सात्विक दान
सात्विक प्रवृत्ति वाला आत्मज्ञ सात्विक दान को जीवन में उपयुक्त स्थान देता है। यदि सच कहा जाय तो अखिल विश्व की समस्त गतिविधि दान के सतोगुण नियम के आधार पर चल रही हैं। परमेश्वर ने कुछ ऐसा क्रम रखा है कि पहले बोयो तब काटो। जो कोई भी तत्त्व अपने दान की प्रक्रिया बन्द कर देता है, वही नष्ट हो जाता है, विकृत एवं कुरूप हो जीवन युद्ध में धराशायी हो जाता है। संसार की किसी भी जड़ चेतन यहाँ तक कि मन्द बुद्धि पशु जाति तक देखिए। सर्वत्र दान का अखण्ड नियम कार्य कर रहा है। यदि कुएँ जल दान देना बन्द कर दें, खेत अन्न देना रोक दे, पेड़-फल, पत्तियाँ, छाल देना बन्द कर दें, हवा, जल, धूप, गाय, भैंस इत्यादि पशु अपनी सेवाएँ रोक दें, तो समस्त सृष्टि का संचालन बन्द समझिये। माता-पिता बालक का ठीक पालन करना बन्द कर दें, तो चेतन जीवों का बीज ही मिट जायेगा और सबसे बड़ा दानी परमेश्वर तो हर पल, हर घड़ी हमें कुछ न कुछ प्रदान करता रहता है। उसकी रचना में दान तत्त्व प्रमुख है।
दान का अभिप्राय क्या है? यह है संकीर्णता से छुटकारा आत्म संयम का अभ्यास एवं दूसरों की सहायता भावना की उत्तेजना। दान करते समय हमारे मन में यश प्राप्ति की इच्छा, फल की आशा या अहंकार की भावना नहीं होनी चाहिए। दान तो प्रसन्नता, सुख और सन्तोष का दाता है। दान करना स्वयं में एक आनन्द है। देते समय जो सन्तोष की उच्च सात्विक दृष्टि अन्तःकरण में उठती है, वह इतनी महान् है कि कोई भी भौतिक सुख उसकी तुलना नहीं कर सकता।
पैसा, धन तथा वस्तुएँ सबके काम में आनी चाहिए। यदि आपके पास व्यर्थ पड़ा है, तो उन्हें मुक्त कण्ठ से दूसरे को दीजिए। पैसे की, रुपये की बुरी तरह चौकीदारी करने वाला कंजूस दान के स्वर्गीय आत्म-सुख का रसास्वादन करने से वंचित रहता है। जो मुक्त हृदय से देता है, वह वास्तविक आत्मवादी है। जो दान करता है, वह मानव के हृदय में रहने वाले एक सात्विक प्रवाह की रक्षा करता है, स्वार्थों को मारता है और तुच्छ संकीर्णता से ऊपर उठता है।
आत्मा की संकीर्णता छोड़िये। यदि आप दूसरों को देंगे, तो परमात्मा आपको और देगा। किन्तु यदि आप कंजूसी करेंगे, तो आपको मिलना बन्द हो जायेगा। जो उदार है, दानी है, सत्कर्मों में अपनी सामर्थ्य भर देता है वास्तव में वही बुद्धिमान है तथा बुद्धिमानों के ही पास दैवी सम्पदाएँ रहती हैं। देश, काल, पात्र का विचार करके केवल कर्तव्य बुद्धि से द्रव्य अथवा आवश्यक वस्तु का दान करना श्रेयस्कर है।
मनुष्य एकत्रित किए हुए धन की सदुपयोग करने का अच्छे से अच्छा समय तथा मार्ग यही है कि वह अपने जीवन-काल में ही प्रतिदिन उसका परोपकार (दान) में सदुपयोग करे। ऐसा करने से उसका जीवन अधिक उन्नत और विकसित होगा। एक समय ऐसा आयेगा, जब धन का ढेर छोड़कर मरने वाले की पीछे से निन्दा होगी। आशय यह है कि परोपकार का पुण्यकार्य भविष्य की पीढ़ियों तथा दृष्टियों को सौंप जाने की अपेक्षा जीते जी अपने हाथ से कर जाने में ही धन का अधिक सदुपयोग होता है। सात्विक दान ही परमगति को देने वाला मुक्ति स्वरूप साधन है। दान से त्याग, बलिदान एवं वैराग्य की त्रिविध भवभय नाशिनी अलौकिक सुधा धारा उत्पन्न होकर हमें जगत का वास्तविक स्वरूप प्रदान करती है। ऐसा दानी व्यक्ति जगत के समस्त कर्म करते हुए भी अहंकार, स्वार्थ, मोह, माया से मुक्त रहता है। पाप तापों की कोई शक्ति नहीं जो उसे विचलित कर सकें।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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