देशों ने अधिक लंबी दूरी के मारक और घातक विस्फोटकों की संख्या घटाने पर सहमति प्रकट की है, पर वह एक चाल मात्र है। संख्या घटाने की आड़ में अस्त्रों की गुणात्मक श्रेष्ठता बढ़ाई जा रही है। स्थान कम घिरने और गिनती कम होने भर की सुविधा मिलेगी, वैसे उससे संहारक शक्ति में कोई कटौती होने वाली नहीं। समझौते की स्याही सूखने भी नहीं पाई थी कि पुराने अधिकाधिक घातक अस्त्रों का भंडार भरने की नीति का ही तुमुलघोष किया जाने लगा। अमेरिका के डिफेंस सेक्रेटरी मेल्विन लायड ने कहा— "समझौता व्यर्थ है। हमें जिंदा रहना है, तो पनडुब्बियों से फेंकी जाने वाली दूरमारक मिसाइलें बनानी ही होंगी, नहीं तो रूस हमें खा जाएगा।" अखबारों ने समझौते का मजाक उड़ाते हुए कहा— “इससे हम आणविक सर्वोच्चता की नीति को आणविक नहीं, आत्मनिर्भरता कहने लगेंगे। अब अणु शस्त्रों की दौड़ क्वांटिटी में न होकर, क्वालिटी में होगी।”
विश्व के हर नागरिक— स्त्री-पुरुष-बच्चे के लिए 20 टन बारूद तैयार है। बच्चा पैदा होने पर उसकी आवाज जितनी देर में उसकी माँ के कानों तक पहुँचती है, उतनी देर में उस जैसे बीस की जीवनसत्ताओं का अंत कर देने वाली अणुशक्ति आज के कारखानों में उत्पन्न हो जाती है। इसका विस्तृत विवरण ब्रिटिश ब्रॉड कास्टिंग कॉरपोरेशन द्वारा बनाई गई वृत्त फिल्म ‘दि डैथ गेम' में दिखाया गया है।
सन् 1969 में विश्व के 120 देशों की एक सर्वेक्षण समिति ने शस्त्रों पर संसार भर में होने वाले खरचे का लेखा-जोखा एकत्रित किया था, तदनुसार संसार भर में जमा हुए शस्त्रों का मूल्य सन् 1967 तक 136,500 करोड़ रुपया पहुँच चुका था। इसके बाद अब तक जो उत्पादन हुआ है, उसे कम-से-कम दूना तो कहा ही जा सकता है।
सन् 1967 तक के आँकड़े बताते हैं— संसार के हर मनुष्य पीछे मारने वाली सामग्री 420 रुपया लागत की जमा हो चुकी है। संसार भर में 162 देश हैं, उनमें से 28 देश ऐसे हैं जिनकी प्रति व्यक्ति पीछे औसत आय 420 रु. से कम है। इनमें एक भारत भी शामिल है। अनुमान है कि यह व्यय इसी दशाब्दी में 3,00,000 करोड़ से ऊपर निकल जाएगा। यह राशि इतनी बड़ी होगी कि यदि सौ रुपये के नोटों की माला बनाई जाए तो वह धरती से चंद्रमा की दूरी की साढ़े सात बार परिक्रमा कर लेगी।
दरिद्रता मिटाने के लिए विश्व भर में जितना धन खरच किया जाता है, उसकी तुलना में शस्त्रों पर 20 गुना अधिक खरच होता है। स्वास्थ्य पर खरच होने वाली राशि से यह तीन गुना अधिक है। इस धन से दो करोड़ लोगों के निवास के लिए बढ़िया मकान बनाकर दिए जा सकते हैं।
युद्ध में आदमी को मारने की लागत दिन-दिन महँगी होती चली जा रही है। जूलियस सीजर के जमाने में एक सैनिक मारने में सिर्फ 5 रु. खरच आते थे। नैपोलियन के जमाने में दो हजार तक हो गई थी। प्रथम युद्ध में अमेरिका ने एक व्यक्ति मारने पर डेढ़ लाख रुपया खरच किया। दूसरे युद्ध में यह लागत दस गुनी बढ़ गई, जबकि वियतनाम युद्ध में हर गुरिल्ला को मारने में 13 लाख रुपया खरच का औसत आया है।
