आत्मबल का अर्थ
अखण्ड ज्योति ने अपनी प्रिय परिजनों को सदा से यह कहा है- लोग बड़े निकम्मे हैं- लोक-प्रवाह पतन और नरक की दिशा में बह रहा है। तुम इनके साथ मत चलो-इनके प्रवाह में मत बहो- इनकी सलाह मत मानो अन्यथा इनके साथ-साथ तुम भी उस गर्त में औंधे मुँह गिरोगे जिसमें से उबरना अति कठिन है। लोग प्रशंसा करें तो समझना तुम किसी निन्दनीय आधार को पकड़े खड़े हो। लोग उपहास उड़ायें तो समझना, तुमने विवेकशीलता का परिचय देना आरम्भ कर दिया। मछली जल की धारा चीरकर उलटी चलने का साहस करती है तुम लोक-प्रवाह से-उलटे वही। अपना आदर्श उपस्थित करो और प्रकाश स्तम्भ बनो। माया और भ्रांति का सबसे बड़ा लक्षण ग्रह है कि मनुष्य लोगों का मुँह तके- उनसे प्रशंसा सुनने की आशा करे। लोगों ने कभी किसी को अच्छी सलाह नहीं दी। किसी के स्वजन सम्बन्धी कदाचित ही किसी को महान बनने का परामर्श देते हों। उनको बड़प्पन पसन्द है, भले ही वह कितने ही अवाँछनीय तरीकों से उपार्जित क्यों न किया गया हो जिसे ‘महान’ बनना है उसे पहला कदम यहाँ से उठाना पड़ेगा कि अपनी अन्तरात्मा को-अपने भगवान को और आदर्शवादी परम्पराओं के परामर्श को पर्याप्त मानें। जहाँ यह तीनों मिल सकें वहाँ फिर लोगों की सलाह को सर्वथा उपेक्षित करने का साहस सँजोलें। इन दिनों इससे कम में कोई सच्चा आध्यात्मवादी नहीं बन सकता। आत्मबल का अर्थ है- दिव्य प्रयोजनों के लिए बढ़ चलने के समस्त अवरोधों को कुचल सकने वाला प्रचण्ड शौर्य और अटूट साहस। हमें आत्मबल सलाह करना चाहिए और देव-मानव की भूमिका सम्पादित करने के लिए आगे बढ़ना चाहिए।
प्रसन्नता की बात है कि विचारशील वर्ग द्वारा सैद्धान्तिक रूप से इसे सही माना गया। प्रतिपादन की यथार्थता को सराहा गया। इस पसन्दगी और समर्थन का ही प्रभाव है कि अखण्ड ज्योति इतनी बड़ी संख्या में लोकप्रिय हो सकी और उसकी अनुवाद रूप में अँग्रेजी, गुजराती, मराठी, उड़िया आदि भाषाओं में दूसरी पत्रिकाएँ, प्रकाशित करनी पड़ी। लाखों व्यक्ति अपने को युग-निर्माण मिशन का अनुयायी कहने लगे।
सफलता का प्रथम चरण समर्थन के रूप में सामने आया यह सन्तोष की बात है, पर इससे कुछ अधिक प्रयोजन सिद्ध न होगा। बात तब बनेगी जब लोग उस राह पर चलना आरम्भ करें। कुछ आध्यात्मवादी आगे आयें और बतायें कि इस क्षेत्र में प्रवेश करने वाले देव मानव आखिर होते कैसे है। इस जीवन्त प्रतिभाओं के दर्शन करके ही लोग गहरी प्रेरणा प्राप्त करेंगे और उनके सान्निध्य में आकर अपने को उस साँचे में ढालने का प्रयत्न करेंगे। समर्थन को साकार होने के लिए आवश्यक है कि उस महान आदर्श को लोग अपने व्यवहार में उतारें और प्रेरणा की प्रत्यक्ष प्रतिमा बनकर दूसरों को अनुगमन का साहस प्रदान करें।
स्वजनों ने इस दिशा में कुछ-कुछ साहस भी किया है। न किया होता तो इतना बड़ा संगठन और उसकी उत्साहवर्धक गतिविधियाँ कैसे चल सकी होती। यदाकदा थोड़ा समय और थोड़ा पैसा खर्च कर देने से भी बूँद-बूँद घट भरता है और उस सम्मिलित प्रयास के फलस्वरूप कुछ न कुछ हलचल पैदा होती है। अभी उतना ही होता रहा है। ऐसे साहसी लोग उँगलियों गिनने जितने ही आगे आये हैं और अपने को लोभ, मोह की गहरी दलदल में से निकाल कर अपनी आन्तरिक विभूतियों और भौतिक सम्पत्तियों का इतना अंश आदर्श निष्ठा के लिए समर्पित कर सके जिससे उनकी साहसिकता सिद्ध होती है - जिसे देखकर दूसरों में अनुगमन की प्रेरणा दे सकने वाला प्रकाश उत्पन्न हो सके।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति, फरवरी 1975
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