भावनाएँ भक्तिमार्ग में नियोजित की जायें
भावनाओं की शक्ति भाप की तरह हैं यदि उसका सदुपयोग कर लिया जाय तो विशालकाय इंजन चल सकते हैं पर यदि उसे ऐसे ही खुला छोड़ दिया जाय तो वह बर्बाद ही होगी किसी के काम न आ सकेगी। भावनाओं में भक्ति का स्थान बहुत ऊँचा है। उसका सहारा लेकर मनुष्य नर से नारायण बन सकता है। किन्तु यदि उसे एक कल्पना-आवेश मात्र मन बहलाव रहने दिया जाय तो उससे किसी का कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा। रविशंकर महाराज ने आज के भक्तों की तीन रोगों से ग्रसित गिनाया है (गाना) (2) रोना (3) दिखावा।
भजन कीर्तन के नाम पर दिन-रात झाँझ बजती और हल्ला होता है। गाना वही सार्थक है जो विवेक पूर्वक गाया जाय जिसमें प्रेरणा हो और उसे हृदयंगम करने का लक्ष्य सामने रखा गया हो। जहाँ केवल कोलाहल कही उद्देश्य हो वहाँ, भक्ति का प्रकाश कैसे उत्पन्न होगा।
रोना-अर्थात् संसार को शोक-संताप से भरा भव सागर मानना। इस दुनिया से छुटकारा पाकर-किसी अन्य लोक में जा बसने की कल्पना, अपने आपसे भागने के बराबर है। भगवान के सुरम्य उद्यान का सौंदर्य निहार कर आनंद विभोर होने की भक्ति-भावना यदि विश्व के कण-कण में संव्याप्त भगवान को देखने की अपेक्षा सर्वत्र दुःख और पाप ही देखें तो इसे बुद्धि विपर्यय ही कहा जायेगा। भक्ति भाव नहीं। पलायन नहीं-भक्ति का तात्पर्य दुखों का निराकरण एवं दुखियों की सहायता करना है। जहाँ। केवल घृणा का विषाद छाया रहे वहाँ भक्ति की आत्मा जीवित कैसे रहेगी। अपने को आर्त और दुखी के रूप में प्रस्तुत करने वाला इस कुरूप चित्रण से अपने सृष्टा को ही अपमानित करता है।
धर्म का आडम्बर अब इतना अधिक बढ़ता चला जा रहा है कि कई बार तो यह भ्रम होने लगता है कि हम धर्मयुग में रह रहे हैं। कथा, कीर्तन, प्रवचन, सत्संग, पारायण, लीला, सम्मेलन आदि के माध्यम से जगह-जगह विशालकाय आयोजन होते हैं और उनमें एकत्रित विशाल भीड़ को देखने से प्रतीत होता है कि धर्म रुचि आकाश छूने जा रही है, पर जब गहराई में उतर कर देखते हैं तो लगता है कि यह धर्म दिखावा बहुत से लोग अपनी आंतरिक अधार्मिकता को झुठला कर आत्म प्रवंचना करने के लिए अथवा लोगों की दृष्टि में धार्मिक बनने के लिए रच कर खड़ा करते हैं। यह आवरण इसलिए खड़े किये जाते हैं ताकि उनकी यथार्थता पर पर्दा पड़ा रहे और लोग उन्हें उस ऊँचे स्तर का समझते रहे जिस पर कि वे वस्तुतः नहीं हैं।
कुछ लोग वस्तुतः इन आयोजनों को सद्भावना के साथ सदृश्य के लिए भी करते हैं पर वे यह भूल जाते हैं कि धर्म आवरण का आरंभिक प्रयाग भक्ति-भावना लाभ तो मिलेगा जब आस्थाओं और क्रिया-कलापों में उच्च स्तरीय परिवर्तन संभव हो। इस कार्य के लिए उपयुक्त पथ प्रदर्शक वे हो सकते हैं जिनने अपने को मन, वचन, कर्म से सच्चा भक्त बनने में सफलता प्राप्त की हो और इस श्रेय पथ में प्रगति का प्रकाश वे ही पा सकते हैं जिन्होंने आवरण से आगे बढ़कर अपने आपको सुधारने सँभालने के लिए उत्कट प्रयास किया हो।
भावनाओं की शक्ति की भक्ति मार्ग में यदि नियोजन किया जा सके तो मनुष्य इतनी प्रगति कर सकता है जिससे उसकी अपूर्णता, चरम पूर्णता में परिणत हो सके।
अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 2
पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)
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