अमेरिका का प्रमुख उद्योग युद्ध-सामग्री का उत्पादन है। इसे वह विश्व भर में सप्लाई करता है। द्वितीय युद्ध के बाद उसने 20 लाख राइफलें, 1 लाख मशीनगर्ने, 10 हजार लड़ाकू जहाज, 20 हजार टैंक, 30 हजार प्रक्षेपणास्त्र, 2500 पनडुब्बियाँ दूसरे देशों को बेची हैं। यह आँकड़े तेईस वर्ष पुराने हैं। यह संख्या इस बीच दूनी हो गई हो, तो कुछ भी अचंभे की बात नहीं है। सन् 1971 में अमेरिका का युद्ध बजट 77.5 अरब रुपया था। अब वह 100 अरब वार्षिक सीमा तोड़कर आगे बढ़ गया है।
तीर तलवार, बंदूक और तोपों का जमाना अब चला गया। उन साधनों से थोड़ी-थोड़ी संख्या में मनुष्य मरते थे और चलाने वाले के पराक्रम एवं कौशल की परीक्षा होती थी। अब तो एक दुर्बल बीमार के लिए भी यह संभव हो गया है कि वह समस्त सृष्टि का नामोनिशान मिटाकर रख दे। विशाल क्षेत्र को प्राण रहित बना दें। मिसाइल-एंटीमिसाइल बनते चले जा रहे हैं। इन पर लादकर अणुबम संसार के एक छोर से दूसरे छोर तक भेजा जा सकता है और प्रयोगशाला की कोठरी में बैठे हुए बटन दबाने मात्र से किसी भी क्षेत्र का सर्वनाश किया जा सकता है।
अमेरिका में अणु प्रहार कर सकने की सामर्थ्य वाले केंद्रों की संख्या अब से कुछ वर्ष पूर्व 4600 थी। सन् 1975 तक वह 11000 हो गई। रूस में ऐसे केंद्र तो 2000 ही हैं, पर उनमें गुणपरक श्रेष्ठता बढ़ाने के प्रयत्न तेजी से चल रहे हैं।
पिछले दिनों जितने अणु-अस्त्र बन चुके थे, उनमें इस सुंदर पृथ्वी को 14 बार ध्वस्त किया जा सकता था। पर तब से अब तक तो वह क्षमता लगातार बढ़ती ही चली आ रही है और अनुमान लगाया जाता है कि इन अणुओं से अपनी जैसी 50 धरती एक साथ चूर्ण-विचूर्ण करके आकाश में धूल की तरह उड़ाई जा सकती हैं। विशेषज्ञ ‘प्रो० बैरी कामनर’ ने कहा था— “टेक्नालॉजी द्वारा प्रकृति के साथ असामान्य छेड़-छाड़ करने का वर्तमान क्रम यदि इसी तरह जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं, जब यह धरती मनुष्यों के रहने योग्य ही नहीं रहेगी।” प्रकृति आज हमारी रक्षक है, पर संतुलन बिगड़ जाने पर वही भक्षक बन जाएगी। प्रकृति पर विजय पाने की धुन में हम उसका संतुलन बिगाड़ते जा रहे हैं। प्रकृति की खोज करना और उसके रहस्यों से परिचित होकर लाभान्वित होना तो ठीक है, पर इससे पहले हमें यह निश्चित करना चाहिए कि संतुलन बिगाड़ने की सीमा तक छेड़खानी न की जाएगी। अविवेकपूर्ण ढंग से हवा, पानी और मिट्टी को बिगाड़ते चले जाना, इस धरती पर रहने वाले समस्त प्राणियों का जीवन संकट में डालना है।
केवल परमाणु परीक्षणों की ही बात पर विचार करें, तो उसके खतरे भी कम नहीं आँके जा सकते हैं। अब तक जितने परीक्षण हो चुके हैं, उनका दुष्परिणाम भी असंख्य लोगों को कितनी ही पीढ़ियों तक भुगतना पड़ेगा ? यदि अणुयुद्ध नहीं भी हो किंतु परीक्षणों का वर्तमान सिलसिला इसी क्रम से चलता रहे तो भी उससे सर्वनाश की विभीषिका बढ़ती ही चली जाएगी। परीक्षणों से निकलने वाले रेडियो सक्रिय तत्त्व मारक विष ही होते हैं।
