यूनिवर्सिटी ऑफ डेब्रसेन में अकादमिक एवं सांस्कृतिक सहयोग को नई दिशा
अपने अंतरराष्ट्रीय प्रवास के अंतर्गत आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी, प्रख्यात शिक्षाविद् एवं दूरदर्शी नेतृत्वकर्ता, ने यूनिवर्सिटी ऑफ डेब्रसेन का आधिकारिक भ्रमण किया, जो शोध, नवाचार और अकादमिक उत्कृष्टता के लिए यूरोप के अग्रणी संस्थानों में प्रतिष्ठित है।
इस अवसर पर डॉ. पंड्या जी द्वारा आयुर्वेद चेयर के स्मारक पट्ट का अनावरण किया गया, जो भारतीय पारंपरिक ज्ञान परंपराओं को वैश्विक शैक्षणिक मंच से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह गरिमामयी समारोह हंगरी में भारत के राजदूत आदरणीय डॉ. अंशुमान गौर जी एवं यूनिवर्सिटी ऑफ डेब्रसेन के रेक्टर प्रो. डॉ. ज़ोल्टान सिल्वैसी की विशेष उपस्थिति में सम्पन्न हुआ।
इस अवसर पर परम पूज्य गुरुदेव का साहित्य विश्वविद्यालय के ‘इंडियन कॉर्नर’ में विधिवत रूप से स्थापित किया गया, जो भारतीय दर्शन, संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा के लिए समर्पित एक विशेष स्थान के रूप में विकसित किया जा रहा है। यह आयोजन सभी डीन एवं विभागाध्यक्षों की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ।
Recent Post
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 137): मनीषी के रूप में हमारी प्रत्यक्ष भूमिका
Read More
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 136): इन दिनों हम यह करने में जुट रहे हैं
Read More
विश्वास के युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता: अंतिम आविष्कार और बढ़ता हुआ जोखिम
आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि हम मानव-सभ्यता की पूरी ऐतिहासिक यात्रा के ऐसे मोड़ से गुजर रहे हैं, जहाँ technology बाकी सारे संस्थानों से कहीं अधिक तेज़ी से आगे बढ़ रही है। हम लोग ...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 135): इन दिनों हम यह करने में जुट रहे हैं
Read More
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 134): इन दिनों हम यह करने में जुट रहे हैं
Read More
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 133): इन दिनों हम यह करने में जुट रहे हैं
Read More
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 132): स्थूल का सूक्ष्मशरीर में परिवर्तन— सूक्ष्मीकरण
Read More
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 131): स्थूल का सूक्ष्मशरीर में परिवर्तन— सूक्ष्मीकरण
Read More
कृपा-कथा : एक शिष्य की कलम से परम वंदनीया माता जी जगन्माता माँ जगदंबा हैं
परम वंदनीया माता जी मेरे लिए केवल एक श्रद्धेय व्यक्तित्व नहीं, बल्कि साक्षात् जगन्नमाता—मां जगदंबा की अवतारी चेतना हैं। यह मेरा अटूट, अडिग और जीवनानुभव से उपजा विश्...
कृपा-कथा : एक शिष्य की कलम से | गुरु ने उँगली पकड़ ली, फिर लोक-परलोक वही देखते है
गुरुदेव ने कहा - तुम्हारी कई पीढ़ियाँ मेरा कार्य करेगी। से आगे .....
किसी संत ने कहा है— जिसकी उँगली गुरु ने पकड़ ली, उसके लिए लोक और परलोक दोनों सुरक्षित हो जाते ह...

.jpg)
