शताब्दी वर्ष विशेष : सिएटल के नॉर्थशोर सीनियर सेंटर में “मानवीय उत्कर्ष” विषय पर परम आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी का प्रेरणादायी उद्बोधन
सिएटल, वाशिंगटन (अमेरिका)। जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में चल रहे उत्तर अमेरिका प्रवास के क्रम में परम आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी सिएटल शहर स्थित नॉर्थशोर सीनियर सेंटर पहुँचे। इस अवसर पर आयोजित विशेष कार्यक्रम में स्थानीय परिजनों एवं श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
कार्यक्रम के दौरान परम आदरणीय डॉ. पंड्या जी ने “मानवीय उत्कर्ष” विषय पर प्रेरणादायी उद्बोधन प्रदान किया। उन्होंने कहा कि मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मविकास, चरित्र निर्माण और समाज के कल्याण में सक्रिय योगदान देना ही सच्चे अर्थों में मानवीय उत्कर्ष है।
अपने संबोधन में उन्होंने युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि श्रेष्ठ चिंतन, उत्कृष्ट आचरण और लोकमंगल की भावना ही मनुष्य को महान बनाती है। उन्होंने उपस्थित परिजनों से आग्रह किया कि वे अपने जीवन में सकारात्मक सोच, संस्कार, सेवा और आध्यात्मिक मूल्यों को अपनाकर स्वयं के साथ-साथ समाज के विकास में भी योगदान दें।
परम आदरणीय डॉ. पंड्या जी ने यह भी कहा कि वर्तमान समय की चुनौतियों का समाधान केवल बाहरी संसाधनों से नहीं, बल्कि मानवीय चेतना के जागरण से संभव है। जब व्यक्ति अपने भीतर छिपी दिव्यता को पहचानता है और उसे समाजहित में नियोजित करता है, तभी वास्तविक प्रगति और सुख-शांति का मार्ग प्रशस्त होता है।
कार्यक्रम में उपस्थित सभी परिजनों ने उनके विचारों को अत्यंत प्रेरणादायी बताते हुए मानवता, नैतिक मूल्यों एवं सांस्कृतिक चेतना के संदेश को जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया। कार्यक्रम का वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा, आत्मीयता एवं सकारात्मक प्रेरणा से ओतप्रोत रहा।
Recent Post
शांति और सौंदर्य को अपने अंदर खोजो
उनसे प्यार करो, जिन्हें लोग पतित, गर्हित और हेय समझते हैं। जिन्हें केवल निंदा और भर्त्सना ही मिलती है। जो अपने ऊपर लदे हुए पिछड़ेपन के कारण न किसी के मित्र बन पाते हैं और न जिन्हें कोई प्यार करता ह...
समूचा ब्रह्मांड एक चैतन्य शरीर
प्रौढ़ता को प्राप्त करता हुआ विज्ञान अब उन्हीं निष्कर्षों पर पहुँच रहा है, जिन पर सदियों पूर्व भारतीय तत्त्ववेत्ता ज्योतिर्विद् पहुँच चुके थे। समूचा ब्रह्मांड एक चैतन्य शरीर है, जिसका प्रत्येक स्पं...
संवेदना की समस्या को कौन सुलझाएगा?
ज्ञान के दो पक्ष हैं— एक विचारणा, दूसरा संवेदना। विचार मस्तिष्क की देन हैं। वे बाहर से होते हैं; प्रशिक्षण एवं अनुभव के सहारे। भाव भीतर से उठते हैं। वे अंतःकरण के उत्पादन हैं। विचारों से जानक...
विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय निश्चित
अध्यात्म और विज्ञान को पिछले दिनों परस्पर विरोधी माना जाता रहा है। नवीनतम शोधें उन्हें पूरक ही नहीं, एकीभूत भी सिद्ध कर रही हैं। चेतना के क्षेत्र में वैज्ञानिक चिंतन का योग अगले दिनों शोध के नए आधा...
असीम पर निर्भर ससीम जीवन
“धरती पर जीवनोपयोगी परिस्थितियों का आधार जिन रासायनिक हलचलों और आणविक गतिविधियों पर निर्भर है, वे अंतरिक्ष से आने वाले रेडियो-तरंगों पर अवलंबित हैं। शक्ति के स्रोत उन्हीं में हैं। विविध विधि ...
धरती माँ को ओढ़ाई हरी चादर | विश्व पर्यावरण दिवस पर वृक्षारोपण अभियान
जमालपुर, 5 जून 2026।
विश्व पर्यावरण दिवस के पावन अवसर पर प्रज्ञा युवा प्रकोष्ठ, जमालपुर द्वारा महिला मंडल के सहयोग से काली पहाड़ी, छठ पूजा घाट (नहर परिसर) में एक विशाल वृक्षारोपण अभिया...
अखिल विश्व गायत्री परिवार के आवाहन पर घर घर किया गया यज्ञ
घर घर में में हम यज्ञ रचाएं, आओ भारत सबल बनाएं इसी कामना से आज बुद्ध पूर्णिमा के पावन पर्व पर अखिल विश्व गायत्री परिवार, शांतिकुंज (हरिद्वार) के दिशा निर्देश पर जनपद बलरामपुर के पचपेड़वा, गैं...
अब दर्शन की बारी है, उसे कुछ करने दिया जाए
विज्ञान का तात्पर्य— “प्रकृति के कुछ रहस्यों का उद्घाटन अथवा कुछ उपकरणों का निर्माण कर लेना मात्र नहीं है, वरन् उसकी व्यापकता मानवी दृष्टिकोण को अधिक सुविस्तृत, तथ्यपूर्ण एवं सत्यनिष्ठ ...
धर्म और दर्शन की उत्क्रांति भी आवश्यक
भावी पीढ़ी को मानसिक दिग्भ्रांति से बचाने के लिए यह प्रश्न सुलझाना आवश्यक है। धर्म के गिरते हुए मूल्य को देखकर ऐसा लगता है कि कहीं आने वाली पीढ़ियाँ पूर्णतया पदार्थवादी होकर अपनी आध्यात्मिक शक्तिया...
धर्म और विज्ञान जुड़वाँ भाई
पिछले दिनों धर्म और विज्ञान को विरोधी माना जाता रहा है। दोनों के तर्क, प्रतिपादन और आधार एकदूसरे से भिन्न समझे जाते रहे हैं। एक को प्रत्यक्षवादी और दूसरे को परोक्षवादी कहकर उन्हें असंबद्ध कहा जाता ...