हवा, पानी और वनस्पतियों के सहारे शरीर में प्रवेश करते हैं और रक्तचाप, कैंसर जैसे जटिल रोग उत्पन्न करते हैं। अणु विशेषज्ञ डॉ० रैल्फलाफ ने चेतावनी दी है— “मनुष्य में रेडियो सक्रियता सहने की जितनी शक्ति है, उसका उल्लंघन परीक्षण की वर्तमान श्रृंखला करती चली जा रही है। अणुयुद्ध की एक भयानक भूमिका तो यह परीक्षण ही करते चले जा रहे हैं। यह कदम न रुके, तो हम सब बिना युद्ध के इस परीक्षण युद्ध के विनाश गर्त में गिरकर ही समाप्त हो जाएँगे।” अनुमान है कि प्रत्येक अणु परीक्षण देर-सबेर में 50 हजार मनुष्यों की अकाल मृत्यु का कारण बनता है। यों वह प्रभावित तो हजार मील तक करेगी और न्यूनाधिक मात्रा में उस क्षेत्र के निवासियों को भयानक रुग्णता में ग्रसित करेगी और वह संकट पीढी-दर-पीढी चलेगा।
रासायनिक और जीवाणु आयुधों का विरोध भी प्रबुद्ध जनता द्वारा होता रहा है, पर उसका कोई विशेष प्रभाव नहीं हुआ। अमेरिका के जिन विश्वविद्यालयों में जीव विषय पर खोज हो रही है, वहीं के छात्र उस खोज का विरोध और बहिष्कार कर रहे है। पेंसिलवानिया विश्वविद्यालय के फिजीकल बायो-केमिस्ट्री विभाग के 11 प्रोफेसरों के पदवी दान समारोह में गैस मास्क पहनकर इन शोधों पर विरोध किया था। 17 नोबल पुरस्कार विजेता और विज्ञान एकादमी के 117 सदस्य इन प्रयोगों पर रोष प्रदर्शित कर चुके हैं।
विज्ञानी पत्रकार नाइर्जल कैल्डर द्वारा संपादित एक पुस्तक ‘एलन लेनाद पेंग्विन’ प्रेस से प्रकाशित हुई है। नाम है 'अनलेस पीस कम्स'। इसमें संसार के प्रमुख 14 राजनीतिज्ञों, युद्ध विशारदों और वैज्ञानिकों ने एक-एक अध्याय लिखा है। सभी लेख बहुत ही तथ्यपूर्ण तथा मननीय हैं। इसमें भावी युद्ध की विभीषिकाओं का विवेचन-निरूपण करते हुए निष्कर्ष निकाला गया है कि विज्ञान और युद्ध दोनों एक साथ जीवित नहीं रह सकते। दोनों में से एक को तो हर हालत में मरना ही पड़ेगा। भले ही यह फैसला तीसरे महायुद्ध के उपरांत हो अथवा पहले।
विज्ञान की शोधें— आणविक, रासायनिक तथा विषाणु आयुध जिस तेजी से बना रही हैं, उसका विस्तार क्रमशः होता ही चला जाएगा। आज जो निर्माण महँगा है, उसी के कल सस्ता होने का रास्ता निकल आएगा। यह घातक अस्त्र अभी थोड़े देशों के पास हैं, पर अगले दिनों वे प्रायः सभी के पास हो जाएँगे। गरीब देश भी सस्ते किस्म के घातक अस्त्र बना लेंगे। उत्कृष्टता भले ही कम हो, पर मरण पर्व तो वे भी रच सकेंगे। तब उन पर नियंत्रण कर सकना कठिन हो जाएगा। कोई भी सिरफिरा आदमी किसी भी देश में नहीं निकलेगा, ऐसी कोई गारंटी नहीं। राजनीति और विज्ञान के क्षेत्र में घुसा हुआ एक ही सनकी व्यक्ति सारी दुनिया का सफाया करने के लिए काफी है।
क्या सत्ताधारियों के पागलपन के विरुद्ध गरीब आदमी नहीं जूझ सकता? इस प्रश्न के उत्तर में कहा गया है कि आयुधों के सम्मुख खड़े होकर लड़ने की ताकत मनुष्य में कभी नहीं रहेगी। पर एक नई शक्ति विकसित होगी, वह है— छापामार ताकत। गरीब आदमी की इस ताकत को कोई छीन न सकेगा और इस आधार पर उच्छृंखल अहमन्यता को चुनौती दी जा सकेगी। कहा गया है कि, “छापामार आंदोलन एक दर्शन के रूप में विकसित होगा और उसमें पीड़ित और पददलित जनता अपने को सेना के रूप में विकसित करके लड़ना आरंभ करेगी और अधिनायकों के प्रचार, संगठन और आक्रमणकारी तंत्रों को निरर्थक— निष्फल बना देगी।
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
विज्ञान को शैतान बनने से रोकें, पृष्ठ 106-112
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