हमारी वसीयत और विरासत (भाग 154): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
परिवर्तन और निर्माण दोनों ही कष्टसाध्य हैं। भ्रूण जब शिशुरूप में धरती पर आता है, तो प्रसवपीड़ा के साथ होने वाला खून-खच्चर दिल दहला देता है। प्रस्तुत परिस्थितियों के दृश्य और अदृश्य दोनों ही पक्ष ऐसे हैं, जिनके कण-कण से महाविनाश का परिचय मिलता है। समय की आवश्यकताएँ इतनी बड़ी हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए बहुतों को, बहुत कुछ करना चाहिए। विनाश से निपटने और विकास प्रत्यक्ष करने के लिए असामान्य व्यक्तित्व, असामान्य कौशल और असीम साधन चाहिए। इतने असीम, जिन्हें जुटा सकना किसी व्यक्ति या समुदाय के लिए कठिन है। उस सारे सरंजाम का जुटाना मात्र परमेश्वर के हाथ है। हाँ, इतना अवश्य है कि निराकार को साकार जीवधारियों में नियोजित रणनीति की और कौशल भरी व्यवस्था की आवश्यकता पड़ती है। सो भी बड़े परिमाण में। ऐसे कार्यों का संयोजन तो स्रष्टा की विधि-व्यवस्था ही करती है, पर उसका श्रेय श्रद्धावान साहसियों को मिल जाता है। हनुमान और अर्जुन की शक्ति उनकी निज की उपार्जित नहीं थी। वे स्रष्टा का काम करते हुए उसी की सामर्थ्य को प्राप्त कर सके। अर्जुन को सारथी का यदि समर्थन न रहा होता, तो महाभारत कैसे जीता जाता? हनुमान स्वयं बलवान रहे होते, तो सुग्रीव सहित ऋष्यमूक पर्वत पर छिपे-छिपे न फिरते। समुद्र छलाँगने, लंका जलाने, पर्वत उखाड़ने की सामर्थ्य उन्हें धरोहर में इसलिए मिली थी कि वह रामकाज में समर्पित हों। यदि निजी मनोवांछनाओं के लिए किसी भक्त ने माँगा है तो नारद-मोह के समय पर मिले उपहास की तरह तिरस्कृत होना पड़ा है।
महान परिवर्तन के साथ जुड़े हुए नवसृजन का उभयपक्षीय कार्य ऐसा है, जिसे संपन्न किए जाने के लिए उतने साधन चाहिए, जिनका विवरण शब्दों में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। वह जुटाए जाने हैं; जुटेंगे भी।
अभीष्ट प्रयोजन की महानता को समग्र रूप से आँका जाना कठिन है। इसकी किस्तें ही शृंखला की कड़ियों की तरह प्रादुर्भूत होती हैं। प्रस्तुत संकट या संकल्प इसी प्रकार का है, जो अवतरण पर्व पर विगत वसंत पंचमी को प्रकट हुआ। उस एक को पाँच भागों की सुविधा की दृष्टि से विभाजित किया गया है। 1. एक लाख यज्ञ, 2. एक लाख नररत्न, 3. एक लाख अशोक-वाटिका, 4. एक लाख ग्राम्यतीर्थ, 5. एक लाख वर्ष का समयदान-संकलन। यह पाँचों ही काम इतने भारी लगते हैं, मानो शेषनाग के सिर पर धरती का बोझ लादने वाले का अनुशासन ही प्रत्यक्ष हुआ हो। यह सभी कार्य ऐसे हैं, जिन्हें मानवीसत्ता न सोच सकती है, न उसकी योजना बना सकती है और न पूरी करने का दुस्साहस ही सँजो सकती है। ये अतिमानवी कार्य हैं, जिन्हें हमारे जैसा तुच्छ व्यक्ति अपने निज के बलबूते किसी भी प्रकार वहन एवं संपन्न नहीं कर सकता। यह परम सत्ता का कार्य है और वही बाजीगर की तरह कठपुतलियों को नचा-कुदा रही है।
अच्छा हो, इस गोवर्द्धन को मिल-जुलकर उठाया जाए। अच्छा हो, इस समुद्र-सेतु बाँधने की कड़ी में कंकड़-पत्थर ढोने मात्र से श्रेय लूटा और यशस्वी बना जाए। प्रज्ञापरिजनों के लिए इस योजना में हाथ बँटाना उनके निज के हित में है। जो खोएँगे उससे हजार गुना अधिक पाएँगे। बीज को कुछ क्षण ही गलने का कष्ट उठाना पड़ता है। इसके उपरांत तो बढ़ने, हरियाने और फूलने-फलने का आनंद-ही-आनंद है। वैभव-ही-वैभव है। स्वतंत्रता-संग्राम में जो अग्रगामी बने, वे मिनिस्टर बनने से लेकर स्वतंत्रतासेनानियों वाली पेंशन सम्मान सहित प्राप्त कर सके। यह अवसर भी ऐसा ही है, जिसमें ली हुई भागीदारी मणिमुक्तकों की खदान कौड़ी मोल खरीद लेने के समान है। जिसका श्रेय, यश और वैभव सुनिश्चित है, उसे हस्तगत करने में कृपणता बरतना अदूरदर्शिता भरी कृपणता से अधिक और कुछ नहीं हो सकता।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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