हमारी वसीयत और विरासत (भाग 152): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
माना कि आज स्वार्थपरता, संकीर्णता और क्षुद्रता ने मनुष्य को बुरी तरह घेर रखा है, तो भी इस धरती को वीर विहीन नहीं कहा जा सकता। 60 लाख साधु-बाबा यदि धर्म के नाम पर घर-बार छोड़कर मारे-मारे फिर सकते हैं, तो कोई कारण नहीं कि मिशन की एक लाख वर्ष की समयदान की माँग पूरी न हो सके। एक व्यक्ति यदि दो घंटे रोज समयदान दे सके तो एक वर्ष में 720 घंटे होते हैं। 7 घंटे का दिन माना जाए तो यह पूरे 103 दिन एक वर्ष में हो जाते हैं। यह संकल्प कोई 20 वर्ष की आयु में ले और 70 का होने तक 50 वर्ष निबाहे तो कुल दिन 5 हजार दिन हो जाते हैं, जिसका अर्थ हुआ प्रायः 14 वर्ष। एक लाख वर्ष का समय पूरा करने के लिए ऐसे 100000=147143 कुल इतने से व्यक्ति अपने जीवन में ही एक लाख वर्ष की समयदान-याचना को पूर्ण कर सकते हैं। यह तो एक छोटी गणना हुई। मिशन में ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं, जो साधु-ब्राह्मण जैसा परमार्थपरायण जीवन अभी भी जी रहे हैं और अपना समय पूरी तरह युग-परिवर्तन की प्रक्रिया में नियोजित किए हुए हैं। ऐसे ब्रह्मचारी और वानप्रस्थी हजारों की संख्या में अभी भी हैं। उनका पूरा समय जोड़ लेने पर तो वह गणना एक लाख वर्ष से कहीं अधिक की पूरी हो जाती है।
बात इतने तक सीमित नहीं है। प्रज्ञा परिवार के ऐसे कितने ही उदारचेता हैं, जिनने हीरक जयंती के उपलक्ष्य में समयदान के आग्रह और अनुरोध को दैवी निर्देशन माना है और अपनी परिस्थितियों से तालमेल बिठाते हुए एक वर्ष से लेकर पाँच वर्ष तक का समय एक मुश्त दिया है। ऐसे लोग भी बड़ी संख्या में हैं, जो प्रवास पर तो नहीं जा सके, पर घर पर रहकर ही आएदिन मिशन की गतिविधियों को अग्रगामी बनाने के लिए समय देते रहेंगे; स्थानीय गतिविधियों तक ही सीमित रहकर समीपवर्ती कार्यक्षेत्र को भी सँभालते रहेंगे।
पुरुषों की तरह महिलाएँ भी इस समयदान यज्ञ में भाग ले सकती हैं। शारीरिक और बौद्धिक दोनों ही प्रकार के श्रम ऐसे हैं, जिन्हें अपनाकर वे महिला समाज में शिक्षा-संवर्द्धन जैसे अनेक काम कर सकती हैं। अशिक्षित महिलाएँ तक घरों में शाक-वाटिका लगाने जैसा काम कर सकती हैं। जिनके पीछे पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं हैं; शरीर से स्वस्थ, मन से स्फूर्तिवान् हैं, वे शान्तिकुञ्ज के भोजनालय विभाग में काम कर सकती हैं और यहाँ के वातावरण में रहकर आशातीत संतोष भरा शेष जीवन बिता सकती हैं।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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