गायत्सेंरी धाम सेंधवा में गायत्री कॉरिडोर एवं सुरभि द्वार के लोकार्पण
भारत के उज्ज्वल भविष्य के लिए अनेकों पुण्यात्माओं का आशीर्वाद है - आदरणीय डॉ चिन्मय पंड्या
|| गायत्री धाम, सेंधवा, बड़वानी|| निमाड़ के गायत्री धाम सेंधवा में आयोजित गायत्री कॉरिडोर एवं सुरभि द्वार के लोकार्पण के अवसर पर देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति आदरणीय डॉ चिन्मय पंड्या जी दिनांक 7 अप्रैल 2024 को पहुंचे। हरे भरे वृक्षों से आच्छादित परिसर में प्रखर प्रज्ञा सजल श्रद्धा को शीश नवाकर माता सुरभी की समाधि को प्रणाम कर गायत्री धाम के दिव्य परिसर में उपस्थित हजारों साधकों को उन्होंने भावभरा मार्गदर्शन प्रदान किया। इस अवसर पर अनेकों ऐसे उद्धरणों का चिंतन हुआ जिनमें भारतीय संस्कृति की गौरव-गाथा मुखरित होती है। गुरुदेव के ज्ञान-चिंतन को, उनकी भगीरथ तपस्या के पुरुषार्थ को तथा महामानवों को गढ़ने के उनके सुस्वप्न को चरितार्थ करने में यदि कोई समर्थ है तो वह गायत्री मंत्र की शक्ति ही है जिसके बल पर आज यह गायत्री परिवार खड़ा हुआ है। हम अपने जीवन के सौभाग्य को सराहें। भारत के उज्ज्वल भविष्य के लिए अनेकों पुण्यात्माओं का आशीर्वाद है जिन्होंने संस्कृति की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। यह कॉरिडोर उन सांस्कृतिक पदचिन्हों में शामिल हो जिनके बलबूते सदा-सदा के लिए भारत माता गर्वित एवं उमंगित हो उठे।
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अब दर्शन की बारी है, उसे कुछ करने दिया जाए
विज्ञान का तात्पर्य— “प्रकृति के कुछ रहस्यों का उद्घाटन अथवा कुछ उपकरणों का निर्माण कर लेना मात्र नहीं है, वरन् उसकी व्यापकता मानवी दृष्टिकोण को अधिक सुविस्तृत, तथ्यपूर्ण एवं सत्यनिष्ठ ...
धर्म और दर्शन की उत्क्रांति भी आवश्यक
भावी पीढ़ी को मानसिक दिग्भ्रांति से बचाने के लिए यह प्रश्न सुलझाना आवश्यक है। धर्म के गिरते हुए मूल्य को देखकर ऐसा लगता है कि कहीं आने वाली पीढ़ियाँ पूर्णतया पदार्थवादी होकर अपनी आध्यात्मिक शक्तिया...
धर्म और विज्ञान जुड़वाँ भाई
पिछले दिनों धर्म और विज्ञान को विरोधी माना जाता रहा है। दोनों के तर्क, प्रतिपादन और आधार एकदूसरे से भिन्न समझे जाते रहे हैं। एक को प्रत्यक्षवादी और दूसरे को परोक्षवादी कहकर उन्हें असंबद्ध कहा जाता ...
विज्ञान और धर्म में समन्वय अनिवार्य
पदार्थ के रूप में विज्ञान भी आंतरिक सत्ता का ही तो उद्घाटन करता है। धर्म के क्षेत्र में परमात्मा एक विश्वव्यापक शक्ति है और पदार्थ भी शक्ति के ही कण हैं। सच तो यह है कि शक्ति के अतिरिक्त संसार में ...
धर्म की उपेक्षा से पछतावा ही हाथ लगेगा
जीवन उतना जटिल नहीं है, जितना कि बन गया है या बना दिया गया है। हँसी-खुशी की संभावनाओं से वह भरा-पूरा है। शरीर और मन की संरचना इस प्रकार हुई है कि वह बाहर के तनिक से साधनों की सुविधा प्राप्त हो जाने...
धर्म और विज्ञान को मिलकर चलना होगा
धर्म को पूजा-प्रक्रिया तक और विज्ञान को शिल्प व्यवसाय तक सीमित रखा जाए, तो दोनों की गरिमा बढ़ेगी नहीं, गिरेगी ही। दोनों अपंग-अधूरे रह जाएँगे। इन दोनों का परस्पर पूरक होकर रहना उचित ही नहीं, आवश्यक ...
धर्म और विज्ञान के समन्वय में ही कल्याण है
नर और नारी का कार्यक्षेत्र भिन्न है। नारी गृह-व्यवस्था में संलग्न रहती है। गर्भधारण और शिशुपालन यह दोनों काम उसी को करने होते हैं। नर का कार्यक्षेत्र भिन्न है। वह खेत, दफ्तर, कारखाने आदि में ...
ज्ञान ही नहीं, मनुष्य को धर्म भी चाहिए
आत्मा है या नहीं? इसका उत्तर हाँ और ना में दोनों ही तरह दिया जा सकता है। हाँ, उनके लिए ठीक है, जो ज्ञान के आधार पर सूक्ष्म विषयों पर विचार कर सकने और निष्कर्ष निकाल सकने में समर्थ हैं। ना, उनके लिए...
बुद्धि पर धर्म का अंकुश रखा जाए
चेतना के क्षेत्र में मन और बुद्धि का एक क्षेत्र है और श्रद्धा एवं सुसंस्कारिता का दूसरा। मन भौतिक साधनों के सहारे इंद्रियतृप्ति तथा अहंता की पूर्ति चाहता है। अर्थसंचय तथा बड़प्पन प्रदर्शित करने वाल...
विज्ञान और अध्यात्म को साथ-साथ चलना होगा
विज्ञान और अध्यात्म अन्योन्याश्रित हैं। एकदूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरे की गति नहीं। विज्ञान हमारे साधनों को बढ़ाता है और अध्यात्म आत्मा को। आत्मा को खोकर साधनों की मात्रा कितनी ही बढ़ी-चढ़ी ...
