शान्तिकुञ्ज में डॉ. चिन्मय जी का अभिनंदन
माननीय डॉ. चिन्मय पण्ड्या जी श्रद्धेया जीजी से आशीर्वाद लेते हुए और कार्यकर्त्ताओं का अभिनंदन स्वीकार करते हुए
विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति माननीय डॉ. चिन्मय पण्ड्या जी का शान्तिकुञ्ज परिवार ने अत्यंत भावभरा स्वागत किया। श्रद्धेय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी, श्रद्धेया शैल जीजी ने उनका मंगल तिलक कर पुष्पहार पहनाया। शान्तिकुञ्ज के व्यवस्थापक आदरणीय श्री महेन्द्र शर्मा जी, पूर्व व्यवस्थापक श्री शिवप्रसाद मिश्रा जी, श्री हरीश ठक्कर जी तथा शान्तिकुञ्ज के लगभग सभी विभाग प्रमुखों ने उन्हें पुष्पों की माला पहनाकर अपनी अनुभूतियाँ कृतज्ञता व्यक्त की, शुभकामनाएँ दीं। एक ऐतिहासिक उपलब्घि इस अवसर पर आदरणीय डॉ. चिन्मय पण्ड्या जी ने अपने हृदय के उद्गार व्यक्त किए। उन्होंने सहज स्वभाव के साथ कहा कि गर्व तो इस बात पर होता है कि उन मंचों पर परम पूज्य गुरूदेव और गायत्री परिवार की बात पहुँच रही है, जिन मंचों पर भारतीय प्रतिनिधित्व दुर्लभ आदरणीय डॉ. हुआ करता था। हिरोशिमा, जहाँ बम गिरने के बाद से अब तक कोई बड़ा कार्यक्रम हुआ ही नहीं, उस स्थान पर परम पूज्य गुरूदेव की मेरे अकेले की नहीं, आवाज गूँजना एक ऐतिहासिक घटना है। प यूनाइटेड नेशन के चार्टर में परम पूज्य गुरूदेव का नाम आना बहुत बड़ी उपलब्धि है। हिन्दू धर्म के प्रतिनिधित्व के लिए गायत्री परिवार को चुना जाना गौरव की बात है।
अनुभूतियाँ
सन् 1945 में जिस स्थान पर बम गिरा था, उस
स्थान पर खड़े होने मात्र से रोमांच हो जाता है।
हम वहाँ म्यूजियम में गए तो यह सोचकर आँखों
जल कर मरे होंगे। उस समय वहाँ पानी सूख गया
था, आसपास की आठ नदियाँ सूख गई थीं।
हर कार्यकर्त्ता का सम्मान है
आदरणीय डॉ. चिन्मय जी ने कहा कि यह सम्मान परम पूज्य गुरूदेव एवं परम
वंदनीया माताजी का ही आशीर्वाद है। यह मेरे अकेले की नहीं, अखिल विश्व गायत्री
परिवार के प्रत्येक कार्यकर्त्ता की उपलब्धि जो मिशन के लिए पूरी तरह से समर्पित
हैं। मेरा सौभाग्य है कि मुझे इसका निमित्त बनने का अवसर मिला।
जापानियों के साहस को सराहा
लोगों ने भविष्यवाणी की थी कि आने वाले हजारों वर्षों में हिरोशिमा में कोई परिंदा पर
नहीं मारेगा, लेकिन जापानियों का साहस देखने योग्य है। उन्होंने आज वहाँ 10 लाख
लोगों की आबादी वाला शहर बसा दिया है। उस स्थान को देखकर लगता ही नहीं कि
कभी यहाँ परमाणु बम गिरा होगा।
Recent Post
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 157):आत्मीयजनों से अनुरोध एवं उन्हें आश्वासन
कहने को गायत्री परिवार, प्रज्ञा परिवार आदि नाम रखे गए हैं और उनकी सदस्यता का रजिस्टर तथा समयदान-अंशदान का अनुबंध भी है, पर वास्तविकता दूसरी ही है, जिसे हम सब भली भाँति अनुभव भी करते हैं। वह है&mdas...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 156):आत्मीयजनों से अनुरोध एवं उन्हें आश्वासन
साधना से उपलब्ध अतिरिक्त सामर्थ्य को विश्व के मूर्द्धन्य वर्गों को हिलाने-उलटने में लगाने का हमारा मन है। अच्छा होता सुई और धागे को आपस में पिरो देने वाले कोई सूत्र मिल जाते; अन्यथा सर्वथा अपरिचित ...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 155):तीन संकल्पों की महान् पूर्णाहुति
हमने जैसा कि इस पुस्तक में समय-समय पर संकेत किया है। जैसे हमारे बॉस के आदेश मिलते रहे हैं, वैसे ही हमारे संकल्प बनते, पकते व फलित होते गए हैं। सन् 1986 वर्ष का उत्तरार्द्ध हमारे जीवन का महत्त्वपूर्...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 154): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
परिवर्तन और निर्माण दोनों ही कष्टसाध्य हैं। भ्रूण जब शिशुरूप में धरती पर आता है, तो प्रसवपीड़ा के साथ होने वाला खून-खच्चर दिल दहला देता है। प्रस्तुत परिस्थितियों के दृश्य और अदृश्य दोनों ही पक्ष ऐसे...
विशिष्ट सामायिक चिंतन: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई.) एवं शिक्षा
आज जीवन के हर क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थात ए०आई० (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का बोलबाला है। ए०आई० समाचार की सुर्खियों से आगे जीवन के हर पक्ष का हिस्सा बनती जा रही है। स्वास्थ्य, कृषि, बैंकिं...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 153): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
कार्यक्रमों में प्रचारात्मक, रचनात्मक और सुधारात्मक अनेक कार्य हैं, जिन्हें घर से बाहर रहते हुए परिस्थितियों के अनुरूप कार्यान्वित किया जा सकता है। प्रचारात्मक स्तर के कार्य— 1. झोला पुस्तकाल...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 152): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
माना कि आज स्वार्थपरता, संकीर्णता और क्षुद्रता ने मनुष्य को बुरी तरह घेर रखा है, तो भी इस धरती को वीर विहीन नहीं कहा जा सकता। 60 लाख साधु-बाबा यदि धर्म के नाम पर घर-बार छोड़कर मारे-मारे फिर सकते हैं...
विज्ञान को शैतान बनने से रोकें:अनियंत्रित प्रगति अर्थात महामरण की तैयारी
सामान्य व्यक्ति का मस्तिष्क विकृत हो तो वह थोड़े ही व्यक्तियों का अहित कर सकता है। उसी तरह की दुर्बुद्धि वाले लोगों का एक समूह निकल पड़े, तो हानि की सँभावनाएँ निश्चित बढ़ती हैं। किंतु यदि यही रोग र...
होली
होली विशेषांक— 4
पुराणकालीन, आदर्शसत्याग्रही, भक्त प्रह्लाद के दमन के लिए हिरण्यकश्यप के छल-प्रपंच सफल न हो सके। उसे भस्म करने के प्रयास में होलिका जल मरी और प्रहलाद तपे कंचन बन गए। ख...
अपनों से अपनी बात- होली का संदेश
होली विशेषांक— 3
मातृभूमि की धूलि मस्तक पर लगाकर देशभक्ति की प्रतिज्ञा लेने का महापर्व है— होली। यह असमानता के अभिशाप को जला देने का पर्व भी है। यह पर्व यह संदेश देता है कि आर्थिक...
