नवरात्रि अनुशासन
उपवास का तत्वज्ञान आहार शुद्धि से सम्बन्धित है, “जैसा खाये अन्न वैसा बने मन” वाली बात आध्यात्मिक प्रगति के लिए विशेष रुप से आवश्यक समझी गई हैं। इसके लिए न केवल फल, शाक, दूध जैसे सुपाच्य पदार्थो को प्रमुखता देनी होगी, वरन् मात्र चटोरेपन की पूर्ति करने वाली मसाले तथा खटाई, मिठाई, चिकनाइ्र की भरमार से भी परहेज करना होगा। यही कारण है कि उपवासों से भी परहेज करना होगा। यही कारण हैं कि उपवासों की एक धारा, ‘अस्वाद व्रत’ भी हैं।
साधक सात्विक आहार करें और चटोरेपन के कारण अधिक खा जाने वाली आदत से बचें, यह शरीरगत उपवास हुआ। मनोगत यह है कि आहार को प्रसाद एवं औषधि की तरह श्रद्धा भावना से ग्रहण किय जाए और उसकी अधिक मात्रा से अधिक बल मिलने वालों की प्रचलित मान्यता से पीछो छुड़ाया जाए। वस्तुतः आम आदमी जितना खाता है उससे आधे में उसका शारीरिक एवं मानसिक परिपोषण भली प्रकार हो सकता हैं। एक तत्व ज्ञानी का यह कथन अक्षरशः सत्य है कि “आधा भोजन हम खाते हैं और शेष आधा हमें खाता रहता हैं।” लुकमान कहते थे कि-”हम रोटी नहीं खाते-रोटी हमें खाती है।” इन उक्तियों में संकेत इतना ही है कि शारीरिक और मानसिक स्वस्थ्य का महत्व समझने वालों को सर्वभक्षी नहीं स्वल्पाहारी होना चाहिए। नवरात्रि उपवास में इस आदर्श को जीवन भर अपनाने का संकेत हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से पौष्टिक एवं सात्विक आहार वह है जो ईमानदारी और मेहनत के साथ कमाया गया है। उपवास का अपना तत्वज्ञान है। उसमें सात्विक खाँद्यों का कम मात्रा में लेना ही नहीं, न्यायोपार्जित होने की बात भी सम्मिलित है। इतना ही नहीं उसी सिलसिले में एक और बात भी आती है कि इस प्रकार आत्म संयम बरतने से जा बचत होती है उसका उपयोग परमार्थ प्रयोजनों में होना चाहिए न कि संचय करके अमीर बनने में। यहीं कारण हैं कि जहाँ नवरात्रि अनुष्ठानों मं उपवास करकें जो कुछ बचाया जाता हैं उसे पूर्णाहुति के अन्तिम दिन ब्रह्मभोज में खर्च कर दिया जाता है।
ब्रह्मभोज अर्थात् सत्कर्मो का परिपोषण। प्राचीन काल में एक वर्ग ही इस प्रयोजन में रहता था, अस्तु उसका निर्वाह एवं अपनाई हुई प्रवृत्तियों का व्यवस्थाक्रम मिलाकर जो आवश्यकता बनती हैं उसकी पूर्ति को ब्रह्मभोज कहा जाता था। इस प्रयोजन के लिए दी गई राशि को दान या दक्षिणा भी कहा जाता था। नवरात्रि अनुष्ठान की पूर्णता यज्ञायोजन तथा ब्रह्मभोज के साथ सम्पन्न होती है। इसका कारण तलाश करने पर उपवास का रहस्य विज्ञान और विस्तार समझ में आता हैं।
~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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