हमारी वसीयत और विरासत (भाग 134): इन दिनों हम यह करने में जुट रहे हैं
अब प्रश्न यह रहा है कि पाँच वीरभद्रों को काम क्या सौंपना पड़ेगा और किस प्रकार वे क्या करेंगे? उसका उत्तर भी अधिक जिज्ञासा रहने के कारण अब मिल गया। इससे निश्चिंतता भी हुई और प्रसन्नता भी।
इस संसार में आज भी ऐसी कितनी ही प्रतिभाएँ हैं, जो दिशा पलट जाने पर अभी जो कर रही हैं, उसकी तुलना में अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य करने लगेंगी। उलटे को उलटकर सीधा करने के लिए जिस प्रचंड शक्ति की आवश्यकता होती है, उसी को हमारे अंग-अंग— वीरभद्र करने लगेंगे। प्रतिभाओं की सोचने की यदि दिशा बदली जा सके तो उनका परिवर्तन चमत्कारी जैसा हो सकता है।
नारद ने पार्वती, ध्रुव, प्रह्लाद, वाल्मीकि, सावित्री आदि की जीवन-दिशा बदली, तो वे जिन परिस्थितियों में रह रहे थे, उसे लात मारकर दूसरी दिशा में चल पड़े और संसार के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बन गए। भगवान बुद्ध ने आनंद, कुमारजीव, अंगुलिमाल, अंबपाली, अशोक, हर्षवर्द्धन, संघमित्रा आदि का मन बदल दिया, तो वे जो कुछ कर रहे थे, उसके ठीक उलटा करने लगे और विश्वविख्यात हो गए। विश्वामित्र ने हरिश्चंद्र को एक मामूली राजा नहीं रहने दिया, वरन् इतना वरेण्य बना दिया कि उनकी लीला अभिनय देखने मात्र से गांधी जी विश्ववंद्य हो गए। महाकृपण भामाशाह को संत विठोबा ने अंतःप्रेरणा दी और उनका सारा धन महाराणा प्रताप के लिए उगलवा लिया। आद्य शंकराचार्य की प्रेरणा से मांधाता ने चारों धामों के मठ बना दिए। अहिल्याबाई को एक संत ने प्रेरणा देकर कितने ही मंदिरों-घाटों का जीर्णोद्धार करा लिया और दुर्गम स्थानों पर नए देवालय बनाने के संकल्प को पूर्ण कर दिखाने के लिए सहमत कर लिया। समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी को वह काम करने की अंतःप्रेरणा दी, जिसे वे अपनी इच्छा से कदाचित् ही कर पाते। रामकृष्ण परमहंस ही थे, जिन्होंने नरेंद्र के पीछे पड़कर उसे विवेकानंद बना दिया। राजा गोपीचंद का मन वैराग्य में लगा देने का श्रेय संत भर्तृहरि को था।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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