हमारी वसीयत और विरासत (भाग 92): शान्तिकुञ्ज में गायत्री तीर्थ की स्थापना
देश की सभी भाषाओं और सभी मत-मतांतरों को पढ़ाने और उनके माध्यम से हर क्षेत्र में कार्यकर्त्ता तैयार करने के लिए एक अलग भाषा एवं धर्मविद्यालय शान्तिकुञ्ज में ही इसी वर्ष बनकर तैयार हुआ है और ठीक तरह चल पड़ा है।
उपरोक्त कार्यक्रमों को लेकर जो भी कार्यकर्त्ता देशव्यापी दौरा करते हैं, वे मिशन के प्रायः 10 लाख कार्यकर्त्ताओं में उन क्षेत्रों में प्रेरणाएँ भरने का काम करते हैं, जहाँ वे जाते हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, मध्यप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात एवं उड़ीसा, इन क्षेत्रों में संगठन पूरी तरह सुव्यवस्थित हो गया है। अब देश का जो भाग प्रचार-क्षेत्र में भाषा व्यवधान के कारण सम्मिलित करना नहीं बन पड़ा है, उन्हें भी एकाध वर्ष में पूरी कर लेने की योजना है।
प्रवासी भारतीय प्रायः 74 देशों में बिखरे हुए हैं। उनकी संख्या भी तीन करोड़ के करीब हैं। उन तक व अन्य देशवासियों तक मिशन के विचारों को फैलाने की योजना बड़ी सफलतापूर्वक आरंभ हुई है। आगे चलकर कई सुयोग्य कार्यकर्त्ताओं के माध्यम से कई राष्ट्रों में प्रज्ञा आलोक पहुँचाना संभव बन पड़ेगा। कदाचित् ही कोई देश अब ऐसा शेष रहा हो, जहाँ प्रवासी भारतीय रहते हों और मिशन का संगठन न बना हो।
ऊपर की पंक्तियों में ऋषियों की कार्यपद्धति को जहाँ, जिस प्रकार व्यापक बनाना संभव हुआ है, वहाँ उसके लिए प्रायः एक हजार आत्मदानी कार्यकर्त्ता निरंतर कार्यरत रहकर काम कर रहे हैं। इसके लिए ऋषि जमदग्नि का गुरुकुल— आरण्यक यहाँ नियमित रूप से चलता है।
चरक-परंपरा का पुनरुद्धार किया गया है। दुर्लभ जड़ी-बूटियों का शान्तिकुञ्ज में उद्यान लगाया गया है और उनमें हजारों वर्षों में क्या अंतर आया है, यह बहुमूल्य मशीनों से जाँच-पड़ताल की जा रही है। एक औषधि का एक बार में प्रयोग करने की एक विशिष्ट पद्धति यहाँ क्रियान्वित की जा रही है, जो अत्यधिक सफल हुई है।
युगशिल्पी विद्यालय के माध्यम से सुगम संगीत की शिक्षा हजारों व्यक्ति प्राप्त कर चुके हैं और अपने-अपने यहाँ ढपली जैसे छोटे-से माध्यम द्वारा संगीत विद्यालय चलाकर युगगायक तैयार कर रहे हैं।
पृथ्वी अंतर्ग्रही वातावरण से प्रभावित होती है। उसकी जानकारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। हर पाँच हजार वर्ष पीछे ज्योतिष गणित को सुधारने की आवश्यकता होती है। आर्यभट्ट की इस विधा को नूतन जीवन प्रदान करने के लिए प्राचीनकाल के उपकरणों वाली समग्र वेधशाला विनिर्मित की गई हैं और नेपच्यून, प्लेटो, यूरेनस ग्रहों के वेध समेत हर वर्ष दृश्य गणित पंचांग प्रकाशित होता है। यह अपने ढंग का एक अनोखा प्रयोग है।
अब प्रकाश-चित्र विज्ञान का नया कार्य हाथ में लिया गया है। अब तक सभी संस्थानों में प्रोजेक्टर पहुँचाए गए थे। उन्हीं से काम चल रहा था। अब वीडियो-क्षेत्र में प्रवेश किया गया है। उनके माध्यम से कविताओं के आधार पर प्रेरक फिल्में बनाई जा रही हैं। देश के विद्वानों, मनीषियों, मूर्द्धन्यों, नेताओं के दृश्य प्रवचन टेप कराकर उनकी छवि समेत संदेश घर-घर पहुँचाए जा रहे हैं। भविष्य में मिशन के कार्यक्रमों का उद्देश्य, स्वरूप और प्रयोग समझाने वाली फिल्में बनाने की बड़ी योजना है, जो जल्दी ही कार्यान्वित होने जा रही है।
शान्तिकुञ्ज मिशन का सबसे महत्त्वपूर्ण सृजन है— ‘ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान।’ इस प्रयोगशाला द्वारा अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय करने के लिए बहुमूल्य यंत्र-उपकरणों वाली प्रयोगशाला बनाई गई है। कार्यकर्त्ताओं में आधुनिक आयुर्विज्ञान एवं पुरातन आयुर्वेद विधा के ग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट हैं। विज्ञान की अन्य विधाओं में निष्णात उत्साही कार्यकर्त्ता हैं, जिनकी रुचि अध्यात्मपरक है। इसमें विशेष रूप से यज्ञ विज्ञान पर शोध की जा रही है। इस आधार पर यज्ञ विज्ञान की शारीरिक-मानसिक रोगों की निवृत्ति में—पशुओं और वनस्पतियों के लिए लाभदायक सिद्ध करने में— वायुमंडल और वातावरण के संशोधन में इसकी उपयोगिता जाँची जा रही है, जो अब तक बहुत ही उत्साहवर्द्धक सिद्ध हुई है।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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