हमारी वसीयत और विरासत (भाग 137): मनीषी के रूप में हमारी प्रत्यक्ष भूमिका
मनुष्य अपनी अंतःशक्ति के सहारे प्रसुप्त के प्रकटीकरण द्वारा ऊँचा उठता है। यह जितना सही है, उतना ही यह भी मिथ्या नहीं कि तप-तितिक्षा से प्रखर बनाया गया वातावरण, शिक्षा, सान्निध्य-सत्संग, परामर्श-अनुकरण भी अपनी उतनी ही सशक्त भूमिका निभाता है। देखा जाता है कि किसी समुदाय में नितांत साधारण श्रेणी के सीमित सामर्थ्यसंपन्न व्यक्ति एक प्रचंड प्रवाह के सहारे असंभव पुरुषार्थ भी संभव कर दिखाते हैं। प्राचीनकाल में मनीषी-मुनिगण यही भूमिका निभाते थे। वे युग-साधना में निरत रहे। लेखनी-वाणी के सशक्त तंत्र के माध्यम से जनमानस के चिंतन को उभारते थे। ऐसी साधना अनेक उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों को जन्म देती थी— उनकी प्रसुप्त सामर्थ्य को उजागरकर उन्हें सही दिशा देकर समाज में वांछित परिवर्तन लाती थी। शरीर की दृष्टि से सामान्य दृष्टिगोचर होने वाले व्यक्ति भी प्रतिभा-कुशलता-चिंतन की श्रेष्ठता से अभिपूरित देखे जाते थे।
सर्वविदित है कि मुनि एवं ऋषि ये दो श्रेणियाँ अध्यात्म-क्षेत्र की प्रतिभाओं में गिनी जाती रही हैं। ऋषि वह, जो तपश्चर्या द्वारा काया का चेतनात्मक अनुसंधानकर उन निष्कर्षों से जनसमुदाय को लाभ पहुँचाएँ तथा मुनिगण वे कहलाते हैं, जो चिंतन, मनन, स्वाध्याय द्वारा जनमानस के परिष्कार की अहम् भूमिका निभाते हैं। एक पवित्रता का प्रतीक है, तो दूसरा प्रखरता का। दोनों को ही तप-साधना में निरत हो सूक्ष्मतम बनना पड़ता है, ताकि अपना स्वरूप और विराट— व्यापक बनाकर स्वयं को आत्मबल संपन्नकर वे युगचिंतन के प्रवाह को मरोड़-बदल सकें। मुनि जहाँ प्रत्यक्ष साधनों का प्रयोग करने की स्वतंत्रता रखते हैं, वहाँ ऋषियों के लिए यह अनिवार्य नहीं। वे अपने सूक्ष्मरूप में भी वातावरण को आंदोलित करते, सुसंस्कारित बनाए रख सकते हैं।
लोक-व्यवहार में मनीषी शब्द का प्रायः अर्थ उस महाप्राज्ञ से लिया जाता है, जिसका मन उसके वश में हो। जो मन से नहीं संचालित होता, अपितु अपने विचारों द्वारा मन को चलाता है, उसे मनीषी एवं ऐसी प्रज्ञा को मनीषा कहा जाता है। शास्त्रकार का कथन है— ‘‘मनीषा अस्ति येषां ते मनीषा नः’’ लेकिन साथ ही यह भी कहा है—‘‘मनीषि नस्तु भवन्ति, पावनानि न भवन्ति’’, अर्थात— मनीषी तो कई होते हैं। बड़े-बड़े बुद्धिमान होते हैं, परंतु वे पावन हों— पवित्र हों, यह अनिवार्य नहीं। प्रतिभाशाली-बुद्घिमान होना अलग बात है एवं पवित्र-शुद्ध अंतःकरण रखते हुए बुद्धिमान होना दूसरी। यह कथन आज की परिस्थितियों में नितांत सही है। आज संपादक, बुद्धिजीवी, लेखक, अन्वेषक, प्रतिभाशाली वैज्ञानिक तो अनेकानेक हैं; देश-देशांतरों में फैले पड़े हैं, लेकिन वे मनीषी नहीं हैं। क्यों? क्योंकि तपःशक्ति द्वारा— अंतःशोधन द्वारा उन्होंने पवित्रता नहीं अर्जित की।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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