असीम पर निर्भर ससीम जीवन
“धरती पर जीवनोपयोगी परिस्थितियों का आधार जिन रासायनिक हलचलों और आणविक गतिविधियों पर निर्भर है, वे अंतरिक्ष से आने वाले रेडियो-तरंगों पर अवलंबित हैं। शक्ति के स्रोत उन्हीं में हैं। विविध विधि हलचलों की अधिष्ठात्री इन्हीं को कहना चाहिए। हमारा परिवार— हमारा शरीर— हमारा अस्तित्व सब कुछ प्रकारांतर से इन रेडियो-तरंगों पर निर्भर है, जिन्हें हम आत्मा की तरह जानते भले ही नहीं, पर निश्चित रूप से अवलंबित उन्हीं पर हैं। जीवन लगता भर अपना है, पर उसमें समाविष्ट प्राण इसी दृश्य सत्ता पर निर्भर हैं, जिन्हें विज्ञान की भाषा में ‘रेडियो तरंग पुंज’ कहते हैं।
चेतन जगत में जिस तरह ब्रह्म की सत्ता व्याप्त है, उसी तरह पदार्थों के अस्तित्व और क्रियाकलाप में इन रेडियो-तरंगों की सत्ता प्राण की तरह समाई हुई है।
यह तरंगें कहाँ से आती हैं? क्या यह धरती की अपनी संपत्ति या उपज है? इस प्रश्न का उत्तर विज्ञान इस रूप में देता है कि, “धरती के पास जो जीवन-संपदा है, वह पूरी-की-पूरी उधार ली हुई है। सूर्य की ऊर्जा धरती पर एक संतुलित मात्रा में बिखरती है। रोशनी और गरमी के रूप में उसे हम अनुभव करते हैं, अप्रत्यक्ष रूप से उसमें जीवनतत्त्व भी सम्मिलित हैं। सूर्य यदि न हो, अधिक दूर या अधिक पास हो, तो फिर पृथ्वी भी अन्य ग्रहों की तरह किसी प्राणधारी के निवास के लिए सर्वथा अनुपयुक्त बन जाएगी। सूर्य की ऊर्जा को बहुत बड़ा श्रेय इस धरती को जीवन प्रदान करने का है।”
— पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, असीम पर निर्भर ससीम जीवन, असीम पर निर्भर ससीम जीवन, पृष्ठ 91
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