हमारी वसीयत और विरासत (भाग 122): तपश्चर्या आत्मशक्ति के उद्भव हेतु अनिवार्य
अरविंद ने विलायत से लौटते ही अँगरेजों को भगाने के लिए जो उपाय संभव थे, वे सभी किए। पर बात बनती न दिखाई पड़ी। राजाओं को संगठित करके, विद्यार्थियों की सेना बनाकर, वनपार्टी गठित करके उनने देख लिया कि इतनी सशक्त सरकार के सामने यह छुट-फुट प्रयत्न सफल न हो सकेंगे। इसके लिए समान स्तर की सामर्थ्य, टक्कर लेने के लिए चाहिए। गांधी जी के सत्याग्रह जैसा समय उन दिनों संभव नहीं था। ऐसी दशा में उनने आत्मशक्ति उत्पन्न करने और उसके द्वारा वातावरण गरम करने का काम हाथ में लिया। अँगरेजों की पकड़ से अलग हटकर वे पांडिचेरी चले गए और एकांतवास— मौन साधना सहित विशिष्ट तप करने लगे।
लोगों की दृष्टि में वह पलायनवाद भी हो सकता था, पर वस्तुतः वैसा था नहीं। सूक्ष्मदर्शियों के अनुसार उसके द्वारा अदृश्य स्तर की प्रचंड ऊर्जा उत्पन्न हुई। वातावरण गरम हुआ और एक ही समय में देश के अंदर इतने महापुरुष उत्पन्न हुए, जिसकी इतिहास में अन्यत्र कहीं भी तुलना नहीं मिलती। राजनैतिक नेता कहीं भी उत्पन्न हो सकते हैं और कोई भी हो सकते हैं, किंतु महापुरुष हर दृष्टि से उच्चस्तरीय होते हैं। जिनका व्यक्तित्व कहीं अधिक ऊँचा होता है, इसलिए जनमानस को उल्लसित-आंदोलित करने की क्षमता भी उन्हीं में होती है। दो हजार वर्ष की गुलामी में बहुत कुछ गँवा बैठने वाले देश को ऐसे ही कर्णधारों की आवश्यकता थी। वे एक नहीं, अनेकों एक ही समय में उत्पन्न हुए। प्रचंड ग्रीष्म में उठते चक्रवातों की तरह। फलतः अरविंद का वह संकल्प कालांतर में ठीक प्रकार संपन्न हुआ, जिसे वे अन्य उपायों से पूरा कर सकने में समर्थ नहीं हो पा रहे थे।
अध्यात्म विज्ञान के इतिहास में उच्चस्तरीय उपलब्धियों के लिए तप-साधना एकमात्र विधान-उपचार है। वह सुविधा भरी— विलासी रीति-नीति अपनाकर संपादित नहीं की जा सकती। एकाग्रता और एकात्मता संपादित करने के लिए बहुमुखी बाह्योपचारों में— प्रचार प्रयोजनों में भी निरत नहीं रहा जा सकता है। उससे शक्तियाँ बिखरती हैं। फलतः केंद्रीकरण का वह प्रयोजन पूरा नहीं होता, जो सूर्य-किरणों को आतिशी शीशे पर केंद्रित करने की तरह अग्नि-उत्पादन जैसी प्रचंडता उत्पन्न कर सके। अठारह पुराण लिखते समय व्यास उत्तराखंड की गुफाओं में वसुधारा शिखर के पास चले गए। साथ में लेखन-कार्य की सहायता करने के लिए गणेश जी इस शर्त पर रहे कि एक शब्द भी बोले बिना सर्वथा मौन रहेंगे। इतना महत्त्वपूर्ण कार्य इससे कम में संभव नहीं हो सकता था।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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